लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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अन्वयः-यत्र चतुष्टयं कोटिः त्रयं दोः तत्र श्रुतिः का ? दोः कर्णतः कोटिं वद
कोटिश्रुतिभ्याम् भुजं च वद ॥ १ ॥
अर्थः-जहाँ ४ चार कोटिका प्रमाण है तीन ३ भुजका प्रमाण है तहाँ कर्णका
क्या प्रमाण होगा ? और भुज कर्ण जानकर कोटिका क्या प्रमाण होगा और
कोटि कर्ण जानकर भुजका क्या प्रमाण होगा ? सो कहो ॥ १ ॥
न्यासः-
कोटिः ४ भुजः ३ भुजवर्गः ९ कोटिवर्गः १६
एतयोर्योगात् २५ मूलम् ५ कर्णो जातः ॥
अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्-
कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्वर्गांतरम् १६
एतन्मूलं कोटिः ४
अथ कोटिकर्णाभ्यां भुजानयनम्-
कोटिः ४ कर्णः ५ अनयोर्वर्गांतरम् ९
एतन्मूलं भुजः ३
फैलाव-यहां नीचेकी आडी रेखा मानी हुई भुज है और उसको रोकती हुई
जो सीधी रेखा है, वह कोटि है. और दोनों रेखाओंको बाँधने-
वाली जो तिरछी रेखा है सो कर्ण है. अब यहां भुजप्रमाण ३ तीन
और कोटिप्रमाण ४ चार तो जानते हैं परन्तु यह नहीं जानते हैं
कि कर्णका क्या प्रमाण है इस कारण ऊपर कहे हुए सूत्रके अनुसार
भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुआ; और कोटि ४ चारका वर्ग किया तब
१६ हुआ इनका योग किया तब २५ पचीस हुए; इसका मूल लिया तब ५ पाँच
लब्ध हुआ. यही इस क्षेत्रमें कर्णका प्रमाण है ॥