लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रयावक्रयव्यवहारः। (८७)
अन्वयः-स्वमूल्यानि स्वभागैः हत्वा पण्यैः विभजेत् तानि भागान् च मिश्रधनेन
हत्वा तदैक्येन विभजेत् तदा यथाक्रमं मौल्यानि पण्यानि च स्युः ॥ २४ ॥
अर्थः-अपने २ मूल्योंको अपने २ भागोंसे गुणा करे और उन गुणा किये हुए
अंकोंमें जो वस्तु बेची जाय उसकी तोलका भाग ले, भाग लेनेसे जो राशि आवे
उनको दानमें अलग २ लिखे; फिर एक १ जगहका योग करे, दूसरी जगहके अंकोंको
विना योग किये लिखा रहने दे.फिर जिनका योग नहीं किया है, उनको अलग २
मिश्रधनसे गुणा करे और जोडे हुए अङ्कोंसे भाग ले तो उन वस्तुओंका अलग २
मूल्य मालूम होगा. फिर भागोंको मिश्रधनसे गुणा करके उसी योगका भाग
दे तब अलग २ तोल मालूम होगी ॥ २४ ॥
उद्देशकः-
उदाहरणः-
सार्द्धं तण्डुलमानकत्रयमहो द्रम्मेण मानाष्टकं मुद्गानाञ्च यदि
त्रयोदशमिता एता वणिक्काकिणीः ॥ आदायार्पय तण्डुलां
शयुगलं मुद्रैकभागान्वितं क्षिप्रं क्षिप्रभुजो व्रजेमहि यतः
सार्थोऽग्रतो यास्यति ॥ १ ॥
अन्वयः-अहो वणिक् ! यदि सार्द्धं तण्डुलमानकत्रयम् मुद्गानां च मानाष्टकं
द्रम्मेण लभ्यते तर्हि एताः त्रयोदश मिताः काकिणीः आदाय मुद्रैकभागान्वितं
तण्डुलांशयुगलं क्षिप्रम् अर्पय वयं हि क्षिप्रभुजः व्रजेमहि यतः सार्थः अग्रतः
यास्यति ॥ १ ॥
अर्थः-हे वैश्यवर्य्य ! साढे तीन ३ १/२ मान चावल और मूंग ८ आठ मान १
द्रम्मकी आती है, तो यह १३ तेरह काकिणी लो और दोनों वस्तु दो, परन्तु
मूगका एक भाग हो और चावल दो २ भाग हों. ( जल्दी दो क्योंकि हम जल्दी
भोजन बना खाकर चले जायँ नहीं तो संगके आदमी आगे चले जायँगे. ) तो
कहो उस वणिकने मूंग कितनी दी और चावल कितने दिये और उनका अलग २
मोल क्या हुआ ? ॥ १ ॥
न्यासः-पण्ये ७/२, ८; मौल्ये १/१, १/१; स्वभागौ २/१, १/१; मिश्र-
धनम् १३/६४ अत्र स्वमूल्ये स्वभागगुणिते पण्याभ्यां भक्ते
जाते ४/७, १/८ भागौ च २/१, १/१ मिश्रधनेन १३/६४ संगुण्य भक्ते
जाते तण्डुलमुद्गमूल्ये १/६, १/१२८ तथा तण्डुलमुद्गमाने भागौ