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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

क्षेत्रव्यवहारः । ( १२१ )
यहां भी ऊपर कही हुई वर्गान्तरकी सरल रीतिके अनुसार ४ । ५ दोनों राशियोंका
योग किया तब ९ नौ हुए; इसको उन ही ४।५ दोनों राशियोंके
अन्तर १ से गुणा किया तब ९ हुए; इसका पहली रीतिके
अनुसार मूल लिया तब ३ तीन लब्धि हुए. यही भुजका
प्रमाण है ॥
उदाहरणम्--
दूसरा उदाहरण-
सांघ्रित्रयमितो बाहुर्यत्र कोटिश्च तावती ॥
तत्र कर्णप्रमाणं किं गणक ब्रूहि मे द्रुतम् ॥ २ ॥
अन्वयः-हे गणक ! यत्र बाहुः सांघ्रित्रयमितः तावती च कोटिः तत्र कर्ण-
प्रमाणं किम् इति मे द्रुतम् ब्रूहि ? ॥ २ ॥
अर्थः-हे गणक ! जहां भुजप्रमाण तो ३ १/४ सबातीन है और कोटि भी उतनी
नहीं ३ १/४ है; तहाँ कर्णका क्या प्रमाण होगा ? यह मुझको शीघ्र कहो ॥ २ ॥
न्यासः-भुजः १३/४ कोटिः १३/४ अनयोर्वर्गयोगः १६९/८ अस्य
मूलाभावात्करणीगत एवायं कर्णः ।
अस्यासन्नमूलज्ञानार्थमुपायः ॥
फैलाव-यहां भुज १३/४ का वर्ग योग ३३८/१६ हुआ. इसमें दोका अपवर्तन दिया तब
१६९/८ ऐसा रूप हुआ; अब पहली रीतिके अनुसार इसका मूल लेना
चाहिये, परन्तु यहाँ मूल नहीं मिलता; इस कारण यह करणीगत
मूल कहाता है. ऐसे स्थानमें ठीक मूल नहीं मिलता; परन्तु मूलके
समीपका अङ्क मालूम हो सकता है. उसकी रीति लिखते हैं-
वर्गेण महतेष्टेन हताच्छेदांशयोर्वधात् ॥
पदं गुणपदक्षुण्णच्छिद्रक्तं निकटं भवेत् ॥ ३ ॥
अन्वयः-महतेष्टेन वर्गेण हतात् छेदांशयोः वधात् यत् पदं तत् गुणपदक्षुण्ण-
च्छिद्रक्तं निकटम् भवेत् ॥ ३ ॥