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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अब प्रकृतिभाव के अभाव पक्ष में अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र प्रवृत्त करने के
लिये दो परिभाषाएं लिखते हैं—
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(४५) अनेकाल् शित् सर्वस्य ।१।१।५४॥
[ अनेकाल् य आदेश शिश्च, स सर्वस्य षष्ठी-निर्दिष्टस्य स्थाने
स्यात् ।] इति प्राप्ते—
(यहां पर वृत्ति हम ने जोड़ी है, ग्रन्थकार ने स्पष्ट होने से नहीं लिखी)
अर्थ —जिस आदेश में अनेक अल् (वर्ण) हों तथा जिस का शकार इत्सञ्ज्ञक
हो वह आदेश सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होता है । इस परिभाषा के प्राप्त होने पर
[अग्रिम परिभाषा प्रवृत्त हो जाती है] ।
व्याख्या—अनेकाल् ।१।१। शित् ।१।१। सर्वस्य ।६।१। समास —न एक =
अनेक, नञ्तत्पुरुष । अनेकोऽल् यस्य स =अनेकाल् बहुव्रीहि-समास । श् (शकार )
इत् यस्य स शित् बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(अनेकाल्) अनेक अलों वाला तथा
(शित्) शकार इत् वाला आदेश (सर्वस्य) सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होता है ।
'अल्' प्रत्याहार में सम्पूर्ण वर्ण आ जाते हैं, अत अल् या वर्ण पर्याय अर्थात्
एकार्थ-वाची शब्द हैं। जिस आदेश में एक से अधिक अल् या वर्ण हों अथवा जिस
आदेश के शकार की इत्सञ्ज्ञा होती हो तो वह आदेश सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर
होगा। अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र कहता है कि आदेश स्थानीय के अन्त्य अल् को हो,
परन्तु यह सूत्र अनेकाल् तथा शित् आदेशों को सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होना
बतलाता है। अत यह सूत्र अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र का अपवाद है ।१
अनेकाल् आदेश का उदाहरण यथा—रामै । यहां 'भिस्' स्थानीय के सम्पूर्ण
स्थान पर अतो भिस ऐस् (१४२) से ऐस् आदेश होता है । ऐस् में दो अल् हैं अत
यह अनेकाल् है । यह सूत्र न होता तो अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा भिस् के अन्त्य
सकार को फिर उस के बाधक आदेः परस्य (७२) से आदि को 'ऐस्' हो जाता ।
शित् आदेश का उदाहरण यथा—इत । यहां 'इदम्' स्थानीय के सम्पूर्ण स्थान
पर इदम इश् (११६७) से इश् आदेश होता है । इश् शित् है। यह सूत्र न होता तो
अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा इदम् के अन्त्य मकार को इश् हो जाता ।
शङ्का—जितने 'इश्' आदि शित् आदेश हैं वे सब अनेक अलों वाले हैं,
अनेकाल् होने के कारण ही वे सब सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर हो सकते हैं । पुन सूत्र
में 'शित्' के लिये विशेष यत्न क्या किया गया है ?
समाधान—इस प्रकार शित् ग्रहण के बिना भी कार्य के सिद्ध हो जाने से
महामुनि पाणिनि यह परिभाषा जतलाना चाहते हैं कि नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम्
है प्रतिपदोक्त (स्वाभाविक) नहीं—लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणम्
(प०) ।
१ इसी प्रकार आदेः परस्य (७२) सूत्र का भी यह अपवाद समझना चाहिये ।