लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(३) विष्णूदय (विष्णो —तन्नामदेवविशेषस्य, सूर्यस्य वा उदय =आवि-
र्भाव उन्नतिर्वा विष्णूदय, विष्णु या सूय का उदय)। विष्णु+उदय यहा णकारोत्तर
उकार 'अक्' है, इस से परे 'उदय' शब्द का आदि उकार सवर्ण अच् है अत पूर्व+
पर के स्थान पर 'ऊ' यह सवर्ण दीर्घ एकादेश करने स---विष्ण् ऊ' दय='विष्णूदय'
प्रयोग सिद्ध होता है।
(४) होतॄकार' (होतृऋकार = होतॄकार । होता का ऋकार) । 'होतृ+
ऋकार यहा पूर्व+पर के स्थान पर ऋ' यह एक सवर्ण दीर्घ हो कर—होतृ ऋ'
कार='होतॄकार प्रयोग सिद्ध होता है।
ऌकार का उदाहरण अप्रसिद्ध तथा कठिन होने से यहा नही दिया गया,
सिद्धान्तकौमुदी म दिया गया है, वही देखें। यह सूत्र अकार के विषय मे आद् गुण
(२७) सूत्र का तथा अन्यत्र इको यणचि (१५) सूत्र का अपवाद है।
अभ्यास (१०)
(१) निम्नस्थ प्रयोगों म सन्धिविच्छेद कर सूत्रो द्वारा उसे सिद्ध करें—
१ दण्डाग्रम्। २ मधूदके। ३ दधीन्द्र । ४ होतॄश्य । ५ कुमारीहते ।
६ पितॄणम्। ७ विद्यानन्द । ८ भूमीश । ६ परमार्थ । १० यथार्थ ।
११ विधूदय । १२ विद्यार्थी । १३ महीन । १४ वेदाभ्यास ।
१५ कमलाकर । १६ कर्तॄणि । १७ भानूदय । १८ पक्तॄजीपम् ।
१६ तरूध्व॑म् । २० गिरीश ।
(२) अधो लिखित रूपा म सूत्रार्थसमन्वय करते हुए सन्धि करें—
१ कदा+अगात् । २ महती+इच्छा । ३ हरि+इन्द्र । ४ मधु+
उत्तमम् । ५ कर्तृ+ऋद्धि । ६ सनक+आदि । ७ फलानि+
इमानि । ८ कारु+उत्तम । ६ प्रति+ईक्षते । १० वधू+उत्सव ।
११ कदा+अत्र । १२ सती+ईश । १३ श्रद्धा+अस्ति ।
१४ मुनि+इन्द्र । १५ अन्त+आदि । १६ यदा+आसीत् ।
१७ नदी+इदानीम् । १८ तरु+उपेत । १६ भ्रातृ+ऋद्धि ।
२० तुल्य+आस्य ।
(३) अक सवर्णे दीर्घ सूत्र किस २ सूत्र का अपवाद है ?
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(४३) एड पदान्तादति।६।१।१०५॥
पदान्तादेङोऽति परे पूर्व-रूपम् एकादेश स्यात् । हरेऽव । विष्णोऽव ॥
अर्थ—पदान्त एङ् से अत् परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पूर्वरूप
एकादेश हो ।
व्याख्या—पदान्तात् ।५।१। एङ ।५।१। अति ।७।१। पूर्व-परयो ।६।२। एकः
।१।१। (एक पूर्व-परयो यह अधिकृत है)। पूर्व ।१।१। (अमि पूर्व से) । अर्थ —