लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५५
सप्तमी द्रुहि द्रुहोः ध्रुक्षु, ध्रुट्त्सु, ध्रुट्सु
सम्बोधन हे ध्रुक्,-ग्, ध्रुट्,-ड्! हे द्रुहौ! हे द्रुहः!
इसीप्रकार—मित्रद्रुह्, (मित्राय द्रुह्यति=मित्रद्रोही) आदि शब्दों के रूप
होते हैं।
मुह वैचित्ये (दिवा० प०) धातु से क्विन् तथा उस का सर्वापहार लोप करने
से 'मुह्' (मोह करने वाला) शब्द निष्पन्न होता है। इस की प्रक्रिया 'द्रुह्' शब्दवत्
होती है, केवल भष्भाव नहीं होता। रूपमाला यथा—
प्रथमा मुक्,-ग्, मुट्,-ड् मुहौ मुहः
द्वितीया मुहम् ,, ,,
तृतीया मुहा मुग्भ्याम्, मुड्भ्याम् मुग्भिः, मुड्भिः
चतुर्थी मुहे ,, ,, मुग्भ्यः, मुड्भ्यः
पञ्चमी मुहः ,, ,, ,, ,,
षष्ठी ,, मुहोः मुहाम्
सप्तमी मुहि ,, मुक्षु, मुट्त्सु, मुट्सु
सम्बोधन हे मुक्,-ग्, मुट्,-ड्! हे मुहौ! हे मुहः!
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५५) धात्वादेः षः सः। ६।१।६४॥
(धातोरादेः षस्य सः स्यात्)। स्नुक्, स्नुग्, स्नुट्, स्नुड्। एवं स्निक्,
स्निग्, स्निट्, स्निड्। विश्ववाट्, विश्ववाड्। विश्ववाही। विश्ववाहः।
विश्ववाहम्। विश्ववाहौ॥
अर्थः—धातु के आदि षकार के स्थान पर सकार आदेश हो।
व्याख्या—धात्वादेः ।६।१। षः ।६।१। सः ।१।१। समासः—धातोर् आदिः=
धात्वादिः। तस्य=धात्वादेः, षष्ठीतत्पुरुषः। स इत्यत्र अकार उच्चारणार्थः। अर्थः—
(धात्वादेः) धातु के आदि (षः) ष् के स्थान पर (सः) स् आदेश होता है।
'धातु' कहने से 'षोडशः, षट्' आदि में षकार को सकार नहीं होता तथा
'आदि' कथन से 'कषति' आदियों में धातु के अन्त्य षकार को सकार नहीं होता।
ष्णुह उद्गिरणे (दिवा० प०), ष्णिह प्रीतौ (दिवा० प०) इन धातुओं के
आदि षकार को प्रकृत-सूत्र से सकार हो कर णकार को भी नकार हो जाता है।
क्योंकि यह नियम है कि—निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः अर्थात् (निमित्त-अपाये)
निमित्त=कारण के नाश होने पर (नैमित्तिकस्य) नैमित्तिक—उस निमित्त से उत्पन्न
हुए कार्य का भी (अपायः) नाश हो जाता है¹। यहां षकार से परे होने के कारण
ही नकार को रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) से णकार हुआ था। जब निमित्त
षकार ही न रहा तब नैमित्तिक कार्य णकार भी न रहा पुनः नकार हो गया।
स्नुह्, स्निह्—दोनों से कर्त्ता में क्विन् हो कर उस का सर्वापहार लोप करने
१. यहां नाश से तात्पर्य पुनः पूर्वावस्था में आ जाना है, लोप नहीं।