लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
न्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ शब्दो की उपधा को दीर्घ
हो ।
व्याख्या—अप्-तृन्—प्रशास्तॄणाम् ।६।३। उपधाया ।६।१। (नोपधायाः से)।
दीर्घ ।१।१। (ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१।
(सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से) । समास — आपश्च तृन् च तृच् च स्वसा च नप्ता च
नेष्टा च त्वष्टा च क्षत्ता च होता च पोता च प्रशास्ता च = अप्तृन्तृच्—प्रशास्तारः,
तेषाम् = अप्तृन्—प्रशास्तॄणाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । तृन् और तृच् प्रत्यय हैं अतः प्रत्यय-
ग्रहणपरिभाषा द्वारा तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (अप्तृन्—प्रशास्तॄणाम्) अप्,
तृन्प्रत्ययान्त, तृच्प्रत्ययान्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ तथा प्रशास्तृ
शब्दो की (उपधाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ होता है (असम्बुद्धौ)
सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर । अन्त्य वर्ण से पूर्व वर्ण
उपधासञ्ज्ञक होता है—यह पीछे (१७६) सूत्र पर कहा जा चुका है ।
इस सूत्र पर विशेष विचार स्वयं ग्रन्थकार आगे ऋदन्त प्रकरण में करेंगे; अतः
हम भी उस की वही व्याख्या करेंगे ।
'क्रोष्टन् + स्' यहाँ एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार 'क्रोष्टन्' शब्द तृजन्त
है । इस की उपधा नकार से पूर्व टकारोत्तर अकार है । सम्बुद्धिभिन्न सुँ = सर्वनाम-
स्थान परे है ही, अतः प्रकृतसूत्र से उपधा को दीर्घ हो गया तो—'क्रोष्टान् + स्' ।
इस स्थिति में हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप हो कर न लोपः प्राति-
पदिकान्तस्य (१८०) से नकार का भी लोप हो जाने से—'क्रोष्टा' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
नोट—यद्यपि सुं मे सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) सूत्र द्वारा भी उपधा-
दीर्घ सिद्ध हो सकता था तथापि औ, जस् आदियों मे नान्त न होने से उपधादीर्घ
अप्राप्त था अतः प्रकृतसूत्र का बनाना आवश्यक था । तब यह सुँ मे न्यायवशात् प्रवृत्त
हो जाता है ।
'क्रोष्टु + औ = क्रोष्टृ + औ' यहाँ सुँ परे न होने से अनङ् आदेश नही होता ।
ऋतो ङि० (२०४) से गुण तथा अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ हो कर—
क्रोष्टारौ ।
क्रोष्टु + अस् (जस्) = क्रोष्टृ + अस् । यहाँ भी पूर्ववत् गुण और उपधादीर्घ
करने पर 'क्रोष्टारः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
क्रोष्टु + अम् = क्रोष्टृ + अम् । गुण और उपधादीर्घ हो—'क्रोष्टारम्' ।
ध्यान रहे कि यह गुण, पूर्वसवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) आदि का अपवाद है ।
'क्रोष्टु + अस् (शस्)' यहाँ सर्वनामस्थान परे न होने से तृज्वद्भाव नही होता ।
पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को नकार करने से 'क्रोष्टून्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'क्रोष्टु + आ (टा)' यहाँ वैकल्पिक तृज्वद्भाव का विधान करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०७) विभाषा तृतीयादिष्वचि ।७।१।९७॥
अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्टुर्वा तृज्वत् । क्रोष्ट्रा । क्रोष्ट्रे ॥