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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

“लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या”
[ वैद्य भीमसेन शास्त्री एम० ए०, पी० एच्० डी० कृत विश्लेषणात्मक भैमीनामक
विस्तृत हिन्दी व्याख्या सहित ] प्रथम भाग
लेखक के दीर्घकालिक व्याकरणाध्यापन का यह निचोड़ है। कौमुदी पर इस
प्रकार की विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषणात्मक हिन्दी व्याख्या आज तक नहीं निकली। इस
व्याख्या में प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, विभक्तिवचन, समास विग्रह, अनुवृत्ति अधिकार,
सूत्रगत तथा अनुवर्तित प्रत्येक पद का अर्थ परिभाषाजन्य विशेषता अर्थ की निष्पत्ति,
उदाहरण प्रत्युदाहरण तथा विस्तृत सिद्धि देते हुए छात्रों और अध्यापकों के मध्य आने
वाली प्रत्येक शंका का पूर्णतया विस्तृत समाधान प्रस्तुत किया गया है। इस हिन्दी व्याख्या
की देश-विदेश के डेढ़ सौ से अधिक विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। स्थान-स्थान
पर परिशिष्ट विषय के आलोडन के लिये बड़े यत्न से पर्याप्त विस्तृत अभ्यास सङ्गृहीत
किये गये हैं। इस व्याख्या की रूपमालाओं से अनुवादोपयोगी लगभग दो हज़ार शब्दों
का अर्थ सहित बृहत्सङ्ग्रह प्रस्तुत करते हुए णत्वप्रक्रियोपयुक्त प्रत्येक शब्द को चिह्नित
किया गया है। आज तक लघुकौमुदी की किसी भी व्याख्या में ऐसी विशेषता दृष्टि-
गोचर नहीं होती। व्याख्या की सबसे बड़ी विशेषता अव्ययप्रकरण है। प्रत्येक अव्यय के
अर्थ का विस्तृत विवेचन करके उसके लिए विशाल संस्कृत वाङ्मय से किसी न किसी
सूक्ति व प्रसिद्ध वचन को सङ्गृहीत करने का प्रयास किया गया है। अकेला अव्यय-
प्रकरण ही लगभग साठ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। एक विद्वान् समालोचक ने ग्रन्थ की
समालोचना करते हुए यहां तक कहा था कि—“यदि लेखक ने अपने जीवन में अन्य कोई
प्रणयन न कर केवल अव्यय-प्रकरण ही लिखा होता तो केवल यह प्रकरण ही उसे अमर
करने में सर्वथा समर्थ था।” सन्धिप्रकरण में लगभग एक हज़ार अभूतपूर्व नये उदाहरण
विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए सङ्कलित किये गये हैं—उदाहरणार्थ अकेले ‘इको यणचि’
सूत्र पर ३५ नये उदाहरण दिये गये हैं। इस व्याख्या में ग्रन्थगत किसी भी शब्द की
रूपमाला को तद्वत् नहीं लिखा गया प्रत्युत प्रत्येक शब्द एवं धातु की पूरी-पूरी सार्थ
रूपमाला दी गई है। स्थान-स्थान पर समझाने के लिये नाना प्रकार के कोष्ठकों और
चक्रों से यह ग्रन्थ ओत प्रोत है। इस प्रकार का यत्न व्याकरण के किसी भी ग्रन्थ
पर अद्यावत् नहीं किया गया। यह व्याख्या छात्रों के लिए ही नहीं अपितु अध्यापकों
तथा अनुसन्धान-प्रेमियों के लिए भी अतीव उपयोगी है। अन्त में अनुसन्धानोपयोगी कई
परिशिष्ट दिये गये हैं। यह ग्रन्थ भारत-सरकार द्वारा सम्मानित हो चुका है। बृहदा-
कार २०×२६—८ साइज के लगभग सात सौ पृष्ठों में इस व्याख्या का केवल पूर्वार्ध
भाग समाप्त हुआ है। पूर्वार्ध भाग का लागत से भी कम मूल्य केवल तीस रुपया
रखा गया है।

३
पाण्डीचरी स्थित अरविन्दयोगाश्रम का प्रमुख त्रैमासिक पत्र 'अदिति' इस
व्याख्या के विषय में लिखता है—
“जहां तक हमें ज्ञात है यह आधुनिक शैली से विश्लेषणपूर्वक विषय का मर्म
समझाने वाली अपने ढंग की पहली व्याख्या है। व्याख्याकार ने भाष्यशैली में आधुनिक-
व्याख्याशैली का पुट देकर सर्वांग सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत की है। इस में मूल ग्रन्थ के
एक-एक शब्द व विचार को पूरा-पूरा खोल कर पाठकों के हृदय पर अंकित कर देने
का सुन्दर यत्न किया गया है। विद्वान् व्याख्याकार ने लघुसिद्धान्त-कौमुदी की भैमी-
नामक सर्वांगपूर्ण व्याख्या प्रकाशित कर के राष्ट्रभाषा की महान् सेवा की है। व्याकरण
में प्रवेश के इच्छुक छात्र, व्युत्पन्न विद्यार्थी, जिज्ञासु, व्याकरणप्रेमी, अध्यापक और
अन्वेषक सभी के लिये यह ग्रन्थरत्न एक-सा उपयोगी सिद्ध होगा।”
हिन्दी के प्रमुख मासिक पत्र 'सरस्वती' की सम्मति—
“लघुकौमुदी पर अब तक हिन्दी में कोई विश्लेषणात्मक व्याख्या नहीं निकली
है। प्रस्तुत व्याख्या की लेखनशैली, क्लिष्ट स्थलों का विस्तृत उद्घाटन तथा सूत्रों
की प्राञ्जल व्याख्या प्रत्येक संस्कृतप्रेमी पाठक पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह
सकेगी। पुस्तक न केवल विद्यार्थियों वरन् संस्कृत का अध्ययन करने वाले सभी लोगों
के लिये संग्रहणीय है।”
उत्तर भारत का प्रमुख पत्र 'नवभारत टाइम्स' लिखता है कि—
“लेखक महोदय ने कई वर्षों के कठोर परिश्रम के पश्चात् यह ग्रन्थ तैयार
किया है जो उपयोगी है। ग्रन्थकर्ता स्वयं विद्याव्यसनी हैं और विद्याप्रसार ही उनके
जीवन की लगन है। हमें पूरी-पूरी आशा है कि आबाल-वृद्ध संस्कृत-प्रेमी इस ग्रन्थरत्न
को अपनाकर परिश्रमी लेखक के इस प्रकार अन्य भी अपूर्व ग्रन्थ प्राप्त करने का
सौभाग्य प्राप्त करेंगे।”
दिल्ली का प्रमुख हिन्दी दैनिक 'हिन्दुस्तान' लिखता है—
“वैसे तो कौमुदी की अनेक हिन्दी टीकाएं निकल चुकी हैं; मगर इस व्याख्या
की अपनी विशेषताएं हैं। इसमें व्याकरण शास्त्र के अध्ययन-अध्यापन के आधुनिक
तरीकों का सहारा लिया गया है। सूत्रार्थ और अभ्यास इसी के उदाहरण हैं। लघु-
कौमुदी में आये प्रत्येक सूत्र की अर्थविधि को जानने के बाद विद्यार्थी को वृत्ति घोटने
की आवश्यकता न रहेगी। वह सूत्रार्थ समझ कर स्वयमेव उसकी वृत्ति तैयार करने
योग्य हो सकेगा। लघुकौमुदी के आये प्रत्येक शब्द के रूप देकर टीकाकार ने शब्द-
रूपावली का पृथक् रखना व्यर्थ कर दिया है। इसी सिलसिले में करीब दो हज़ार
शब्दों की अर्थसहित सूची देकर टीकाकार ने इस विशेषता को चार चाँद लगा दिये हैं।
अव्यय प्रकरण इस पुस्तक की पांचवी बड़ी विशेषता है—। यह हिन्दी टीका विद्यार्थियों
के लिए उपयोगी है। एक बार अध्यापक से पढ़ने के बाद वे इस टीका के सहारे बड़े
आराम से पुनरावृत्ति कर सकते हैं। उन्हें ट्यूटर रखने की आवश्यकता न रहेगी।

४

यह टीका उनके लिए ट्यूटर का काम करेगी। आशा है कि संस्कृत व्याकरण का
अध्यापन करने वाली संस्थाएं इस ग्रन्थ का हृदय से स्वागत करेंगी।'
राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पदवाक्यप्रमाणज्ञ, स्व० श्री पं० ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु,
आचार्य पाणिनि महाविद्यालय काशी की सम्मति—
"मैंने लघुसिद्धान्तकौमुदी पर श्रीभीमसेनशास्त्रिकृत भैमीव्याख्या सूक्ष्मरीत्या
देखी है। काश ! कि शास्त्री जी ने ऐसी व्याख्या अष्टाध्यायी पर लिखी होती।
परन्तु इतना मैं निःसन्देह कह सकता हूँ कि इस प्रकार विशद स्पष्ट और सर्वांगीण
व्याख्या लघुकौमुदी पर पहली बार देखने को मिली है। इस व्याख्या में अष्टाध्यायी
पद्धति का जो पदे-पदे मण्डन किया गया है उसे देख कर मुझे अपार हर्ष होता है।"
अनुसन्धानविद्यानिष्णात डॉ० वासुदेवशरण जी अग्रवाल की सम्मति—
"मैंने लघुसिद्धान्तकौमुदी पर श्रीभीमसेन शास्त्री जी की विशद भैमीव्याख्या
का अवलोकन किया। यह व्याख्या मुझे बहुत पसन्द आई। ऐसा स्तुत्य परिश्रम हिन्दी
भाषा के माध्यम द्वारा ही सर्वप्रथम प्रकट हुआ है। यह व्याख्या कठिन से कठिन
विषय को भी अत्यन्त सरलशैली से हृदयङ्गम कराने में सफल हो सकी है। प्रश्न-उत्तर,
शंका-समाधान, सूत्रार्थ का स्फोटन करते समय स्थान-स्थान पर परिभाषाओं का
उपयोग, अविकल रूपावलियां, सार्थ शब्दसंग्रह तथा परिश्रम से जुटाए गये अभ्यास आदि
इस व्याख्या की अपनी विशेषताएं हैं। अव्ययप्रकरण का निसार प्रथम बार इस में
देखने को मिला है। व्याकरण के ग्रन्थों पर इस प्रकार की व्याख्याएं निःसन्देह प्रशंस-
नीय हैं। यदि शास्त्री जी इस प्रकार की व्याख्या सिद्धान्त-कौमुदी पर भी लिखें तो
छात्रों और अध्यापकों का बहुत उपकार होगा। मैं हृदय से इस ग्रन्थ के प्रचार एवं
प्रसार की कामना करता हूँ।"

“लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या”
(द्वितीय भाग—तिङन्तप्रकरण)
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी के इस भाग में दश गण और एकादश प्रक्रियाओं की विशद
व्याख्या प्रस्तुत की गई है। तिङन्तप्रकरण व्याकरण की पृष्ठास्थि (Backbone)
समझा जाता है। क्योंकि धातुओं से ही विविध शब्दों की सृष्टि हुआ करती है। अतः
इस भाग की व्याख्या में विशेष श्रम किया गया है। लगभग दो सौ ग्रन्थों के आलोड़न
से इस भाग की निष्पत्ति हुई है। प्रत्येक सूत्र के पदच्छेद, विभक्तिवचन, समासविग्रह,
अनुवृत्ति, अधिकार, प्रत्येक पद का अर्थ, परिभाषाजन्य वैशिष्ट्य, अर्थनिष्पत्ति, उदा-
हरण-प्रत्युदाहरण और सारसंक्षेप के अतिरिक्त प्रत्येक धातु के दसों लकारों की रूप-
माला सिद्धिसहित दिखाई गई है। वैयाकरणनिकाय में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही
अनेक भ्रान्तियों का सयुक्तिक निराकरण किया गया है। भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में
विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए यत्र-तत्र अनेक भाषावैज्ञानिक नोट्स भी दिये हैं। चार

५
सौ से अधिक सार्थ उपसर्गयोग तथा उनके लिए विशाल संस्कृतसाहित्य से चुने हुए
एक सहस्र से अधिक उदाहरणों का अपूर्व संग्रह प्रस्तुत किया गया है। लगभग डेढ़
हज़ार रूपों की ससूत्र सिद्धि और एक सौ के करीब शास्त्रार्थ और शंका-समाधान
इसमें दिये गए हैं। अनुवादादि के सौकर्य के लिए छात्रोपयोगी णिजन्त, सन्नन्त,
यङन्त, भावकर्म आदि प्रक्रियाओं के अनेक शतक और संग्रह भी अर्थसहित दिए गए
हैं। जैसे नानाविध लौकिक उदाहरणों से प्रक्रियाओं को इसमें समझाया गया है वैसे
अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। इससे प्रक्रियाओं का रहस्य विद्यार्थियों को हस्तामलकवत्
स्पष्ट प्रतीत होने लगता है। अन्त में अनुसन्धानोपयोगी छः प्रकार के परिशिष्ट दिये
गए हैं। ग्रंथ का मुद्रण आधुनिक बढ़िया मैप्लीथो कागज़ पर अत्यन्त शुद्ध व सुन्दर ढंग
से पांच प्रकार के टाइपों में किया गया है। सुन्दर, बढ़िया, सम्पूर्ण कपड़े की जिल्द तथा
पक्की अंग्रेजी सिलाई ने ग्रन्थ को और अधिक चमत्कृत कर दिया है। यह ग्रन्थ भी
भारत सरकार से सम्मानित हो चुका है। यह भाग २३ × ३६ ÷ १६ आकार के
७५० पृष्ठों में समाप्त हुआ है। मूल्य लागत से भी कम केवल तीस रुपये ।
इस भाग के विषय में श्री पं० चारुदेव जी शास्त्री पाणिनीय लिखते हैं—
"इतनी विस्तृत व्याख्या आज तक कभी नहीं हुई। यह अद्वितीय ग्रन्थ है ।
यह व्याख्या न केवल बालकों अपितु उपाध्यायों के लिए भी उपयोगी है। शब्दसिद्धि
सर्वत्र स्फटिकवत् स्फुट और हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष, परिपूर्ण और असन्दिग्ध है कि
इस के ग्रहण के लिए अध्यापक की अपेक्षा नहीं रहती। कौमुदीस्य प्रत्येक धातु की
अविकलरूपेण सूत्राद्युपन्यासपूर्वक सविस्तर सिद्धि दी गई है। व्याख्यांश में भी यह
कृति अत्यन्त उपकारक है। स्थान-स्थान पर धात्वर्थप्रदर्शन के लिए साहित्य से उद्धरण
दिये गये हैं। धातूपसर्गयोग को भी बहुत सुन्दर काव्यनाटकों से उद्धृत उदाहरणों से
स्पष्ट किया गया है। यह इस कृति की अपूर्वता है। इस व्याख्या के प्रणयन में शास्त्री
जी ने अथाह प्रयत्न किया है। महाभाष्य, न्यास, पदमञ्जरी आदि का वर्षों तक अव-
गाहन करके उन्होंने यह व्याख्या लिखी है—।"
इस भाग के विषय में दिल्ली का नवभारत टाइम्स लिखता है—
“संस्कृत व्याकरण के अध्ययन में कौमुदी ग्रन्थों का अपना स्थान है। प्रायः
लघुकौमुदी से ही व्याकरण का आरम्भ किया जाता है। परन्तु इस ग्रन्थ का समझना
आसान नहीं है। छात्रों के लिए यह ग्रन्थ वज्र के समान कठोर है। प्रस्तुत ग्रन्थ में
श्रीभीमसेनशास्त्री ने इस की हिन्दी व्याख्या की है। व्याख्याकार राजधानी के सुप्रसिद्ध
वैयाकरण हैं। इस व्याख्या को देखकर हम दावे के साथ कह सकते हैं कि ऐसी
व्याख्या लघु तो क्या, सिद्धान्तकौमुदी की भी नहीं प्रकाशित हुई । इस व्याख्या का
प्रथम भाग आज से बीस वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था। तब इसका भारी स्वागत हुआ
था । जनता को उस के उत्तरार्द्ध भाग की व्याख्या की तभी से उत्कट लालसा रही है।
लेखक ने अब इसे प्रकाशित कर जहां छात्रों का उपकार किया है, वहां शिक्षकों,
प्राध्यापकों को भी उपकृत किया है। इस में लेखक का गहन अध्ययन, कठोर परिश्रम

६

तथा विद्वत्ता स्थान-स्थान पर प्रकट होते ही हैं। छात्रोपयोगी किसी भी विषय का
विवेचन छोड़ा नहीं गया। यह इस की बड़ी भारी विशेषता है। इस भाग मे तिङन्त-
प्रकरण (दशगण तथा एकादश प्रक्रियाओं) का अत्यन्त विशद विवेचन प्रस्तुत किया
गया है। यह प्रकरण धातुसम्बन्धी होने से व्याकरण का प्राण है। इस मे प्रत्येक धातु
के दस लकारों की ससूत्र प्रक्रिया साध कर उनकी सारी रूपमाला भी दी गई है। इससे
विद्यार्थियों को धातुरूपावलियो की आवश्यकता नहीं रहती। छ सौ के करीब
टिप्पणियां तथा साढे चार सौ से अधिक उपसर्गयोग इस ग्रन्थ की अपनी अपूर्व
विशेषता है। इन के लिए व्याख्याकार ने महान् श्रम कर विपुल संस्कृत-साहित्य से जो
डेढ़ हजार के करीब अत्यन्त सुन्दर संस्कृत की सूक्तियों का चयन किया है। यह स्तुत्य
है। सैकड़ों उपयोगी शङ्का समाधान तथा णिजन्त, सन्नन्त, यङन्त भावकर्म आदि अर्थ
सहित कई शतर विद्यार्थियों के लिए निश्चय ही उपयोगी सिद्ध होंगे। इस ग्रन्थ की
उत्कृष्टता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अकेली भूधातु पर ही विद्वान्
व्याख्याकार ने ६० पृष्ठों मे अपनी व्याख्या पूर्ण की है।
सक्षेप मे इस व्याख्या को लघुकौमुदी का महाभाष्य कह सकते हैं। यह ग्रन्थ
न केवल छात्रो, परीक्षार्थियो तथा उपाध्यायो, अध्यापकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा
बल्कि अनुसंधान मे रुचि रखने वालों के लिए भी परमोपयोगी एव सहायक सिद्ध होगा।
इसे पढ़ने से जहा व्याकरण जैसे शुष्क विषय मे सरसता पैदा होती है वहा अनुसंधान
कार्य को भी बढ़ावा मिलता है। हिन्दी मे ऐसे ग्रन्थ स्वागत योग्य हैं।" (२६.८.७१)
“लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या”
(तृतीय एव चतुर्थ भाग—प्रेस मे)
भैमीव्याख्या के अन्तिम तृतीय तथा चतुर्थ भाग शीघ्र छपने जा रहे हैं। तृतीय
भाग मे कृदन्त और कारक एव चतुर्थ भाग मे समास तद्धित और स्त्रीप्रत्यय का
विस्तृत वैज्ञानिक तुलनात्मक विवेचन किया गया है। कृदन्तप्रकरण में तव्यत्-अनीयर्
प्रत्ययान्तों, क्त्वाप्रत्ययान्तों, ल्यबन्तो और तुमुन्नन्ता की सार्थ विस्तृत तालिका देखते
ही बनती है। क्त और क्तवतु प्रत्ययान्ता की तालिका भी बडे यत्न से संग्रहीत की
गई है। यह भाग काव्यादि के सुन्दर उदाहरणा से यत्र तत्र ओत प्रोत है। स्थान-
स्थान पर अनुसंधानापयोगी विशेष टिप्पण और शङ्का-समाधान दिये गय हैं। कारक-
प्रकरण को पर्याप्त लम्बा और स्पष्ट किया गया है। इस के स्पष्टीकरणार्थ मूलाति-
रिक्त अन्य अनेक सूत्र भी सार्थ सोदाहरण दिये गय हैं। इस प्रकरण का छात्रोपयोगी
शुद्धाशुद्धविवेचन विशेष उपयोगी ह। समास और तद्धितप्रकरण का इतना विस्तृत
व्याख्यान पहली बार इस व्याख्या मे उपलब्ध हुआ है। प्रत्येक प्रकरण के अन्त मे
अभ्यास दिये गये हैं। स्त्रीप्रत्ययों पर छात्रोपयोगी विस्तृत तालिका इस व्याख्या की
अपनी विशेषता ह। ग्रन्थ के अन्त मे अनुसंधानापयोगी नाना प्रकार के परिशिष्ट
बड़े काम की वस्तु हैं।

७
"वैयाकरण-भूषण-सार-भैमीभाष्योपेत"
(धात्वर्थनिर्णयान्त)
वैयाकरण-भूषणसार वैयाकरणनिकाय में लब्धप्रतिष्ठ ग्रन्थ है। व्याकरण के
दार्शनिक सिद्धान्तों के ज्ञान के लिये इस का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतएव
एम्० ए०, आचार्य, शास्त्री आदि व्याकरण की उच्च परीक्षाओं में यह पाठ्यग्रन्थ के
रूप में स्वीकृत किया गया है। परन्तु इस ग्रन्थ पर हिन्दी भाषा में कोई भी सरल
व्याख्या आज तक नहीं निकली—हिन्दी तो क्या अन्य भी किसी प्रान्तीय व विदेशी
भाषा में इसका अनुवाद तक उपलब्ध नहीं। विश्वविद्यालयों के छात्र तथा उच्च कक्षाओं
में व्याकरण विषय को लेने वाले विद्यार्थी प्रायः सब इस ग्रन्थ से त्रस्त थे। परन्तु
अब इस के विस्तृत आलोचनात्मक सरल हिन्दीभाष्य के प्रकाशित हो जाने से उनका
भय जाता रहा। छात्रों व अध्यापकों के लिये यह ग्रन्थ समानरूपेण उपयोगी है। इस
ग्रन्थ के गूढ़ आशयों को जगह-जगह वक्तव्यों व फुटनोटों में भाष्यकार ने भली भांति
व्यक्त किया है। भैमीभाष्यकार व्याकरणक्षेत्र में लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् हैं, तथा वर्षों से
व्याकरण के पठनपाठन का अनुभव रखते हैं। अतः छात्रों व अध्यापकों के मध्य आने
वाली प्रत्येक छोटी-से-छोटी समस्या को भी उन्होंने खोलकर रखने में कोई कसर नहीं
छोड़ी। जगह-जगह वैयाकरणों और मीमांसकों के सिद्धान्त को खोलकर तुलनात्मक-
रीत्या प्रतिपादित किया गया है। इस भाष्य की महत्ता इसी से व्यक्त है कि अकेली
दूसरी कारिका पर ही विद्वान् भाष्यकार ने लगभग साठ पृष्ठों में अपना भाष्य समाप्त
किया है। विषय को समझाने के लिये अनेक चार्ट दिये गये हैं जैसे—वैयाकरणों और
नैयायिकों का बोधविषयक चार्ट, धातु की साध्यावस्था और सिद्धावस्था का चार्ट, प्रसज्य
और पर्युदास प्रतिषेध का चार्ट आदि। पूर्वपीठिका में भाष्यकार ने व्याकरण के दर्शन-
शास्त्र का विस्तृत क्रमबद्ध इतिहास देकर मानो सुवर्ण में सुगन्ध का काम किया है।
ग्रन्थ के अन्त में अनुसन्धानप्रेमी छात्रों के लिये सात परिशिष्ट तथा आदि में विस्तृत
विषयानुक्रमणिका दी गई है जो अनुसन्धान-क्षेत्र में अत्यन्त काम की वस्तु हैं। वस्तुतः
व्याकरण में एक अभाव की पूर्ति भाष्यकार ने की है। इस भाष्य की प्रशंसा में देश-
विदेश के विद्वानों के प्रशंसा-पत्र धड़ाधड़ आ रहे हैं। भारत सरकार द्वारा यह ग्रन्थ
सम्मानित हो चुका है। ग्रन्थ का मुद्रण बढ़िया मैपलीथो कागज़ पर अत्यन्त शुद्ध व
सुन्दर ढंग से छः प्रकार के टाइपों में किया गया है। सुन्दर बढ़िया सम्पूर्ण कपड़े की
जिल्द तथा पक्की अंग्रेजी सिलाई ने ग्रन्थ को और अधिक चमत्कृत कर दिया है।
मूल्य २५ रुपये।
"नवभारत टाइम्स" इस ग्रन्थ की आलोचना करता हुआ लिखता है—
"ग्रन्थ के भावों और गूढ़ आशयों को व्यक्त करने वाले पदे-पदे वक्तव्यों और
पादटिप्पणों से लेखक का गम्भीर अध्ययन व श्रम स्पष्ट झलकता है। पञ्चमी और
त्रयोदशी कारिकाओं पर अकर्मक और सकर्मक धातुओं के लक्षण का आशय जैसा इस
भाष्य में स्पष्ट किया गया है अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। इस तरह के अन्य भी

८
शतशः स्थल उदाहरण रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। शास्त्रीजी की शैली
अध्येताओं व पाठकों के मन में उत्पन्न होने वाली सम्भावित शंकाओं को बटोर-बटोर
कर ध्वस्त करने की क्षमता रखती है। द्वितीय कारिका की व्याख्या का लगभग
सत्तर पृष्ठों में समाप्त होना ज्वलन्त प्रमाण है। हिन्दी में इस प्रकार के यत्न स्तुत्य हैं।'
(६ मार्च, १९६६)
बम्बई विश्वविद्यालय के संस्कृतविभाग के अध्यक्ष डाक्टर त्र्यम्बक गोविन्द
माईणकर लिखते हैं—
'Students of Grammar will always remain indebted to Bhim
Sen Shastriji for his very valuable help available in his commentary
I wish Bhim Sen Shastriji writes similar commentaries on other
works in the field of Grammar and renders service both to the sub-
ject of his love and to the world of students and scholars I once
again congratulate him '
अर्थात् श्रीभीमसेन शास्त्री के इस बहुमूल्य व्याख्यान को पाकर व्याकरण के
विद्यार्थी उन के सदा ऋणी रहेंगे। मैं चाहता हूँ कि शास्त्री जी इस प्रकार की व्याख्यायें
व्याकरण के अन्य ग्रन्थों पर भी प्रकाशित करते हुए विद्यार्थियो तथा अनुसन्धानप्रेमियों
का उपकार करेंगे। मैं शास्त्री जी को उनके इस कार्य के लिए पुनः बधाई देता हू।
डा० सत्यव्रत जी शास्त्री व्याकरणाचार्य, प्रोफेसर एव संस्कृतविभागाध्यक्ष,
दिल्ली विश्वविद्यालय लिखते हैं—
“वैयाकरणभूषणसार ग्रन्थ के क्लिष्ट शब्दावली में लिखा होने के कारण
विद्यार्थियों को इसे समझने में बहुत कठिनाई हो रही थी। इसी कठिनाई को दूर करने
की सदिच्छा से प्रेरित हो सुप्रसिद्ध वैयाकरण पं० भीमसेन शास्त्री ने हिन्दी में इसकी
सरल और सुबोध व्याख्या लिखी है। शास्त्री जी का व्याकरणशास्त्र का अध्ययन
अति गहन है। विषय स्पष्टातिस्पष्ट हो, इस विषय में सतत उद्योगशील रहे हैं।
इसका यह परिणाम है कि उन की व्याख्या में गहराई भी है और विशदता भी। यह
व्याख्या विद्वानों के लिए एव विद्यार्थियों के लिए एक समान उपयोगी है।”
स्व० श्री पण्डित कुवेरदत्तजी शास्त्री व्याकरणाचार्य प्रिंसिपल श्री राधाकृष्ण
संस्कृतमहाविद्यालय, खुर्जा लिखते हैं—
“वैयाकरणभूषणसार पर विशद भैमीभाष्य को पाकर मुझे बडी प्रसन्नता हुई।
ऐसा परिश्रम हिन्दी में प्रथम बार हुआ है। यह भाष्य न केवल विद्यार्थियों व परीक्षार्थियों
के लिए अपितु अध्यापकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। व्याख्यान की शैली नितान्त
हृदयहारिणी तथा स्तुत्य है। व्याकरण के अन्य दार्शनिक ग्रन्थों की भी इसी शैली में उन्हें
व्याख्या करनी चाहिये। मैं शास्त्री जी को उनकी सरल कृति पर बधाई देता हू।”
डा० रामचन्द्र जी द्विवेदी प्रोफेसर एव संस्कृतविभागाध्यक्ष, जयपुर यूनिवर्सिटी
अपने एक पत्र में लिखते हैं—

६
“I gratefully acknowledge receipt of a copy of the Vaiya-
karana-Bhusana-Sara Your knowledge of the grammar is pro-
found and subtle and the world of scholars expect many such good
works from your pen.”
अर्थात् “आप का व्याकरणविषयक ज्ञान गम्भीर एवं व्यापक है। विद्वत्समाज
आप की लेखनी से इस प्रकार की अनेक सुन्दर कृतियों की आशा करता है।”
गुरुकुल झज्झर के आचार्य तपोमूर्ति श्रीभगवान्देवजी आर्य लिखते हैं—
“आप का परिश्रम स्तुत्य है। छात्रों के लिए इस ग्रन्थ का आर्यभाषानुवाद
कर के आपने महान् उपकार किया है। आप को अनेकशः बधाइयां।”
बालमनोरमा-भ्रान्ति-दिग्दर्शन
[ लेखक - वैद्य भीमसेन शास्त्री M. A. Ph. D. साहित्यरत्न ]
श्री भट्टोजिदीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी पर श्री वासुदेव दीक्षित की बनाई हुई
बालमनोरमा टीका सुप्रसिद्ध छात्रोपयोगी ग्रन्थ है। पिछली अर्धशताब्दी मे इसके कई
संस्करण मद्रास, लाहौर, बनारस और दिल्ली आदि महानगरों मे अनेक दिग्गज
विद्वानों के तत्त्वाधान में प्रकाशित हो चुके है। परन्तु शोक से कहना पडता है कि इन
स्वनामधन्य विद्वान् सम्पादको ने इस ग्रन्थ के साथ जरा भी न्याय नही किया, इसे
पढने तक का भी कष्ट नही किया। यही कारण हे कि इस मे अनेक हास्यास्पद
और घिनौनी अशुद्धिया दृष्टिगोचर होती है। इस से पठन-पाठन मे बहुत विघ्न उप-
स्थित होता है। इस शोधपूर्ण लघु निबन्ध मे बालमनोरमाकार की कुछ सुप्रसिद्ध
भ्रान्तियों की सयुक्तिक समीक्षा प्रस्तुत की गई है। आप इस शोधपत्र को पढ़ कर
मनोरंजन के साथ-साथ प्रक्रियामार्ग मे अन्धानुकरण न करने तथा सदैव सजग रहने की
भी प्रेरणा प्राप्त कर सकते है। इसमे स्थान-स्थान पर विद्वानो की प्रमादपूर्ण सम्पादन
कला पर भी अनेक चुभती चुटकियां ली गई हैं। यह निबन्ध प्रकाशको, सम्पादकों,
अध्यापकों एवं विद्यार्थियो सब की आंखो को खोलने वाला एक समान उपयोगी हे।
हिन्दी मे इस प्रकार का साहसपूर्वक प्रयत्न पहली वार किया गया है। अनेक प्रकार के
टाइपों मे मैप्सलीथो कागज पर छपे सुन्दर शोधपत्र का मूल्य—पाच रुपये केवल ।
प्रत्याहारसूत्रों का निर्माता कौन ?
[ लेखक – वैद्य भीमसेन शास्त्री M.A. Ph. D. साहित्यरत्न ]
इस शोधपूर्ण लघु निबन्ध मे प्रत्याहार सूत्रों (अइउण् आदि) के निर्माता के
विषय में खूब ऊहापोहपूर्वक पूर्ण विचार किया गया है। दर्जनों नये प्रमाणों का युक्ति-
युक्त विवेचन पहली बार इस विषय पर प्रस्तुत किया गया है। एक बार इसे पढ़ जाइये
आप अन्धविश्वास के घेरे से अपने आपको अवश्य मुक्त पाएंगे। अनेक प्रकार के
टाइपों में मैप्सलीथो कागज पर छपे सुन्दर शोधपत्र का मूल्य—पाच रुपये केवल ।

१०
न्यास—पर्यालोचन
[A CRITICAL STUDY OF JINENDRA BUDDHI'S NYASA]
यह ग्रन्थ काशिका की प्राचीन सर्वप्रथम व्याख्या काशिकाविवरणपञ्चिका
अपरनाम न्यास पर लिखा गया बृहत्काय शोधप्रबन्ध है जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय
द्वारा पी० एच्० डी० की उपाधि के लिये स्वीकृत किया गया है। यह शोधप्रबन्ध
वैद्य भीमसेन शास्त्री द्वारा कई वर्षों के निरन्तर अध्ययन स्वरूप बड़े परिश्रम से लिखा
गया है। इसमें कई प्रचलित धारणाओं का खुल कर विरोध किया गया है। जैसे
न्यासकार को अब तक बौद्ध समझा जाता है परन्तु इसमे उसे पूर्णतया वैदिकधर्मी सिद्ध
किया गया है। यह शोधप्रबन्ध छ अध्यायो मे विभक्त है। प्रथम अध्याय मे न्यास और
न्यासकार का सामान्य परिचय देते हुए न्यासकार का काल, निवास-स्थान, न्यास का
वैशिष्ट्य, न्यास की प्रसन्नपदा प्रवाहपूर्णा शैली तथा न्यास और पदमञ्जरी का
तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। द्वितीय अध्याय मे 'न्यास के ऋणी उत्तर-
वर्त्ती वैयाकरण' नामक अत्यन्त शोधपूर्ण नवीन विषय प्रस्तुत किया गया है। इस में
केवल पाणिनीय वैयाकरणो को ही नही लिया गया अपितु पाणिनीतर चान्द्र, जैनेन्द्र,
कातन्त्र, शाकटायन, भोजकृत सरस्वतीकण्ठाभरण, हैमशब्दानुशासन, मलयगिरिशब्दा-
नुशासन, संक्षिप्तसार, मुग्धबोध तथा सारस्वत इन दस प्रमुख व्याकरणो को भी
सम्मिलित किया गया है। तृतीयाध्याय में 'उत्तरवर्ती वैयाकरणो द्वारा न्यास का
खण्डन' नामक अपूर्व विषय प्रतिपादित है। इस में उत्तरवर्ती वैयाकरणो द्वारा की
गई न्यासकार की आलोचनाओ पर कारणनिर्देशपूर्वक युक्तायुक्तरीत्या खुल कर
विचार उपस्थित किये गये है। चतुर्थ अध्याय में 'न्यास की सहायता से काशिका का
पाठसंशोधन' नामक महत्वपूर्ण विषय का वर्णन है। इसमे काशिका ग्रन्थ की अद्यत्वे
मान्य सम्पादको (?) द्वारा हो रही दुर्दशा का विशद प्रतिपादन करते हुए उसके
अनेक अशुद्ध पाठो का न्यास के आलोक मे सहेतुक शुद्धीकरण प्रस्तुत किया गया है।
पञ्चम अध्याय में न्यासकार की भ्रान्तियो तथा न्यास के एक सौ भ्रष्ट-पाठो का
विस्तृत लेखा-जोखा उपस्थित किया गया है। छठा अध्याय अनेक नवीन बातो से
उपबृंहित उपसंहारात्मक है। व्याकरण का यह ग्रन्थ पाणिनीय व पाणिनीतर व्याकरण
के क्षेत्र मे अपने ढंग का सर्वप्रथम किया गया अनूठा ज्ञानवर्धक प्रयास है। यह ग्रन्थ
प्रत्येक पुस्तकालय के लिए संग्राह्य है तथा व्याकरणशास्त्र मे शोधकार्य करने वाले
शोधच्छात्रों के लिए नितान्त उपयोगी है। सुन्दर मैप्सीथो कागज, पक्की अग्रेजी
सिलाई, स्क्रीनप्रिण्टिग, आकर्षक मजबूत जिल्द से सुशोभित ग्रन्थ का मूल्य—केवल
एक सौ रुपये।
प्राप्तिस्थान—
भैमी प्रकाशन
५३७ लाजपतराय मार्केट, (दीवान हाल के सामने)
दिल्ली—११०००६

BHAIMI PRAKASHAN
(1) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI—BHAIMI
VYAKHYA PART-I
Bhaimi Vyakhya of Shri Bhim Sen Shastri is unique and first
of its kind published in Hindi, in its detailed and scientific exposi-
tion of the Laghu Siddhant Kaumudi. The fact that part-I (पूर्वार्ध)
runs into more than 600 pages (large size), speaks for the pains-
taking nature, depth of learning and experience of the author. He
has left no stone unturned to make the subject as simple and easy
to grasp as possible for the students and to achieve this aim, he
has combined traditional method with the modern and scientific
method of teaching and analysis.
The author has taken great pains to bring home to students
the meaning of the Sutras without the help of Vrittis. At the end
of each section have been appended excercises, prepared with great
care and caution to remove the doubts of studens. Declensions of
all the words mentioned in the L. S. K. have been given in the
Bhaimi Vyakhya. This does away with the need to have a separate
Roopmala. The author has also given a list of about 2000 words
with meanings. These include many rare and uncommon words.
This is a real help in translation. The unique feature of the publi-
cation is the section on Avyaya (अव्यय), which has been acclaimed
by eminent scholars and erudite pandits as an original contribution
to the subject. The several indexes at the end are very useful.
The language of the work is very simple and lucid. The
difficult and knotty points have been handled deftly. On contro-
versial subjects, the views of all the well-known authorities have
been quoted. The author is not a blind follower of tradition in
matter of interpretation and meaning of Sutras. Wherever he

१२
differs, he gives convincing arguments in support of his own view,
which gives a stamp of his deep study, research and vast teaching
experience. Bhaimi Vyakhya in short is a self tutor and is of
immense help to teachers and research scholars. For a book of
about 650 pages of large size the price of Rs 30/- is extremely low.
(2) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI—BHAIMI
VYAKHYA PART-II
Part II of Bhaimi Vyakhya on Laghu Siddhant Kaumudi
deals with the तिङन्त section which is known as the backbone of
Sanskrit grammar. The work is an original commentary in the
traditional style which combines the modern scientific technique
of exposition and comparative analysis. The work is unique in the
प्रक्रिया portion. The author has given detailed प्रक्रिया of about 1500
verbal forms besides conjugations of more than 300 verbs in all the
ten tenses and moods. The use and meaning of different उपसर्गs in
combination with verbs has been illustrated in about 1000 quotations
taken from the famous Sanskrit works. For the benefit of students,
exercises have been given at the end of each sub section. The causal,
desiderative, intensive and denominative verbal forms have been
ably explained. One hundred illustrations of each of these forms
have been given with meaning. The inclusion of well-known con-
troversies, with the view point of each side and author's own, is a
special feature of the work. In many places, the author has offered new
solutions to difficult problems left un-attended even by Varadaraja
himself. At the end of the publication have been appended six indexes,
of which special mention may be made of no. 5.
This voluminous work running into 750 pages has been priced
Rs 30/- only which is very low, keeping in view its technical exce-
llence and the labour involved in bringing out in such a publication.
(3) LAGHU SIDDHANT KAUMUDI—BHAIMI
VYAKHYA PART-III-IV
The last two parts of the Bhaimi Vyakhya on L.S.K are be-
ing readied for the press. Like the first two parts these parts too

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deal in great details with कृदन्त, कारक, समास, तद्धित and स्त्रीप्रत्यय and
contain excellent material for research scholars. The section on
Karakas has been elaborated by inclusion of a sufficient number of
new Sutras not found in the original L.S.K. of Varadaraja. The
exposition of Samas and Taddhit has also been done at such a great
length for the first time. As in the fiirst two parts, exercises have
been added at the end of each sub-section.
(4) VAIYAKARAN BHUSHAN SARA
Vaiyakaran Bhushan Sara of Kaundbhatt is an important trea-
tise of Sanskrit grammar and occupies a special position for its ex-
position of the principles of philosophy of grammar. This has been
prescribed as a text-book for M.A., Acharya, Shastri etc. degrees.
The work is quite a difficult one and at places incomprehensible for
even the brilliant students. This is evident from the fact that till
recently no translation of V.B.S. in English, Hindi or any other
language of country (except in Sanskrit) was available. The Bhaimi
Bhashya of Shri Bhim Sen Shastri has filled this long felt need.
Bhim Sen Shastri is an eminent Sanskrit scholar and grammar is
dear to his heart. He has been teaching Sanskrit grammar for more
than 3 decades and through his researches has carved out a place
for himself in the field. This is borne out by the commentary on
the धात्वर्थ-निर्णय of V.B.S. This commentary has won him laurels
from whithin and outside the country and has been given recogni-
tion by the Government of India too. The explanations of the
knotty points in simple and flowing language are remarkable. His
style of raising the doubt and putting forth its solution is commend-
able. Particularly praiseworthy are elucidations of Karikas 2, 5 and
13. At the end of the book, the author has given indexes which are
very useful for teachers, students and reasearch scholars. Dr Satya
Vrat Shastri, Professor and Head of Sanskrit Department, Delhi
University has contributed a scholarly introduction.
The book has been printed very nicely on maplitho paper and
is clothbound. This makes it very useful, particularly for libraries.
It is priced only Rs. 25/- which is considered on the low side keeping
in view the prices of research work of comparative merit.

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(5) A STUDY OF NYASA
Recently the famous research work of Shastriji under the cap-
tion 'Nyasa Paryalochana' (in Hindi) has been published. This is
an original contribution towards the study of 'Kasika-Vivarana Pan-
jika' also known as 'Nyasa' the earliest known commentary on
'Kasika' and it has been accepted for the award of Ph. D. degree by
the University of Delhi. Infact it is the result of Shastriji's many
years' continuous study and loving labour. Several current notions
have been boldly contradicted. For example, Nyasakara is still
believed to be a Buddhist, but in this thesis several evidences have
been put forward to show that he was a follower of Vedic religion.
The thesis is divided into six chapters. The first chapter,
while giving general introduction to the Nyasa and its author, deals
with the latter's time and place, the salient features of Nyasa, its
elegant and fluent style and a comparative study of Nyasa and Har-
datta's Padamanjari.
The second chapter deals with entirely a new research sub-
ject 'Later Grammarians' indebtedness to Nyasa'. This discusses
not only Paninian grammars but also includes the ten main non-
Paninian grammars, viz. Chandra, Jainendra, Katantra, Sakatayana,
Saraswatikanthabharana, Hemchandra's Sabdanusasana, Malayagiri-
sabdanusasana, Sankshiptasara, Mugdhabodha & Sarasvata.
The third chapter entitled 'Refutation of Nyasa by Later
Grammarians' discusses another topic not touched upon earlier by
anyone. Here the author examines the later grammarians' criticisms
of Nyasakara by presenting in elaborated details the reasons for
their soundness or otherwise.
The forth chapter deals with an important issue 'Correction
of Kasika texts in the context of Nyasa'. The author has pointed
out at length the grave mistakes committed by the modern eminent
scholars in editing Kasika and has offered rectification of several of
its incorrect texts with justifications in the context of Nyasa.
The fifth chapter gives a detailed account of the misconcep-
tions of Nyasakara and an hundred incorrect readings.