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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

२५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
वहा यण्, अजादि सुँप् को मान कर नही अपितु 'उपास्य' के उकार को मान कर प्रवृत्त
होता है।
[लघु०] सुखमिच्छतीति—सुखी। सुतमिच्छतीति—सुती। सुख्यौ। सुत्यौ।
सुख्युः। सुत्युः। शेषं प्रधीवत् ॥
व्याख्या—सुखम् आत्मन इच्छतीति—सुखी । जो अपने लिये सुख चाहे उसे
'सुखी' कहते हैं। सुतम् आत्मन इच्छतीति—सुती । जो अपने लिये सुत—पुत्र चाहे
उसे 'सुती' कहते हैं। इन शब्दो की साधनप्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये।
तथाहि—'सुख+अम्' तथा 'सुत+अम्' इन सुंवन्तो स सुप आत्मन क्यच् (७२०)
सूत्र द्वारा क्यच् प्रत्यय हो कर सनाद्यन्ता धातव (४६८) म 'सुख अम् क्यच्' तथा
'सुत अम् क्यच्' इन समुदायो की धातुसञ्ज्ञा हो जाती है। अब सुँपो धातु प्राति-
पदिकयो (७२१) सूत्र से अम् का लुक हो कर क्यचि च (७२२) से अकार को
ईकार करने पर 'सुखीय, सुतीय' रूप बन जाते हैं। इन का अर्थ क्रमश 'अपने लिये
सुख चाहना' और 'अपने लिये पुत्र चाहना' है। अब इन धातुओ स कर्ता अर्थ मे क्विप्
च (८०२) सूत्र स क्विप् प्रत्यय कर अतो लोप (४७०) स अकारलोप तथा लोपो
व्योर्वलि (४२६) म यकार का लोप हो कर—'सुखी' और 'सुती' शब्द निष्पन्न होने
है। क्विबन्ता धातुत्वं न जहति इस नियमानुसार इन की धातुसञ्ज्ञा भी अक्षत है।
सुखी+स्(सुँ), सुती+स्(सुँ)' यहा इदुदन्त न होने से सुँ का लोप नही
होता। सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो कर—सुखी, सुती।
सुखी+औ, सुती+औ' यहा अनादि प्रत्ययो मे सर्वत्र धातु के ईकार को
एरनेकाच ० (२००) से यण् होता चला जायेगा—सुख्यौ सुत्यौ।
सुखी+अम् (ङसिँ वा ङस्), सुती+अम्(ङसिँ वा ङस्)' यहा प्रथम एरने-
काच ०(२००) म यण् हो—'सुख्य्+अस्, सुत्य्+अस्' बन जाता है। तब एरनेयान्
परस्य १८३) सूत्र से अकार को उकार हो सुख्यु, सुत्यु' प्रयोग निष्पन्न होते हैं।
इन शब्दो की रूपमाला यथा—
सुखी (अपने लिये सुख चाहने वाला) | सुती (अपने लिये पुत्र चाहने वाला)
प्र० सुखी सुख्यौ सुख्य | प्र० सुती सुत्यौ सुत्य
द्वि० मुख्यम् ,, ,, | द्वि० मुत्यम् ,, ,,
तृ० सुख्या सुखीभ्याम् सुखीभि | तृ० सुत्या सुनीभ्याम् सुनीभि
च० सुख्ये ,, सुखीभ्य | च० सुत्ये ,, मुतीभ्य
प० सुख्यु ,, ,, | प० सुत्यु ,, ,,
ष० ,, सुख्यो सुख्याम् | ष० ,, सुत्यो सुत्याम्
स० मुख्यि ,, सुखीषु | स० मुख्यि ,, सुनीपु
स० हे सुखी। हे सुख्यौ! हे मुख्य ! | स० हे मुनी! हे मुत्यौ! हे मुत्य !
इसी प्रकार—लूती, क्षामी, प्रस्नीमी आदि शब्दों के रूप होते हैं। इन शब्दो