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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 633 में से

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पृष्ठ 272

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५७
प्र० शुद्धधीः शुद्धधियौ शुद्धधियः | प० शुद्धधियः शुद्धधीभ्याम् शुद्धधीभ्यः
द्वि० शुद्धधियम् ,, ,, | ष० ,, शुद्धधियोः शुद्धधियाम्
तृ० शुद्धधिया शुद्धधीभ्याम् शुद्धधीभिः | स० शुद्धधियि ,, शुद्धधीषु
च० शुद्धधिये ,, शुद्धधीभ्यः | सं० हे शुद्धधीः! हे शुद्धधियौ! हे शुद्धधियः!
इसी प्रकार 'मन्दधी, तीक्ष्णधी, सूक्ष्मधी' आदि शब्दों के रूप होंगे।
नोट—'शुद्धधी' शब्द का 'शुद्धं ध्यायति' इस प्रकार यदि विग्रह इष्ट हो तो
कर्म कारक के पूर्वपद होने के कारण यण् हो जायेगा। तब 'शुद्धध्यौ, शुद्धध्यः' इस
प्रकार रूप बनेंगे। किन्तु नदीसञ्ज्ञा वहां भी न होगी; क्योंकि वहां स्त्रीलिङ्ग 'धी'
शब्द ही नहीं रहेगा।
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२०२) न भू-सुधियोः ।६।४।८५॥
एतयोरचि सुपि यण् । सुधियौ, सुधियः। इत्यादि ॥
अर्थः—अजादि सुँप् प्रत्यय परे रहते भू और सुधी शब्द को यण् न हो।
व्याख्या—अचि ।७।१। (अचि श्नु० से')। सुंपि ।७।१। (ओः सुँपि ते) ।
यण् ।१।१। (इणो यण् से) । न इत्यव्ययपदम् । भूसुधियोः ।६।२। 'अचि' पद 'सुँपि'
पद का विशेषण है, अतः यस्मिन्विधिः० द्वारा तदादिविधि हो कर 'अजादी सुँपि' बन
जायेगा। समासः—भूश्च सुधीश्र्च = भूसुधियौ, तयोः—भूसुधियोः, इतरेतरद्वन्द्वः ।
अर्थः—(अचि) अजादि (सुँपि) सुँप् परे होने पर (भूसुधियोः) भू और सुधी शब्द
के स्थान पर (यण्) यण् (न) नहीं होता।
सुध्यायतीति सुधीः (भली प्रकार चिन्तन करने वाला = बुद्धिमान् । सुपूर्व-
ध्यै चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से ध्यायतेः सम्प्रसारणञ्च वार्त्तिक द्वारा क्विप्
प्रत्यय तथा सम्प्रसारण करने पर 'सुधी' शब्द निष्पन्न होता है। इस में पूर्वपद (सु)
गतिश्च (२०१) सूत्र द्वारा गतिसञ्ज्ञक है, अतः अजादि प्रत्ययों में यण् निषेध नहीं
होता, एरनेकाचः० (२००) द्वारा यण् प्राप्त होता है। इस पर इस सूत्र से उस का
निषेध हो कर इयङ् हो जाता है। इस की रूपमाला यथा—
प्र० सुधीः सुधियौ सुधियः | प० सुधियः सुधीभ्याम् सुधीभ्यः
द्वि० सुधियम् ,, ,, | ष० ,, सुधियोः सुधियाम्
तृ० सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभिः | स० सुधियि ,, सुधीषु
च० सुधिये ,, सुधीभ्यः | सं० हे सुधीः! हे सुधियौ! हे सुधियः!
नोट—'सु = शोभना धीर्यस्य स सुधीः' इस विग्रह में भी उच्चारण इसी तरह
होगा। नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर नेयङुवड्० (२२६) सूत्र से निषेध हो जायेगा।
विशेष—इस सूत्र से 'शुद्धयुपास्यः' में यण् का निषेध नहीं होता। क्योंकि
१. इको यणचि सूत्राद् 'अचि' इत्यनुवर्त्तत इति मन्वानो बालमनोरमाकारोऽत्र भ्रान्तः ।
ल० प्र० (१७)