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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 633 में से

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पृष्ठ 621

“लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या”
[ वैद्य भीमसेन शास्त्री एम० ए०, पी० एच्० डी० कृत विश्लेषणात्मक भैमीनामक
विस्तृत हिन्दी व्याख्या सहित ] प्रथम भाग
लेखक के दीर्घकालिक व्याकरणाध्यापन का यह निचोड़ है। कौमुदी पर इस
प्रकार की विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषणात्मक हिन्दी व्याख्या आज तक नहीं निकली। इस
व्याख्या में प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, विभक्तिवचन, समास विग्रह, अनुवृत्ति अधिकार,
सूत्रगत तथा अनुवर्तित प्रत्येक पद का अर्थ परिभाषाजन्य विशेषता अर्थ की निष्पत्ति,
उदाहरण प्रत्युदाहरण तथा विस्तृत सिद्धि देते हुए छात्रों और अध्यापकों के मध्य आने
वाली प्रत्येक शंका का पूर्णतया विस्तृत समाधान प्रस्तुत किया गया है। इस हिन्दी व्याख्या
की देश-विदेश के डेढ़ सौ से अधिक विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। स्थान-स्थान
पर परिशिष्ट विषय के आलोडन के लिये बड़े यत्न से पर्याप्त विस्तृत अभ्यास सङ्गृहीत
किये गये हैं। इस व्याख्या की रूपमालाओं से अनुवादोपयोगी लगभग दो हज़ार शब्दों
का अर्थ सहित बृहत्सङ्ग्रह प्रस्तुत करते हुए णत्वप्रक्रियोपयुक्त प्रत्येक शब्द को चिह्नित
किया गया है। आज तक लघुकौमुदी की किसी भी व्याख्या में ऐसी विशेषता दृष्टि-
गोचर नहीं होती। व्याख्या की सबसे बड़ी विशेषता अव्ययप्रकरण है। प्रत्येक अव्यय के
अर्थ का विस्तृत विवेचन करके उसके लिए विशाल संस्कृत वाङ्मय से किसी न किसी
सूक्ति व प्रसिद्ध वचन को सङ्गृहीत करने का प्रयास किया गया है। अकेला अव्यय-
प्रकरण ही लगभग साठ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। एक विद्वान् समालोचक ने ग्रन्थ की
समालोचना करते हुए यहां तक कहा था कि—“यदि लेखक ने अपने जीवन में अन्य कोई
प्रणयन न कर केवल अव्यय-प्रकरण ही लिखा होता तो केवल यह प्रकरण ही उसे अमर
करने में सर्वथा समर्थ था।” सन्धिप्रकरण में लगभग एक हज़ार अभूतपूर्व नये उदाहरण
विद्यार्थियों के अभ्यास के लिए सङ्कलित किये गये हैं—उदाहरणार्थ अकेले ‘इको यणचि’
सूत्र पर ३५ नये उदाहरण दिये गये हैं। इस व्याख्या में ग्रन्थगत किसी भी शब्द की
रूपमाला को तद्वत् नहीं लिखा गया प्रत्युत प्रत्येक शब्द एवं धातु की पूरी-पूरी सार्थ
रूपमाला दी गई है। स्थान-स्थान पर समझाने के लिये नाना प्रकार के कोष्ठकों और
चक्रों से यह ग्रन्थ ओत प्रोत है। इस प्रकार का यत्न व्याकरण के किसी भी ग्रन्थ
पर अद्यावत् नहीं किया गया। यह व्याख्या छात्रों के लिए ही नहीं अपितु अध्यापकों
तथा अनुसन्धान-प्रेमियों के लिए भी अतीव उपयोगी है। अन्त में अनुसन्धानोपयोगी कई
परिशिष्ट दिये गये हैं। यह ग्रन्थ भारत-सरकार द्वारा सम्मानित हो चुका है। बृहदा-
कार २०×२६—८ साइज के लगभग सात सौ पृष्ठों में इस व्याख्या का केवल पूर्वार्ध
भाग समाप्त हुआ है। पूर्वार्ध भाग का लागत से भी कम मूल्य केवल तीस रुपया
रखा गया है।