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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 633 में से

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पृष्ठ 102

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८७
से एडः पदान्तादति (४३) द्वारा पूर्वरूप करने पर 'अमुकेऽत्र' (वे यहां हैं) बन
जाता है। यदि सूत्र में 'मात्' ग्रहण न करते तो यहां ककार से परे भी¹ प्रगृह्य-सञ्ज्ञा
हो कर प्रकृतिभाव हो जाता; इस से एडः पदान्तादति (४३) सूत्र प्रवृत्त न हो सकता,
अतः 'मात्' ग्रहण किया गया है।
शङ्का -- यह आप का प्रत्युदाहरण ठीक नहीं; क्योंकि यहां 'ईत्' अथवा 'ऊत्'
नहीं। आप को तो अपने प्रत्युदाहरण में मकार से भिन्न किसी अन्य वर्ण से परे 'ईत्'
या 'ऊत्' ही दिखाने चाहियें थे। आप के प्रत्युदाहरण में तो ककार से परे 'एत्'
दिखाया गया है।
समाधान--ईदूदेद्० (५१) इस पूर्व-सूत्र से यहां 'ईत्, ऊत्, एत्' इन तीनों की
अनुवृत्ति आ रही थी; परन्तु इस सूत्र में 'मात्' ग्रहण के सामर्थ्य से 'एत्' का अनु-
वर्त्तन नहीं किया जाता, क्योंकि म् से परे अदस् शब्द में कहीं 'एत्' नहीं पाया जाता।
अब यदि यहां 'मात्' का ग्रहण नहीं करेंगे तो 'एत्' की भी अनुवृत्ति आ जाने से
'अमुकेऽत्र' यहां प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण सन्धि न हो सकेगी; अतः
'एत्' की अनुवृत्ति रोकने के लिये 'मात्' पद का ग्रहण करना अत्यावश्यक है। असति
माद्ग्रहणे एकारोऽप्यनुवर्तेत [सि० कौ०] ।
अभ्यास (१२)
(१) व्याकरणशास्त्र में प्रकृतिभाव का क्या अभिप्राय है ? स्पष्ट करें।
(२) इन्द्रे च सूत्र की वृत्ति में किस बात की कमी रह गई है ? स्पष्ट करें।
(३) सर्वत्र विभाषा गोः में 'सर्वत्र' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ?
(४) दूराद् धूते च सूत्र के अर्थ में 'विकल्प' कहां से आ जाता है ?
(५) 'देवदत्त एहि' इस वाक्य की टि को प्लुत क्यों नहीं होता ?
(६) 'आगच्छ कृष्ण३ात्र गौश्चरति' क्या यह शुद्ध है ?
(७) इन्द्रे च सूत्र बनाने की क्या आवश्यकता थी ? क्या पूर्व-सूत्र से 'गवेन्द्रः'
सिद्ध नहीं हो सकता था ?
(८) अनेकाल् शित् सर्वस्य सूत्र में 'शित्' ग्रहण पर प्रकाश डालें।
(६) स्त्रीलिङ्ग वा नपुंसकलिङ्ग के 'अमू' में अदसो मात् क्यों नहीं लगता ?
(१०) निम्नस्थ रूपों में सन्धि करें अथवा सन्धि न करने का कारण बताएं।
१. कवी अत्र । २. योगी अत्र । ३. वायू अत्र । ४. रामे अत्र । ५.
माले अत्र । ६. कुले इमे उत्कृष्टे एधेते अधुना । ७. धनुषी एते अस्य ।
८. घने इमे । ६. वर्धेते अस्मिन् । १०. ऋतू अतीतौ । ११. पाणी
उत्क्षिपत्ति । १२. हस्ती उत्क्षिपत्ति । १३. बालिके अधीयाते ।
१४. नेत्रे आमृशति । १५. वटू उत्कूर्दते अत्र । १६. अमी अश्नन्ति ।
१. क्योंकि तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते (प०) इस परिभाषा से 'अदकस्' भी
'अदस्' शब्द माना जाता है।