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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 633 में से

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पृष्ठ 365

३५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
लिहू+स्(सुं)। यहां हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप हो
जाता है। तब प्रत्ययलोपे० (१६०) सूत्र की सहायता से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा
'लिहू' की पदसञ्ज्ञा हो पद के अन्त में हकार को हो ढ (२५१) से ढकार हो जाता है।
पुनः झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक
टकार करने से—'लिट्, लिड्' ये दो रूप बनते हैं।
लिहू + औ = लिहौ । लिहू + अस् (जस्) = लिह । लिहू + अम् = लिहम् ।
लिहू + औ (औट्) = लिहौ। लिहू + अस् (शस्) = लिह । लिहू + आ (टा) = लिहा।
'लिहू + भ्याम्' यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से 'लिहू' की पद-
सञ्ज्ञा है, हकार पदान्त में स्थित है। अतः हो ढ (२५१) से हकार को ढकार तथा
झलां जशोऽन्ते (६७) से ढकार को डकार हो कर 'लिड्भ्याम्' सिद्ध होता है। भिस्
और भ्यस् में भी इसी प्रकार 'लिड्भिः' और 'लिड्भ्यः' रूप बनते हैं।
लिहू + ए (ङे) = लिहे । लिहू + अस् (ङसिं वा ङस्) = लिह ।
लिहू + ओस् – लिहो । लिहू + आम् = लिहाम् । लिहू + इ (ङि) = लिहि ।
सप्तमी के बहुवचन में 'लिहू+सु' (सुप्) इस स्थिति में हो ढ (२५१) सूत्र से
पदान्त हकार को ढकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से उसे जश्त्व–डकार हो कर
'लिड् + सु' बना। अब खरि च (८ ४ ५४) के असिद्ध होने से ङः सि धुट् (८ ३ २६)
द्वारा वैकल्पिक धुट् करने में अनुबन्धों के चले जाने पर—'१ लिड् ध् सु २ लिड् सु'
हुआ। अब यहां ष्टुना ष्टुः (६४) सूत्र द्वारा प्रथम रूप में धकार को ढकार और दूसरे
रूप में सकार को षकार प्राप्त होता है। इस का न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) से निषेध
हो जाता है। पुनः खरि च (७४) सूत्र द्वारा प्रथम रूप में धकार को तकार और उस
तकार को खर् मान कर डकार को टकार करने से—'लिट्त्सु' । दूसरे रूप से डकार
को टकार करने पर—'लिट्सु' । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं।
ध्यातव्य—'लिट्त्सु, लिट्सु' इन दोनों रूपों में खरि च (७४) द्वारा किया गया
चर्त्व असिद्ध है, अतः चयो द्वितीया० (वा० १४) से प्रथम रूप में तकार को थकार
तथा दूसरे रूप में टकार को ठकार नहीं होता।
भष् परे होने पर हो ढ (२५१) सूत्र के उदाहरण 'वोढा' आदि हैं, जो आगे
मूल में ही स्पष्ट हो जाएंगे।
'लिहू' (चाटने वाला) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० लिट्-ड् लिहौ लिह | प० लिह लिड्भ्याम् लिड्भ्य
द्वि० लिहम् " " | ष० " लिहोः लिहाम्
तृ० लिहा लिड्भ्याम् लिड्भि | स० लिहि " लिट्त्सु, त्सु
च० लिहे " लिड्भ्य | सं० हे लिट्, ड्! हे लिहौ! हे लिह !
इसी प्रकार—मधुलिह् (भ्रमर), पुष्पलिह (भ्रमर), कुसुमलिह (भ्रमर),
गुडलिह (गुड़ चाटने वाला), शिरोरुह् (केश), भूरुह् (वृक्ष), सरोरुह् (कमल), सर-