लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६५
अर्थः—अजादि तृतीयादि विभक्ति परे हो तो 'क्रोष्टु' विकल्प से तृज्वत् हो ।
व्याख्या—क्रोष्टुः ।१।१। तृज्वत् इत्यव्ययपदम् । (तृज्वत्क्रोष्टुः से)। विभाषा
इत्यव्ययपदम् । तृतीयादिषु ।७।३। अचि ।७।१। 'अचि' पद 'तृतीयादिषु' का विशेषण
है, अतः तदादिविधि हो कर 'अजादिषु' बन जायेगा । अर्थः—(अचि) अच् जिस के
आदि में है ऐसी (तृतीयादिषु) तृतीया आदि विभक्ति परे हो तो (क्रोष्टुः) क्रोष्टुशब्द
(विभाषा) विकल्प कर के (तृज्वत्) तृजन्त के समान होता है ।
तृतीयादि विभक्तियों में अजादि विभक्तियां आठ हैं । १ टा (आ), २ ङे (ए),
३ ङसिँ (अस्), ४ ङस् (अस्), ५ ओस्, ६ आम्, ७ ङि (इ), ८ ओस् ।
जिस पक्ष में क्रोष्टृ आदेश न होगा वहां सर्वत्र घिसञ्ज्ञा हो कर 'शम्भु' शब्द
के समान प्रक्रिया होगी ।
तृतीया के एकवचन में 'क्रोष्टु + आ' इस स्थिति में अजादि तृतीयादि विभक्ति
परे होने से विकल्प से तृज्वद्भाव हुआ । तृज्वद्भावपक्ष में 'क्रोष्टृ + आ' इस स्थिति में
इको यणचि (१५) से ऋकार को रेफ आदेश हो कर 'क्रोष्ट्रा' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
तृज्वत् के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो कर टा को ना आदेश करने पर 'क्रोष्टुना' रूप सिद्ध
होता है ।
भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् तृतीयादि होने पर भी हलादि हैं, अतः इन में
तृज्वद्भाव न होगा— क्रोष्टुभ्याम्, क्रोष्टुभिः, क्रोष्टुभ्यः, क्रोष्टुषु ।
चतुर्थी के एकवचन में 'क्रोष्टु + ए' इस दशा में विकल्प कर के तृज्वद्भाव
हुआ । तृज्वद्भावपक्ष में यण् हो— 'क्रोष्ट्रे' रूप सिद्ध हुआ । तदभावपक्ष में घेर्ङिति
(१७२) द्वारा गुण हो कर अव् आदेश करने से—'क्रोष्टवे' रूप सिद्ध होता है ।
तृज्वद्भावपक्ष में पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'क्रोष्टृ + अस्' इस दशा
में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२०८) ऋत उत् ।६।१।१०७॥
ऋतो ङसिँ-ङसोरति उद् एकादेशः । रपरः ।।
अर्थः—ऋत् से ङसिँ अथवा ङस् का अत् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर
उत् एकादेश हो । उरण्रपरः (२६) से रपर भी हो जायेगा ।
व्याख्या—ऋतः ।५।१। ङसिँ-ङसोः ।६।२। (ङसिँ-ङसोश्च से) । अति ।७।१।
(एङः पदान्तादति से)। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत
है)। उत् ।१।१। अर्थः—(ऋतः) ह्रस्व ऋकार से (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ अथवा ङस्
का (अति) अत् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (उत्)
ह्रस्व उकार आदेश होता है । उरण्रपरः (२६) से रपर हो कर 'उर्' आदेश बन
जायेगा ।
प्रश्न—प्रत्यय अर्थात् विधीयमान अण् अपने सवर्णों का ग्राहक नहीं होता—
यह पीछे अणुदित्० (११) सूत्र में कहा गया है । इस नियमानुसार ऋत उत् यहां
विधीयमान उकार से सवर्णों का ग्रहण न होगा । इस से दीर्घ ऊकार आदि के एका-