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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 268 में से

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पृष्ठ 116

( १०० ) लीलावती ।
तत्र छन्दश्चित्युत्तरे किंचिदुदाहरणम्-
तहां पहले प्रस्तारके विषयमें कुछ उदाहरण दिखलाते हैं-
प्रस्तारे मित्र गायत्र्याः स्युः पादे व्यक्तयः कति ॥
एकादिगुरुवश्चाशु कथ्यतां तत्पृथक्पृथक् ॥ १ ॥
अन्वयः-हे मित्र ! गायत्र्याः पादे प्रस्तारे कृते सति कति व्यक्तयः स्युः । एका
दिगुरवः च कति व्यक्तयः स्युः तत् पृथक्पृथक् आशु कथ्यताम् ? ॥ १ ॥
अर्थः-हे मित्र ! गायत्री छन्दके चौथे ( छ अक्षरके ) पादमें प्रस्तार करनेसे
कितनी व्यक्ति ( भेद ) होंगी, एक, दो, तीन इत्यादि गुरुवाली कितनी व्यक्तियाँ
होंगी ? सो अलग २ शीघ्र कहो ॥ १ ॥
न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६
यथोक्तकरणेन लब्धा एकगुरुव्यक्तयः ६ द्विगुरवः
१५ त्रिगुरवः २० । चतुर्गुरवः १५ । पञ्चगुरवः ६ ।
षड्गुरवः १ । तथैकः सर्वलघुः १ एवमासामैक्यम् पाद-
व्यक्तिमितिः ६४ ॥ एवं चतुश्चरणाक्षरसंख्यकानङ्गान्यु-
थोक्तम् विन्यस्य एकादिगुरुभेदानानीयैतान् सैकान्
एकीकृत्य जाता गायत्रीवृत्तव्यक्तिसंख्या १६७७७२१६
एवमुक्ताद्युत्कृतिपर्यन्तं छन्दसां व्यक्तिमितिर्ज्ञातव्या ॥
फैलाव-यहाँ पूर्वोक्त रीतिके अनुसार छ ६ अक्षरका गायत्रीका चरण है, इस
कारण छ से लेकर एक पर्य्यंत उलटे अंक लिखकर उसके नीचे क्रमसे एक, दो
इत्यादि अंक ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ लिखे, फिर यहां उपरोक्त रीतिके अनुसार कोई
सिद्ध अंक तो है ही नहीं. इस कारण पहले ६/१ में हरका भाग देकर लब्धि ६ छ
हुआ, इसको सिद्ध अंक माना, इस सिद्ध अंकसे आगेके अंकमें ५/२ जो भाज्यः पांच
५ है उससे सिद्ध अंकको गुणा किया तब ३० तीस हुआ फिर भाजक २ दोस
भाग लिया तब १५ पन्द्रह दूसरा अंक हुआ फिर इस सिद्ध अंकसे आगेके अंक
४/३ के भाज्यसे इस सिद्ध अंक १५ को गुणा किया तब ६० साठ हुआ, इसमें
भाजक ३ का भाग लिया तब २० बीस तीसरा सिद्ध अङ्क हुआ. इसको इसके
आगेके अङ्क ३/४ के भाज्य ३ से गुणा किया तब ६० साठ हुआ, इसमें भाजक ४
चारका भाग लिया तब लब्धि १५ पन्द्रह, चौथा सिद्ध अङ्क हुआ, फिर इसके आगेके