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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 633 में से

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पृष्ठ 92

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७७
समास के कारण गो-शब्द से परे 'आम्' सुँप् का सुँपो धातु-प्रातिपदिकयोः (७२१)
सूत्र से लुक् हुआ २ है, तथापि प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र की सहायता
से यहां सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा इस की पद-सञ्ज्ञा अक्षुण्ण है; अतः गो शब्द के
अन्त में पदान्त एड् वर्त्तमान है; इस के आगे 'अग्र' शब्द का आदि अत् भी मौजूद
है। तो यहां गो-शब्द प्रकृति मे अर्थात् अपने स्वरूप में सन्धि-कार्य से रहित वैसे का
वैसा विकल्प से रहेगा। जहां प्रकृतिभाव होगा वहां विभक्ति लाने मे—'गोअग्रम्'
प्रयोग सिद्ध होगा। ध्यान रहे कि यहां प्रथम एडः पदान्तादति (४३) से पूर्व-रूप
प्राप्त था। पुनः उस का बाध कर अवङ् स्फोटायनस्य (४७) से वैकल्पिक अवङ् प्राप्त
होता था। यह सूत्र उस का अपवाद समझना चाहिये। जहां प्रकृति-भाव नहीं होगा वहां
अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र प्रवृत्त होगा¹।
यहां 'एङन्त' कहने का यह प्रयोजन है कि ओदन्त गो शब्द को ही प्रकृति
भाव हो, उकारान्त गोशब्द को न हो। यद्यपि गोशब्द स्वयम् ओदन्त है उकारान्त
नहीं; तथापि समास में गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र से ह्रस्व करने पर उका-
रान्त हो जाया करता है। उदाहरण यथा—'चित्रगु+अग्र' [चित्रा गावो यस्य स
चित्रगुः, बहुव्रीहि-समासः। चित्रगोरग्रम् इति षष्ठी-तत्पुरुष-समासे सुँब्लुकि रूपमिदम्]
यहां गोशब्द के एङन्त न होने से सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से प्रकृतिभाव नहीं होता;
इको यणचि (१५) से उकार को वकार हो कर विभक्ति लाने पर 'चित्रग्वग्रम्' प्रयोग
बन जाता है²।
यहां गोशब्द को पदान्त में प्रकृतिभाव इसलिये कहा गया है कि अपदान्त में
प्रकृतिभाव न हो जाये। यथा—'गो+अस्' (यहां गोशब्द से ङसिं वा ङस् प्रत्यय
किया गया है) यहां पदान्त न होने से यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होता, ङसि-ङसोश्च (१७३)
सूत्र से पूर्वरूप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से 'गोः' प्रयोग बन जाता है। इस
की विशेषतया सिद्धि 'अजन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरण' में 'गो' शब्द पर देखें³।
१. यहां कई लोग विकल्प-पक्ष में एडः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप कर 'गोऽग्रम्'
ऐसा मूल में पाठ लिखते हैं; यह उन की भूल है क्योंकि यह सूत्र अवङ्
स्फोटायनस्य (४७) सूत्र का अपवाद है, एडः पदान्तादति (४३) सूत्र का नहीं;
अतः इस के प्रवृत्त हो चुकने पर पक्ष में उसी की प्रवृत्ति करनी योग्य है। हां जब
वह प्रवृत्त हो चुकेगा तब वैकल्पिक होने से पक्ष में एडः पदान्तादति (४३) सूत्र
भी प्रवृत्त हो जायेगा।
२. ध्यान रहे कि यदि किसी अवयवी का एक अवयव विकृत हो जाये तो भी वह
वही रहता है अन्य नहीं हो जाता; यथा—यदि किसी कुत्ते की पूंछ कट जाए
तो भी वह कुत्ता ही रहता है अन्य नहीं हो जाता। इसी प्रकार यहां यद्यपि गो
शब्द का अवयव ओकार विकृत हो कर उकार बन गया है; तथापि वह गो शब्द
ही रहता है—एकदेशविकृतमनन्यवत् (परिभाषा)।
३. 'हे चित्रगोऽग्रम्' में भी प्रकृतिभाव न होगा, क्योंकि यहां एड् लाक्षणिक (कृत्रिम)