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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 633 में से

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पृष्ठ 90

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७५
(पदान्तात्) पदान्त (एङः) एङ् से (अति) अत् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+
पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वः) पूर्वरूप आदेश हो जाता है।
'एङ्' प्रत्याहार में 'ए, ओ' ये दो वर्ण आते हैं; यदि ये वर्ण पद के अन्त में
स्थित हों और इन से परे अत् अर्थात् ह्रस्व अकार हो तो पूर्व+पर के स्थान पर
पूर्वरूप एकादेश हो जाता है। यह सूत्र एचोऽयवायावः (२२) सूत्र का अपवाद है।
उदाहरण यथा—
(१) हरेऽव (हे हरे ! रक्षा करो)। 'हरे+अव' यहां 'हरे' यह सम्बोधन
का एकवचनान्त होने से पद है; इस पद के अन्त वाले एकार=एङ् से 'अव' शब्द
का आदि अत् परे है; अतः इन दोनों के स्थान पर प्रकृत सूत्र से एक पूर्वरूप 'ए' हो कर—
हर् 'ए' व='हरेऽव' प्रयोग सिद्ध हो जाता है।
(२) विष्णोऽव (हे विष्णो ! रक्षा करो)। 'विष्णो+अव' यहां भी पूर्ववत्
पूर्व=ओकार और पर=अकार के स्थान पर प्रकृत सूत्र से एक पूर्वरूप 'ओ' आदेश
हो कर—विष्ण् 'ओ' व='विष्णोऽव' प्रयोग सिद्ध हो जाता है।
नोट—'ऽ' यह चिह्न करें या न करें अपनी इच्छा पर निर्भर है। यह केवल
इस बात को प्रकट करता है कि यहां पहले अकार था¹। कई लोग इस चिह्न को
अकार समझ कर वैसा उच्चारण करते हैं, यह उन की भूल है; क्योंकि जब एकादेश
हो गया तो पुनः अवर्ण कहां से आया ?
सूत्र में पदान्त कहने का अभिप्राय यह है कि 'जे+अ=जयः, ने+अ=नयः,
भो+अ=भवः' इत्यादि में अपदान्त एङ् से अत् परे होने पर पूर्वरूप एकादेश न हो।
अभ्यास (११)
(१) निम्न-लिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद कर उसे सूत्रों द्वारा प्रमाणित करें—
१. अग्नेऽत्र । २. वायोऽत्र । ३. गुरवेऽदात् । ४. रामोऽस्ति । ५. पचते-
ऽसौ । ६. नमोऽस्तु । ७. संसारेऽधुना । ८. सर्पोऽहम् । ९. तेऽमी ।
१०. ब्राह्मणोऽब्रवीत् । ११. वटोऽयम् । १२. ब्रह्मणेऽस्तु । १३. वचनो-
ऽनुनासिकः । १४. स्थानेऽन्तरतमः । १५. पण्डितोऽपि ।
(२) सूत्रार्थ-समन्वय पूर्वक सन्धि करें—
१. ते+अकर्मकाः । २. पुरुषो+अत्र । ३. वने+अस्मिन् । ४. ततो+
अन्यत्र । ५. आधारो+अधिकरणम् । ६. सहयुक्ते+अप्रधाने । ७.
१. यह चिह्न अत्यन्त आधुनिक है, तभी तो भ्यसो भ्यम् (३२३) सूत्र के महाभाष्य
में लिखा है—किमयं 'भ्यम्'शब्द आहोस्विद् 'अभ्यम्'शब्दः ? कुतः सन्देहः ?
समानो निर्देशः । यहां समानो निर्देशः से सिद्ध होता है कि पहले उक्त चिह्न नहीं
था; प्रत्युत भट्टोजिदीक्षित के समय में भी नहीं था । अत एव समुदाङ्भ्यो यमो-
ऽग्रन्थे (१.३.७५) सूत्र पर दीक्षित ने वृत्ति में ('अग्रन्थे' इतिच्छेदः) ऐसा लिखा
है : यदि तब यह चिह्न होता तो 'यमोऽग्रन्थे' होने से छेद लिखना व्यर्थ था।