सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

३३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
और स्त्रीलिङ्ग में इस का उच्चारण 'विश्वपा'शब्दवत् होता है। नपुंसक के उच्चा-
रण में कुछ विशेष है—यह अग्रिमसूत्र द्वारा दर्शाया जाता है—
[लघु०] विधि सूत्रम्—(२४३) ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ।१।२।४७॥
अजन्तस्येत्येव । श्रीपम् । ज्ञानवत् ॥
अर्थ —नपुंसकलिङ्ग में अजन्त प्रातिपदिक को ह्रस्व हो जाता है।
व्याख्या—ह्रस्व ।१।१। नपुंसके ।७।१। प्रातिपदिकस्य ।६।१। ह्रस्व, दीर्घ और
प्लुत सदा अच् के स्थान पर ही हुआ करते हैं। जहां इन का विधान होता है वहां
'अच' (अच् के स्थान पर) यह षष्ठ्यन्त पद उपस्थित हो जाता है [यह अचश्च
(१ २ २८) परिभाषा का तात्पर्य है]। यहां भी 'अच' पद उपस्थित हो कर 'प्राति-
पदिकस्य' का विशेषण बन येन विधिरतदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि के कारण—'अजन्त-
स्य प्रातिपदिकस्य' बन जाता है। अर्थ —(नपुंसके) नपुंसकलिङ्ग में (अच) अजन्त
(प्रातिपदिकस्य) प्रातिपदिक के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है। अलोऽन्त्य-
परिभाषा से अन्त्य अच् के स्थान पर ही ह्रस्व होता है।
'श्रीपा' यहां अन्त्य आकार को ह्रस्व हो कर 'श्रीप'। अब इस में स्वादिप्रत्यय
उत्पन्न हो कर सम्पूर्ण प्रक्रिया 'ज्ञान' शब्दवत् होती है। रूपमाला यथा—
प्र० श्रीपम् श्रीपे श्रीपाणि | प० श्रीपात् श्रीपाभ्याम् श्रीपेभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० श्रीपस्य श्रीपयोः श्रीपाणाम्
तृ० श्रीपेन श्रीपाभ्याम् श्रीपैः | स० श्रीपे ,, श्रीपेषु
च० श्रीपाय , श्रीपेभ्यः | सं० हे श्रीप ! हे श्रीपे ! हे श्रीपाणि!
नोट—'श्रीपाणि' आदि प्रयोगों में एकाजुत्तरपदे न (२८६) से ही णत्व होता
है। भिन्न पद होने के कारण अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व नहीं हो सकता।
इसी प्रकार विशेष्य के नपुंसक होने पर—विश्वपा, गोपा, कीलालपा, सोमपा
आदि धात्वन्त आकारान्त शब्दों के उच्चारण होते हैं।
(यहां आकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
०
[लघु०] द्वे २ ॥
व्याख्या—'द्वि' (दो) शब्द त्रिलिङ्गी है। विशेष्य के नपुंसक होने पर यह भी
नपुंसक हो जाता है।
'द्वि+औ' यहां त्यदादीनाम (१६३) से इकार को अकार, नपुंसकाच्च
(२३५) से 'औ' को 'शी' आदेश, अनुबन्धलोप तथा आद् गुण (२७) से गुण एका-
देश करने स 'द्वे' प्रयोग सिद्ध होता है।
'द्वि+भ्याम्'। त्यदाद्यत्व और सुपि च (१४१) से दीर्घ हो 'द्वाभ्याम्'।
'द्वि+ओस्'। त्यदाद्यत्व, ओसि च (१४७) से अकार को एकार तथा एचो-
ऽयवायाव (२२) में अय् आदेश करने पर सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग हो
कर 'द्वयोः' प्रयोग सिद्ध होता है। सम्पूर्ण रूपमाला यथा—