लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५८३
९. प्रतिपद् (पड़वा तिथि) भागुरिमते—प्रतिपद् + आ (आप्) = प्रतिपदा ।¹
१०. वीरुध् (विस्तृत बेल) भागुरिमते—वीरुध् + आ (आप्) = वीरुधा ।²
इत्थम्—दृग्—दृशा (नेत्र); शुच्—शुचा (शोक); रुप्—रुपा (क्रोध ;
विपद्—विपदा (विपत्ति); आपद्—आपदा; रुच्—रुचा (कान्ति); मृद्—मृदा
(मिट्टी); त्वच्—त्वचा (चमड़ी); त्विष्—त्विषा (कान्ति); ऋच्—ऋचा (ऋङ्मन्त्र)
आदि समझने चाहिये ।
परन्तु शेखरकार श्रीनागेश इस आप् वाले पक्ष को अप्रामाणिक मानते हैं ।
विशेष जिज्ञासु उन का मत वही देखें ।
[लघु०] इत्यव्ययप्रकरणं समाप्तम् ॥
इति सुबन्तम् ॥
इति पूर्वार्धम् ॥
अर्थः—यहां अव्ययप्रकरण और इस के साथ सुबन्तप्रकरण समाप्त होता है ।
किञ्च ग्रन्थ का पूर्वार्ध भी यहां समाप्त समझना चाहिये ।
अभ्यास (४६)
(१) 'मिथ्यो' का स्वरादिगण में पाठ उपयुक्त है या नहीं, विवेचन करें ।
(२) तद्धितश्चासर्वविभक्तिः सूत्रगत 'असर्वविभक्तिः' को स्पष्ट करते हुए यह
बताएं कि इस सूत्र के रहते परिगणन की क्या ज़रूरत है ?
(३) उपसर्गप्रतिरूपक तथा विभक्तिप्रतिरूपकों का सोदाहरण विवेचन करें ।
(४) निम्नस्थ अव्ययों को सार्थ सोदाहरण स्पष्ट करें तथा इन की अव्यय-
संज्ञा करने वाला सूत्र भी अर्थसहित लिखें—
अथ, पठितुम्, परस्तात्, स्थाने, अलम्, नाना, त्रिसृपः, यर्हि, पुरा,
अस्ति, ऐषमः, अन्तरा, चिरम्, सार्धम्, कच्चित्, परुत्, जीवसे, खलु,
प्रसह्य, यथाशक्ति, किल, सनुतर् ।
(५) 'परिगणनं कर्तव्यम्' कह कर किन २ प्रत्ययों का परिगणन किया है ?
(६) स्वर्, अन्तर्, प्रातर् यदि सकारान्त हों तो क्या अनिष्ट होगा ?
(७) भागुरि के मत में निम्नस्थों का क्या रूप होगा सोदाहरण लिखें—
क्षुध्, वाच्, अपिधानम्, प्रतिपद्, मुद्, अवगाहः, निश् ।
(८) मान्त कृत्प्रत्यय कौन २ से हैं ? तदन्तों की अव्ययसंज्ञा कैसे होती है ?
(९) अव्ययसंज्ञा की अन्वर्थता सिद्ध कर अव्यय का सार्थ लक्षण लिखें ।
(१०) 'यत्र' का पाठ चादियों में क्यों किया गया है ?
१. देवानामय यक्षाणां गन्धर्वाणां च सत्तम । आदौ प्रतिपदा येन त्वमुत्पन्नोऽसि
पावक (वराहपुराण, महातपोपाख्यान, अग्न्युत्पत्तिनामाध्याय) ।
२. श्रेष्ठमसि भेषजानां वसिष्ठं वीरुधानाम् (अथर्व० ६.२१.२) ।