लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३३
प्र० ० द्वे ० | प० ० द्वाभ्याम् ०
द्वि० ० ,, ० | ष० ० द्वयोः ०
तृ० ० द्वाभ्याम् ० | स० ० ,, ०
च० ० ,, ० सम्बोधन नहीं होता ।
नोट — ध्यान रहे कि स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में ‘द्वि’ शब्द के एक समान
रूप होते हैं परन्तु इन दोनों की प्रक्रिया में बड़ा अन्तर है ।
[लघु०] त्रीणि २ ॥
व्याख्या — त्रि (तीन) शब्द भी विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी
होता है । यह सदा बहुवचनान्त होता है । नपुंसकलिङ्ग में इस की प्रक्रिया यथा—
‘त्रि + अस्’ (जस् व शस्) इस स्थिति में शि आदेश, सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा,
नुम् आगम और सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) ने उपधादीर्घ हो कर अट्कुप्वाङ्०
(१३८) से नकार को णकार आदेश करने में ‘त्रीणि’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
त्रि + भिस् = त्रिभिः । त्रि + भ्यस् = त्रिभ्यः । त्रि + सु (सुप्) = त्रिषु ।
षष्ठी के बहुवचन में ‘त्रि + आम्’ इस दशा में त्रेस्त्रयः (१६२) से त्रय आदेश,
ह्रस्वमूलक नुट् आगम तथा नामि (१४६) से दीर्घ हो कर नकार को णकार करने से
‘त्रयाणाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । रूपमाला यथा—
प्र० ० ० त्रीणि | प० ० ० त्रिभ्यः
द्वि० ० ० ,, | ष० ० ० त्रयाणाम्
तृ० ० ० त्रिभिः | स० ० ० त्रिषु
च० ० ० त्रिभ्यः सम्बोधन नहीं होता ।
अब सुप्रसिद्ध इदन्त नपुंसक ‘वारि’ (जल) शब्द का विवेचन करते हैं । णि-
जन्त वृञ् वरणे धातु से वसि-वपि-यजि० (उणा० ५६४) इस औणादिक सूत्रद्वारा इन्
प्रत्यय करने पर ‘वारि’ शब्द निष्पन्न होता है । वारयति उष्णतादिकमिति वारि ।
आपः स्त्री भूमिन् वार्वारि सलिलं कमलं जलम् — इत्यमरः । गजबन्धनी (हाथी बान्धने
की भूमि), सरस्वती आदि अर्थों में वारिशब्द स्त्रीलिङ्ग होता है, परन्तु यहां जल अर्थ
में नित्यनपुंसक ही है ।
वारि + सु (सुँ) । यहां अदन्त न होने से अतोऽम् (१३४) द्वारा सकार को
अम् आदेश नहीं होता । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है —
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४४) स्वमोर्नपुंसकात् ।७।१।२३॥
लुक् स्यात् । वारि ॥
अर्थः—नपुंसकलिङ्ग से परे सुँ और अम् का लुक् हो ।
व्याख्या—स्वमोः ।६।२। नपुंसकात् ।५।१। लुक् ।१।१। (षड्भ्यो लुक् से) ।
समासः—सुँश्च अम् च = स्वमौ, तयोः । इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(नपुंसकात्) नपुंसक
से परे (स्वमोः) सुँ और अम् का (लुक्) लुक् हो जाता है । यह उत्सर्गसूत्र है इस