लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
१७ बालावभू अश्नीत । १८ कुमार्यावभू अश्नीत । १६ ते अत्र ।
२० कन्ये आसाते । २१ अमू इन्द्र प्रस्थे दृष्टौ । २२ कवी आगच्छत ।
(११) ‘मात् किम् ? अमुवेऽत्र’ इस अंश की व्याख्या करते हुए प्रत्युदाहरण
में दोष की उद्भावना कर के उस का समाधान करें ।
(१२) ‘हरी एतौ’ में कौन ईदन्त द्विवचन है, सप्रमाण स्पष्ट करें ।
(१३) ‘गवाक्ष’ प्रयोग के अन्य विकल्प ‘गोअक्ष, गोऽक्ष’ क्यों नहीं बनते ?
(१४) अलोऽन्त्यस्य, अनेकाल् शित् सर्वस्य, ङिच्च—इन तीन परिभाषाओं में
कौन उत्सर्ग और कौन अपवाद है ? प्रत्येक का उदाहरण-प्रदर्शन-
पूर्वक स्पष्टीकरण करें ।
अब निपातों की प्रगृह्य-सञ्ज्ञा के लिये निपात-विधायक सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५३) चादयोऽसत्त्वे । १ । ४ । ५७ ॥
अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाता स्युः ॥
अर्थः—यदि चादियों का द्रव्य अर्थ न हो तो उन की निपात-सञ्ज्ञा होती है ।
व्याख्या—चादयः ।१।३। असत्त्वे ।७।१। निपाता ।१।३। (प्राग्रीश्वरान्निपाताः
यह अधिकृत है) । समास — च = च-शब्द आदिर्येषान्ते चादयः, तद्गुणसंविज्ञान-
बहुव्रीहि-समास । न सत्त्वम्=असत्त्वम्, तस्मिन्=असत्त्वे, नञ्-तत्पुरुष । यह
प्रसज्य-प्रतिषेध है, यदि पर्युदास प्रतिषेध मानें तो अनर्थक चादियों की निपात-सञ्ज्ञा
न हो सकेगी । अर्थ — (असत्त्वे) द्रव्य अर्थ न होने पर (चादयः) ‘च’ आदि शब्द
(निपाता ) निपात-सञ्ज्ञक होते हैं ।
जिस में सङ्ख्या पाई जाए या जिस के लिये सर्वनाम का प्रयोग हो सके, उसे
‘द्रव्य’ कहते हैं । चादि-गण आगे ‘अव्यय-प्रकरण’ में आ जायेगा । उदाहरण यथा—
‘लोधं नयन्ति पशु मन्यमाना’ यहां ‘पशु’ शब्द का अर्थ ‘सम्यक् = ठीक प्रकार से’ ऐसा
है । अतः यह अद्रव्यवाची होने से निपात संज्ञक होता है । यदि ‘पशु’ का अर्थ ‘जान-
वर’ होगा, तो वह द्रव्यवाची होने से निपात-सञ्ज्ञक न होगा । यथा—पशुं नयन्ति ।
निपात सञ्ज्ञा होने से (३६७) सूत्र द्वारा ‘अव्यय’ सञ्ज्ञा हो जाती है, इस से विभक्ति
का लुक् हो जाता है, यह सब आगे ‘अव्यय-प्रकरण’ में सविस्तर लिखेंगे ।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५४) प्रादयः । १ । ४ । ५८ ॥
एतेऽपि तथा ॥
अर्थ —अद्रव्यार्थक प्रादि भी निपात-सञ्ज्ञक होते हैं ।
व्याख्या—असत्त्वे ।७।१। (चादयोऽसत्त्वे से)। प्रादयः ।१।३। निपाता ।१।३।
(प्राग्रीश्वरान्निपाताः यह अधिकृत है) । अर्थ —(असत्त्वे) द्रव्य अर्थ न होने पर
(प्रादयः) ‘प्र’ आदि शब्द (निपाता ) निपात संज्ञक होते हैं । प्रादि-गण पीछे (३५)
सूत्र पर मूल में ही आ चुका है ।