लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 563, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें५४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
स्वरप्रतिरूपक यथा—
[५०] अ ॥
१ सम्बोधन—अ अनन्त । २ आक्षेप (निन्दा) में—अपचसि जाल्म (सि०
कौ०) हे दुष्ट ! तुम गर्हितरीत्या पकाते हो । अनेक वैयाकरण इस अर्थ में नञ् के
नकार का नञो नलोपस्तिङि क्षेपे (वा०) वार्तिक द्वारा लोप हुआ मानते हैं, स्वतन्त्रतया
'अ' निपात का प्रयोग नहीं ।
[५१] आ ॥
१ पूर्व प्रक्रान्त वाक्य के अन्यथा करने में—आ एव नु मन्यसे (काशिका), अब
तू ऐसा मानता है अर्थात् पहले त ऐसा नहीं मानता था अब मानने लगा है। २ स्मरण
में—आ एव किल तत् (काशिका), ओह ! वह ऐसा ही है । इस का विवेचन पीछे
निपात एकाजनाङ (५५) सूत्र पर कर चुके हैं ।
[५२] इ ॥
१ सम्बोधन—इ इन्द्र पश्य (काशिका), ऐ ! इन्द्र को देखो । २ विस्मय—
इ इन्द्र (सि० कौ०), ओह ! यह इन्द्र है ।
[५३] ई ॥
१ सम्बोधन—ई ईश ! । ई ईदृश ससार (गणरत्न०) ।
[५४] उ ॥
१ सम्बोधन—उ उत्तिष्ठ (गणरत्न०) । २ वितर्क—उ उमेश (सि० कौ०),
जान पड़ता है कि उमेश है ।
[५५–५६] ऊ । ए । ऐ । ओ । औ ॥
१ सम्बोधन—ऊ उपरे बीजं वपति । ए इतो भव । ऐ वाचं देहि । ओ
धावय (गणरत्न०)। औ महात्मन् ! ।
नोट—इन स्वरप्रतिरूपक निपातों की अच् परे होने पर 'निपात एकाजनाङ्
(५५) सूत्रद्वारा प्रगृह्यसंज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है, अतः स्वरसन्धि नहीं
होती ।
[६०] पशु ॥
१ ठीक तरह में —सोध नयन्ति पशु मन्यमाना (ऋ० ३।५३।२३) ।
[६१] शुकम् ॥
१ शीघ्र—शुकं गच्छति (गणरत्न०), शीघ्र जाता है ।
नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। कुछ कोषकार यहां 'शकम्' पाठ मानते
हैं ।
१ स्वरादिरिति सम्बोधन भर्त्सनाऽनुकम्पा-पादपूरण-प्रतिषेधेषु यथासम्भवं भवति—
इति गणरत्नमहोदधौ वर्धमानः ।