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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

क्षेत्रव्यवहारः । ( १५३ )
यथा प्रथमक्षेत्रे फलम् ३० द्वितीये ७२ तृतीये ९६ एषा-
मैकयं सर्वक्षेत्रफलम् १९८ जातम् ।
फैलाव-मुख ११ भूमि २२ दोनों भुज १३ ।
२० लम्ब १२ हैं अब इस उदाहरण में “सर्वदोरित्यादि”
रीति से सब भुजों ११ । २० । २२ । १३ का
योग किया तब ६६ हुए; इनको आधा ३३ कर
चार ४ स्थानोंमें लिखा फिर अलग २ एक एक स्थानमें सब भुजोंको घटाया
योगार्द्ध. भुज. शेष. | तब जो शेषाङ्क हुए उनका परस्पर घात किया
३३ ११ २२ | तब ६२९२० हुए; इनका मूल लिया तब कुछ
३३ २० १३ | कम २५० मिला; परन्तु यह ठीक नहीं ठीक
३३ २२ १३ | जाननेके निमित्त “लम्बेन निघ्नमित्यादि” इस
३३ १३ २० | रीतिसे फल लाये; अर्थात् मुख ११ और भूमि २२
इनको जोडा तब ३३ हुए; इनका आधा किया तब
३३/२ हुए; इनको लम्ब १२ से गुणा किया तब १९८ हुए यही ठीक क्षेत्रफल हुआ; अब
क्षेत्रके तीन खण्ड करके अलग २
क्षेत्रफल लाकर तीनों खण्डोंपर
गणित दिखलाते हैं यहां प्रथम
खण्डमें भुज ५ कोटि १२
कर्ण १३ है। दूसरे खण्डमें विस्तार ६ लम्बापन १२ है। तीसरे खण्डमें भु० १६
को १२ कर्ण २० है; पहले त्रिभुजक्षेत्रमें फल लानेके लिये ५ । १२ भुजकोटिका
घात किया तब ६० हुए; इनको आधा किया तब ३० हुए; यही प्रथम
क्षेत्रका फल है; द्वितीयखण्ड आयत चतुर्भुजमें भुज ६ कोटि १२ का घात
किया तब ७२ हुए; यही क्षेत्रके द्वितीय खण्डका फल है; तृतीय खण्ड जात्य-
त्रिभुजके भुज १६ कोटि १२ का घात किया तब १९२ हुए; इनका आधा किया
तब ९६ हुए यही तृतीय खण्डका क्षेत्रफल हुआ; इस प्रकार तीनों खण्डोंके फल
३० । ७२ । ९६ को जोड़नेसे वही १९८ क्षेत्रफल हुआ ।
CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri