लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५१
गीर्हूहू (कमल), पर्णहूहू (वसन्त ऋतु)—प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
नोट—हलन्त शब्दों की अजादि विभक्तियों में प्राय: कोई कार्य विशेष नहीं
करना पड़ता। व्यञ्जनों को स्वरों के साथ मिलाना मात्र ही कार्य होता है। हलादि
विभक्तियों में कुछ कार्य होता है। अर्थात् सुं, भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुँप्, इन पाँच
स्थलों में ही रूप बनाने पड़ते हैं। हम आगे प्राय: इन में ही सिद्धि करेंगे।
दुह् = दोहने वाला (दोग्धीति धुक्)। दुहँ प्रपूरणे (अदा० उ०) धातु से कर्त्ता
में क्विप् च (८०२) से क्विप् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो 'दुह्' शब्द
निष्पन्न होता है। अब इस से स्वादियों की उत्पत्ति होती है-
'दुह् + स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप हो 'दुह्' इस
अवस्था में हो ढः (२५१) सूत्र प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम अपवादसूत्र प्रवृत्त
होता है -
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५२) दादेर्धातोर्घः ।८।२।३२॥
झलि पदान्ते चोपदेशे दादेर्धातोर्हस्य घः स्यात् ॥
अर्थः-उपदेश में जो दकारादि धातु, उस के हकार को घकार हो जाता है
झल् परे होने पर या पदान्त में ।
व्याख्या-दादेः ।६।१। धातोः ।६।१। हः ।६।१। (हो ढः से) । घः ।१।१।
झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१।
(स्कोः० से) । यहां भाष्यकार के व्याख्यान से उपदेश में ही 'दादि' ग्रहण किया जाता
है। समासः-दः=दकारः, आदी आदिर्वा यस्य स दादिस्तस्य दादेः, बहुव्रीहिसमासः ।
अर्थः-(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (दादेः)
उपदेश में दकार आदि वाली (धातोः) धातु के (हः) हकार के स्थान पर (घः) घ्
आदेश हो जाता है। घकार में अकार उच्चारणार्थ है। यह सूत्र यद्यपि हो ढः
(८.२.३१) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध है; तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद
है—अपवादो वचनप्रामाण्यात् ।
'उपदेश' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि 'अधोक्' यहां दुह के अजादि होने पर
भी घत्व हो जाये और 'दामलिद्' यहां दादि धातु होने पर भी घत्व न हो। १
१. 'अधोक्' यह 'दुह' धातु के लङ् लकार के प्रथम वा मध्यमपुरुष का एकवचन है।
दादेर्धातोर्घः में 'उपदेश' ग्रहण न करने से 'अदोह्' इस स्थिति में हकार को घकार
नहीं हो सकता; क्योंकि 'दुह्' धातु को अट् का आगम होने से यदागमास्तद्-
गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते परिभाषा के अनुसार वह अजादि हो गई है, दादि
नहीं रही; पुनः यदि यहां 'उपदेश' ग्रहण करते हैं तो हकार को घकार हो जाता
है; क्योंकि उपदेश = आद्योच्चारण में तो यह दादि ही थी, अजादि तो बाद =
दूसरे उच्चारण में बनी है। घकार करने पर एकाचः० (२५३) सूत्र से दकार को
धकार हो जश्त्व चर्ख करने से- 'अधोक्-ग्' ये दो रूप सिद्ध हो जाते-हैं। इसी