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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 633 में से

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पृष्ठ 158

अथ विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम्
अब विसर्ग-सन्धि का प्रकरण आरम्भ किया जाता है। इस प्रकरण के नाम-
करण पर सन्धि-प्रकरण के अन्त में प्रकाश डाला गया है वहीं देखें।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०३) विसर्जनीयस्य सः ।८।३।३४॥
खरि विसर्जनीयस्य सः स्यात् । विष्णुस्त्राता ॥
अर्थः—खर् परे होने पर विसर्जनीय के स्थान पर सकार आदेश हो ।
व्याख्या—खरि ।७।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीयः से 'खरि' अंश)। विसर्जनी-
यस्य ।६।१। सः ।१।१। सकारादकार उच्चारणार्थः । अर्थः—(खरि) खर् परे होने पर
(विसर्जनीयस्य) विसर्जनीय के स्थान पर (सः) स् आदेश हो जाता है ।
उदाहरण यथा—विष्णुः+त्राता = विष्णुस्त्राता (भगवान् विष्णु रक्षक है) ।
यहां तकार खर् परे होने से विसर्ग को स् हुआ है। यह सूत्र हल्सन्धि में प्रसङ्गतः
आया था; वस्तुतः यह विसर्ग-सन्धि का ही है।
ध्यान रहे कि पदान्त 'स्' को रुँ हो कर विसर्ग बनते हैं और विसर्ग को खर्
परे होने पर पुनः 'स्' हो जाता है; यह सब ससजुषो रुँः (१०५) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे ।
शङ्का—'विष्णुस्त्राता' यहां विसर्ग को सकार आदेश कर देने पर ससजुषो रुँः
(१०५) से पुनः 'रुँ' आदेश क्यों नहीं हो जाता ?
समाधान—ससजुषो रुँः (८.२.६६) के प्रति विसर्जनीयस्य सः (८.३.३४) सूत्र
असिद्ध है; अतः पुनः 'रुँ' आदेश नहीं होता ।
टिप्पणी—विसर्जनीय और विसर्ग पर्याय हैं। पर्यायशब्दों में गौरव-लाघव का
विचार नहीं किया जाता । अतः विसर्गस्य सः न कह कर आचार्य के विसर्जनीयस्य सः
कहने में भी किसी प्रकार के गौरव की आशङ्का नहीं करनी चाहिये । कहा भी है—
पर्यायशब्दानां लाघवगौरवचर्चा नाऽऽद्रियते (परिभाषा) । इसी प्रकार आचार्य द्वारा
अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः (६१७) आदि सूत्रों में 'आदि' की जगह 'प्रभृति' शब्द के
प्रयोग में तथा 'वा' के स्थान पर 'अन्यतरस्याम्' आदि शब्दों के प्रयोग में भी जानना
चाहिये ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०४) वा शरि ।८।३।३६॥
शरि विसर्गस्य विसर्गो वा स्यात् । हरिः शेते, हरिशेते ॥
अर्थः—शर् परे होने पर विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग हो ।
व्याख्या—शरि ।७।१। विसर्जनीयस्य ।६।१। (विसर्जनीयस्य सः से)। विसर्ज-
नीयः ।१।१। (शर्परे विसर्जनीयः से)। वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः—(शरि) शर् परे होने
पर (विसर्जनीयस्य) विसर्ग के स्थान पर (वा) विकल्प से (विसर्जनीयः) विसर्ग
आदेश होता है ।
शर् प्रत्याहार, खर् प्रत्याहार के अन्दर आ जाता है; अतः विसर्जनीयस्य सः