सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

( ९० ) लीलावती ।
तब लब्धिका १२८/१ ६/१ ६/१ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार कर्पूर चन्दन, अगर
इनका क्रमसे १४ ३/१ ६/१ ६/१ इतना द्रम्म मूल्य हुआ, फिर कर्पूर चन्दन,
अगर इन तीनोंके भागों १/१ १६/१ ५/१ को मिश्रधन १६/१ से गुणा किया
तब १६/१ २५६/१ १२८/१ ऐसा रूप हुआ. इनमें ऊपर जो योग किया था
३६/१ उसका भाग दिया तब लब्धिका ५/१ ६४/१ ९ ऐसा रूप हुआ इस प्रकार कर्पूर
चन्दन अगर इनकी क्रमसे ५/१ ७ ३/१ ३ ५/१ इतना पल तोल हुआ यही
मिलेगा.
रत्नमिश्रीकरणसूत्रं वृत्तम्-
रत्नोंके विषयकी मिश्र गणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं-
नरघ्नदानोनितरत्नशेषैरिष्टे हते स्युः खलु मूल्यसंख्याः ॥
शेषैर्हते शेषवधे पृथकस्थैरभिन्नमूल्यान्यथवा भवन्ति॥ २५॥
अन्वयः-खलु नरघ्नदानोनितरत्नशेषैः इष्टे हते मूल्यसंख्या स्युः । अथवा शेषवधे
पृथक्स्थैः शेषैः हते अभिन्नमूल्यानि भवन्ति ॥ २५ ॥
अर्थः- (जहां मनुष्योंका अपने पदार्थोंके परस्पर अलटे पलटे समान धन कहा
हो) तहां मनुष्योंकी संख्यासे गुणी हुई दानकी संख्याके घटानेसे जितने २ रत्न
शेष रहें उनका अलग २ इष्ट अङ्कमें भाग ले तब जो जो लब्धि होगी वही
निश्चय करके प्रति २ रत्नका मोल होगा.
अथवा-सब जो शेष रहें उन सबको परस्पर गुणा करके जो राशि हो
उसमें शेष अङ्कोंका अलग २ भाग दे तब प्रति २ रत्न का मोल लब्धि
मिलेगा ॥ २५ ॥
अत्रोद्देशकः-इस विषयका उदाहरण-
माणिक्याष्टकमिन्द्रनीलदशकं मुक्ताफलानां शतं
सद्रत्नानि च पञ्च रत्नवणिजां येषां चतुर्णां धनम् ॥
संगस्नेहवशेन ते निजधनाद्दत्त्वैकमेकं मिथो
जातास्तुल्यधनाः पृथग्वद सखे तद्रत्नमूल्यानि मे ॥१॥
अन्वयः- हे सखे ! येषां रत्नवणिजां माणिक्याष्टकम् इन्द्रनीलदशकम्
मुक्ताफलानां शत सद्रत्नाणि च पञ्च चतुर्णां धनम् आसीत् ते सङ्गस्नेहवशेन
निजधनात् एकम् एकम् मिथः दत्त्वा तुल्यधनाः जाताः तर्हि रत्नमूल्यानि मे
पृथक् वद ॥ १ ॥