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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 633 में से

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पृष्ठ 371

भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

द्रुह्, स्निह्' शब्द सिद्ध होते हैं । इन दोनों की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'द्रुह्' शब्द के
समान होती है । केवल एकाचो बशो भष्० (२५३) से भष्भाव नहीं होता । स्नुह्
(स्नुह्यतीति स्नुक् वमन करने वाला) शब्द की रूपमाला यथा—
प्रथमा स्नुक्-ग्, स्नुट्-ड् स्नुहौ स्नुहः
द्वितीया स्नुहम् " "
तृतीया स्नुहा स्नुग्भ्याम्, स्नुड्भ्याम् स्नुग्भिः, स्नुड्भिः
चतुर्थी स्नुहे " " स्नुग्भ्यः, स्नुड्भ्यः
पञ्चमी स्नुहः " " " "
षष्ठी " स्नुहोः स्नुहाम्
सप्तमी स्नुहि " स्नुक्षु, स्नुट्सु स्नुट्त्सु
सम्बोधन हे स्नुक्-ग् ट्-ड! हे स्नुहौ! हे स्नुहः !
इसी प्रकार स्निह् (स्निह्यतीति स्निक्, स्नेह करने वाला) के रूप चलते हैं ।
विश्ववाह् (जगत् को धारण करने वाला, भगवान्) । विश्वं वहतीति विश्व-
वाट् । विश्वकर्मोपपद वहँ प्रापणे (भ्वा० उ०) धातु से कर्त्ता में वहश्च (३।२।६४)
सूत्र द्वारा ण्विं प्रत्यय, णित्त्व के कारण उपधावृद्धि तथा ण्विं के चले जाने पर उपपद-
समास करने से 'विश्ववाह्' शब्द निष्पन्न होता है ।
'विश्ववाह्' शब्द के सर्वनामस्थान प्रत्ययों में लिहशब्दवत् रूप बनते हैं ।
भसञ्ज्ञकों में कुछ विशेष होता है । वह अग्रिम सूत्रों में बताया जाता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा सूत्रम्—(२५६) इग्यणः सम्प्रसारणम् ।१।१।४५॥
यणः स्थाने प्रयुज्यमानो य इक्, स सम्प्रसारणसञ्ज्ञः स्यात् ॥
अर्थ—यण् के स्थान पर विधान किया इक् सम्प्रसारणसञ्ज्ञक हो ।
व्याख्या—इक् १।१। यणः ६।१। सम्प्रसारणम् १।१। अर्थ—(यण्) यण्
के स्थान पर विधान किया (इक्) इक् (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारणसञ्ज्ञक होता है ।
यहां यथासङ्ख्य अथवा स्थानकृत आन्तर्य से यकारस्थानिक इवर्ण, वकारस्थानिक
उवर्ण, रेफस्थानिक ऋवर्ण तथा लकारस्थानिक ऌवर्ण सम्प्रसारणसञ्ज्ञक होगा ।
इस शास्त्र में सम्प्रसारण का दो प्रकार के स्थानों पर उपयोग किया जाता
है । एक विधिसूत्रों में और दूसरा अनुवादसूत्रों में । जिन सूत्रों में सम्प्रसारण का
साक्षात् विधान किया जाता है वे विधिसूत्र कहाते हैं । यथा—वाह ऊठ् (२५७)
भसञ्ज्ञक वाह् के स्थान पर सम्प्रसारण ऊठ् हो । वचिस्वपि० (५४७) वच्, स्वप् और
यजादि धातुओं को क्तिङ् परे होने पर सम्प्रसारण हो । इत्यादि । जहां सम्प्रसारण का
नाम ले कर कोई अन्य कार्य किया जाता है वहां सम्प्रसारण का अनुवाद होता है ।
यथा—सम्प्रसारणाच्च (२५८) सम्प्रसारण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान
पर पूर्वरूप एकादेश हो । हलः (८१६) हल् से परे सम्प्रसारण को दीर्घ हो ।
इत्यादि ।
यणस्थानिक् इक् की सम्प्रसारणसञ्ज्ञा होने से अनुवादस्थलों में कोई बाधा