संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ, नम्र निवेदन व विषय-सूची
॥ श्रीहरिः ॥
कूर्मपुराण
[ सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित ]
गीताप्रेस, गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923]

॥ श्रीहरिः ॥ 1131
कूर्मपुराण
( सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित )
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० २०७५ दसवाँ पुनर्मुद्रण ३,०००
कुल मुद्रण ३५,५००
❖ मूल्य— ₹ १५०
( एक सौ पचास रुपये )
प्रकाशक एवं मुद्रक—
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान )
फोन : ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३१२५१
web : gitapress.org e-mail : [email protected]
गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop.in से online खरीदें।
॥ श्रीहरिः ॥
नम्र निवेदन
पुराण भारतीय संस्कृतिकी अमूल्य निधि है। यह एक ऐसा विश्वकोश है, जिसमें धार्मिक, आर्थिक, नैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक आदि सभी विषय अति सरल एवं सुगम भाषामें वर्णित हैं। वेदोंमें वर्णित विषयोंका रहस्य पुराणोंमें रोचक उपाख्यानोंके द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इसीलिये इतिहास-पुराणोंके द्वारा वेदोपबृंहणका विधान किया गया है। पुराणोंके परिज्ञानके बिना वेद, वेदाङ्ग एवं उपनिषदोंका ज्ञाता भी ज्ञानवान् नहीं माना गया है। इससे पुराण-सम्बन्धी ज्ञानकी आवश्यकता और महत्ता परिलक्षित होती है।
महापुराणोंकी सूचीमें पंद्रहवें पुराणके रूपमें परिगणित कूर्मपुराणका विशेष महत्त्व है। सर्वप्रथम भगवान् विष्णुने कूर्म अवतार धारण करके इस पुराणको राजा इन्द्रद्युम्नको सुनाया था, पुनः भगवान् कूर्मने उसी कथानकको समुद्र-मन्थनके समय इन्द्रादि देवताओं तथा नारदादि ऋषिगणोंसे कहा। तीसरी बार नैमिषारण्यके द्वादशवर्षीय महासत्रके अवसरपर रोमहर्षण सूतके द्वारा इस पवित्र पुराणको सुननेका सौभाग्य अट्ठासी हजार ऋषियोंको प्राप्त हुआ। भगवान् कूर्मके द्वारा कथित होनेके कारण ही इस पुराणका नाम कूर्मपुराण विख्यात हुआ।
रोमहर्षण सूत तथा शौनकादि ऋषियोंके संवादके रूपमें आरम्भ होनेवाले इस पुराणमें सर्वप्रथम सूतजीने पुराण-लक्षण एवं अठारह महापुराणों तथा उपपुराणोंके नामोंका परिगणन करते हुए भगवान्के कूर्मावतारकी कथाका सरस विवेचन किया है। कूर्मावतारके ही प्रसंगमें लक्ष्मीकी उत्पत्ति और माहात्म्य, लक्ष्मी तथा इन्द्रद्युम्नका वृत्तान्त, इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति, वर्ण, आश्रम और उनके कर्तव्यका वर्णन तथा परब्रह्मके रूपमें शिवतत्त्वका प्रतिपादन किया गया है। तदनन्तर सृष्टिवर्णन, कल्प, मन्वन्तर तथा युगोंकी काल-गणना, वराहावतारकी कथा, शिवपार्वती-चरित्र, योगशास्त्र, वामनावतारकी कथा, सूर्य-चन्द्रवंशवर्णन, अनसूयाकी संतति-वर्णन तथा यदुवंशके वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके मंगलमय चरित्रका सुन्दर निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें श्रीकृष्णके द्वारा शिवकी तपस्या तथा उनकी कृपासे साम्बनामक पुत्रकी प्राप्ति, लिङ्गमाहात्म्य, चारों युगोंका स्वभाव तथा युगधर्म-वर्णन, मोक्षके साधन, ग्रह-नक्षत्रोंका वर्णन, तीर्थ-माहात्म्य, विष्णु-माहात्म्य, वैवस्वत मन्वन्तरके २८ द्वापरयुगोंके २८ व्यासोंका उल्लेख, शिवके अवतारोंका वर्णन, भावी मन्वन्तरोंके नाम, ईश्वरगीता, व्यासगीता तथा कूर्मपुराणके फलश्रुतिकी सरस प्रस्तुति है। हिन्दूधर्मके तीन मुख्य सम्प्रदायों—वैष्णव, शैव एवं शाक्तके अद्भुत समन्वयके साथ इस पुराणमें त्रिदेवोंकी एकता, शक्ति-शक्तिमानमें अभेद तथा विष्णु एवं शिवमें परमैक्यका सुन्दर प्रतिपादन किया गया है।
'कल्याण' वर्ष ७१के विशेषाङ्कके रूपमें पूर्व प्रकाशित इस पुराणके विषय-वस्तुकी उपयोगिता एवं पाठकोंके आग्रहको दृष्टिगत रखते हुए अब इसको पुराणके रूपमें सानुवाद प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। आशा है, प्रेमी पाठक गीताप्रेससे प्रकाशित अन्य पुराणोंकी भाँति इस पुराणको भी अपने अध्ययन-मनन तथा संग्रहका विषय बनाकर हमारे श्रमको सार्थक करेंगे।
—प्रकाशक
॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
( पूर्वविभाग )
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| १- | सूतजीकी उत्पत्ति, उनके रोमहर्षण नाम पड़नेका कारण, पुराणों तथा उपपुराणोंका नाम-परिगणन, समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न विष्णुमायाका वर्णन, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और कूर्मपुराणकी महिमा .................... | ११ | उनका विवाह, धर्म तथा अधर्मकी संतानोंका विवरण ............................. | ५० | |
| २- | विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव, रुद्र तथा लक्ष्मीका प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा नौ मानस पुत्रों तथा चार वर्णोंकी सृष्टि, वेदज्ञानकी महिमा, ब्रह्म-सृष्टिका वर्णन, वर्ण और आश्रमोंके सामान्य तथा विशेष धर्म, गृहस्थाश्रमका माहात्म्य, चतुर्विध पुरुषार्थोंमें धर्मकी महिमा, आश्रमोंका द्वैविध्य, त्रिदेवोंका पूजन, त्रिपुण्ड्र, तिलक तथा भस्म-धारणकी महिमा ....... | २२ | ९- | शेषशायी नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति तथा उसी कमलसे ब्रह्माका प्राकट्य, विष्णुमायाद्वारा ब्रह्माका मोहित होकर विष्णुसे विवाद करना, भगवान् शंकरका प्राकट्य, विष्णुद्वारा ब्रह्माको शिवका माहात्म्य बताना, ब्रह्माद्वारा शिवकी स्तुति तथा शिव और विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन ................. | ५२ |
| ३- | आश्रमधर्मका वर्णन, संन्यास ग्रहण करनेका क्रम, ब्रह्मार्पणका लक्षण तथा निष्काम-कर्मयोगकी महिमा ............................. | ३२ | १०- | विष्णुद्वारा मधु तथा कैटभका वध, नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा सनकादिकी सृष्टि, ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्ति, रुद्रकी अष्टमूर्तियों, आठ नामों तथा आठ पत्नियोंका वर्णन, रुद्रके द्वारा अनेक रुद्रोंकी उत्पत्ति तथा पुनः वैराग्य ग्रहण करना, ब्रह्माद्वारा रुद्रकी स्तुति तथा माहात्म्य-वर्णन, रुद्रद्वारा ब्रह्माको ज्ञानकी प्राप्ति, महादेवका त्रिमूर्तित्व और ब्रह्माद्वारा अनेक प्रकारकी सृष्टि ................................. | ५९ |
| ४- | सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार ब्रह्माण्डकी सृष्टिका क्रम, पञ्चीकरण-प्रक्रिया तथा परमेश्वरके विविध नामोंका निरूपण .................... | ३४ | |||
| ५- | ब्रह्माजीकी आयुका वर्णन, युग, मन्वन्तर तथा कल्प आदि कालकी गणना, प्राकृत प्रलय तथा कालकी महिमाका वर्णन ... | ४० | ११- | सती और पार्वतीका आविर्भाव, देवी-माहात्म्य, हैमवती-माहात्म्य, देवीका अष्टोत्तरसहस्रनाम-स्तोत्र, हिमवान्द्वारा देवीकी स्तुति एवं हिमवान्को देवीद्वारा उपदेश, देवीसहस्रनाम-स्तोत्र-जपका माहात्म्य ....................... | ६६ |
| ६- | 'नारायण' नामका निर्वचन, वराहरूपधारी नारायणद्वारा पृथ्वीका उद्धार, सनकादि ऋषियोंद्वारा वराहकी स्तुति .................... | ४२ | १२- | महर्षि भृगु, मरीचि, पुलस्त्य तथा अत्रि आदिद्वारा दक्ष-कन्याओंसे उत्पन्न संतान-परम्पराका वर्णन, उनचास अग्नियों, पितरों तथा गङ्गाके प्रादुर्भावका वर्णन ............. | ८९ |
| ७- | नौ प्रकारकी सृष्टि, ब्रह्माजीके मानस पुत्रोंका आविर्भाव, ब्रह्माजीके चारों मुखोंसे चारों वेदोंकी उत्पत्ति इत्यादिका वर्णन ........ | ४४ | १३- | स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति, महाराज पृथुका आख्यान, पृथुका वंश-वर्णन, पृथुके पौत्र 'सुशील'का रोचक | |
| ८- | सृष्टि-वर्णनमें ब्रह्माजीसे मनु और शतरूपाका प्रादुर्भाव, स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंका वर्णन तथा |
$
\begin{gathered}
[ ५ ]
\end{gathered}
$
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| आख्यान, सुशीलको हिमालयके 'धर्मपद' नामक वनमें महापाशुपत श्वेताश्वतर मुनिके दर्शन तथा उनसे पाशुपत-व्रतका ग्रहण, दक्षके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा पुनः दक्ष प्रजापतिके रूपमें आविर्भावकी कथा, दक्षद्वारा शंकरका अपमान, सतीद्वारा देह-त्याग तथा शंकरका दक्षको शाप................................. | ९१ | वर प्राप्त करना, अदितिके गर्भमें विष्णुका प्रवेश, विष्णुका वामनरूपमें आविर्भाव, बलिके यज्ञमें वामनका प्रवेश तथा तीन पग भूमिकी याचना, तीसरे पगसे नापते समय ब्रह्माण्ड-भेदन, गङ्गाकी उत्पत्ति तथा भक्तिका वर प्राप्तकर बलि आदिका पातालमें प्रवेश ..................................... | १२२ | ||
| १४- | हरिद्वारमें दक्षद्वारा यज्ञका आयोजन, यज्ञमें शंकरका भाग न देखकर महर्षि दधीचिद्वारा दक्षकी भर्त्सना तथा यज्ञमें भाग लेनेवाले ब्राह्मणोंको शाप, देवी पार्वतीके कहनेपर शंकरद्वारा रुद्रों, भद्रकाली तथा वीरभद्रको प्रकट करना, वीरभद्रादिद्वारा दक्षके यज्ञका विध्वंस, शंकर-पार्वतीका यज्ञस्थलमें प्राकट्य, भयभीत दक्षद्वारा शंकर तथा पार्वतीकी स्तुति और वर प्राप्त करना, ब्रह्माद्वारा दक्षको उपदेश और शिव-विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन तथा दक्षद्वारा शिवकी शरण ग्रहण करना................................. | ९६ | १७- | बलिपुत्र बाणासुरका वृत्तान्त, दक्ष प्रजापतिकी दनु, सुरसा आदि कन्याओंकी संतानोंका वर्णन ............................................... | १२८ |
| १८- | महर्षि कश्यप तथा पुलस्त्य आदि ऋषियोंके वंशका वर्णन, रावण तथा कुम्भकर्ण आदिकी उत्पत्ति, वसिष्ठके वंश-वर्णनमें व्यास, शुकदेव आदिकी उत्पत्तिकी कथा, भगवान् शंकरका ही शुकदेवके रूपमें आविर्भूत होना....... | १२९ | |||
| १९- | सूर्यवंश-वर्णनमें वैवस्वत मनुकी संतानोंका वर्णन, युवानाश्वको गौतमका उपदेश, महातपस्वी राजा वसुमनाकी कथा, वसुमनाके अश्वमेध-यज्ञमें ऋषियों तथा देवताओंका आगमन, ऋषियोंद्वारा तपस्याकी आज्ञा प्राप्तकर वसुमनाका हिमालयमें जाकर तप करना और अन्तमें उसे शिवपदकी प्राप्ति......... | १३१ | |||
| १५- | दक्ष-कन्याओंकी संतति, नृसिंहावतार, हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष-वधका वर्णन, पृथ्वीका उद्धार, प्रह्लाद-चरित, गौतमद्वारा दारुवननिवासी मुनियोंको शाप, अन्धकके साथ महादेवका युद्ध एवं महादेवद्वारा अपने स्वरूपका उपदेश, अन्धकद्वारा महादेवकी स्तुति तथा महादेव (शंकर)-द्वारा अन्धकको गाणपत्य-पदकी प्राप्ति, अन्धकद्वारा देवीकी स्तुति और देवीद्वारा अन्धकको पुत्र-रूपमें ग्रहण करना तथा विष्णुद्वारा उत्पन्न माताओंसे अपनी तीनों मूर्तियोंका प्रतिपादन .................................... | १०४ | २०- | इक्ष्वाकु-वंश-वर्णनके प्रसंगमें श्रीराम-कथाका प्रतिपादन, श्रीरामद्वारा सेतु-बन्धन और रामेश्वर-लिंगकी स्थापना, शंकर-पार्वतीका प्रकट होकर रामेश्वर-लिंगके माहात्म्यको बतलाना, श्रीरामको लव-कुश पुत्रोंकी प्राप्ति तथा इक्ष्वाकु-वंशके अन्तिम राजाओंका वंश-वर्णन .............................................. | १३७ |
| १६- | सनत्कुमारद्वारा आत्मज्ञान प्राप्तकर प्रह्लाद-पुत्र विरोचनका योगमें संलग्न होना, विरोचन-पुत्र बलिद्वारा देवताओंको पराजित करना, देवमाता अदितिका दुःखी होना तथा विष्णुसे प्रार्थनाकर पुत्ररूपमें उनके उत्पन्न होनेका | २१- | चन्द्रवंशके राजाओंका वृत्तान्त, यदुवंश-वर्णनमें कार्तवीर्यार्जुनके पाँच पुत्रोंका आख्यान, परम विष्णुभक्त राजा जयध्वजकी कथा, विदेह दानवका पराक्रम तथा जयध्वजद्वारा विष्णुके अनुग्रहसे उसका वध, विश्वामित्रद्वारा विष्णुकी आराधनाका जयध्वजको उपदेश करना और |
$[ ६ ]$
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| जयध्वजको विष्णुका दर्शन ................. | १४१ | पुत्रकी प्राप्ति, कंसादिका वध, भृगु आदि महर्षियोंका द्वारकामें आना, भृगु आदि मुनियोंसे श्रीकृष्णद्वारा स्वधामगमनकी बात बताना, शिवसे द्वेष करनेवालोंको नरककी प्राप्तिका वर्णन तथा शिवकी महिमा बताना, नारायणका अपने कुलका संहारकर स्वधामगमन तथा वंश-वर्णनका उपसंहार........................ | १७२ | ||
| २२- | जयध्वजके वंश-वर्णनमें राजा दुर्जयका आख्यान, महामुनि कण्वद्वारा दुर्जयको वाराणसीके विश्वेश्वर-लिंगका माहात्म्य बतलाना, दुर्जयका वाराणसी जाकर पाप-मुक्त होना तथा सहस्रजित्-वंशका वर्णन. | १४७ | २७- | व्यासदेवद्वारा अर्जुनको सत्ययुगादि चारों युगोंके धर्मोंका उपदेश, व्यासद्वारा एक वेद-संहिताका चतुर्धा विभाजन, चारों युगोंमें चतुष्पाद धर्मकी विभिन्न स्थितिका निदर्शन तथा कलियुगमें धर्मके ह्रासका प्रतिपादन ................. | १७४ |
| २३- | यदुवंश-वर्णनमें क्रोष्टुवंशी राजाओंका वृत्तान्त, राजा नवरथकी कथा, सात्त्वतवंश-वर्णनमें अक्रूरकी उत्पत्ति, राजा आनकदुन्दुभिका आख्यान, कंस एवं वसुदेव-देवकीकी उत्पत्ति, वसुदेवका वंश-वर्णन, देवकीके अन्य पुत्रोंकी उत्पत्ति, रोहिणीसे संकर्षण-बलराम तथा देवकीसे श्रीकृष्णका आविर्भाव, वासुदेव कृष्णका वंश-वर्णन .................. | १५० | २८- | कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें शिवपूजनकी विशेष महिमाका ख्यापन, व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा ................................ | १७८ |
| २४- | पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने-हेतु भगवान् श्रीकृष्णका महामुनि उपमन्युके आश्रममें जाना, महामुनि उपमन्युद्वारा उन्हें पाशुपत-योग प्रदान करना, तपस्यामें निरत कृष्णको शिव-पार्वतीका दर्शन और श्रीकृष्णद्वारा उनकी स्तुति करना, शिवद्वारा पुत्रप्राप्तिका वर देना तथा माता पार्वतीद्वारा अनेक वर देना और शिवके साथ श्रीकृष्णका कैलास-गमन ................................... | १५६ | २९- | व्यासजीका वाराणसी-गमन, व्याससे जैमिनि आदि ऋषियोंका धर्मसम्बन्धी प्रश्न, व्यासका उन्हें शिव-पार्वती-संवाद बताना, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य, वाराणसी-सेवनका विशेष फल ................................... | १८४ |
| २५- | श्रीकृष्णका कैलास पर्वतपर विहार करना, श्रीकृष्णको द्वारका बुलानेके लिये गरुडका कैलासपर जाना, श्रीकृष्णका द्वारका-आगमन, द्वारकामें श्रीकृष्णका स्वागत तथा उनका दर्शन करनेके लिये देवताओं तथा मार्कण्डेय आदि मुनियोंका आना, कृष्णके द्वारा महर्षि मार्कण्डेयको शिव-तत्त्व तथा लिङ्ग-तत्त्वका माहात्म्य बतलाना तथा स्वयं शिवका पूजन करना, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा शिवके महालिङ्गका दर्शन तथा लिङ्गस्तुति, लिङ्गार्चनका प्रवर्तन......................... | १६४ | ३०- | वाराणसीके ओंकारेश्वर और कृत्तिवासेश्वर लिङ्गोंका माहात्म्य, शंकरके कृत्तिवासा नाम पड़नेका वृत्तान्त ............................. | १९० |
| २६- | श्रीकृष्णको महेश्वरकी कृपासे साम्ब नामक | ३१- | वाराणसीके कपर्दीश्वर लिङ्गका माहात्म्य, पिशाचमोचन-कुण्डमें स्नान करनेकी महिमा, वहाँ स्नान करनेसे पिशाचयोनिसे मुक्ति प्राप्त करनेका आख्यान, शंकुकर्णकी कथा तथा शंकुकर्णकृत ब्रह्मपार-स्तव ........... | १९२ | |
| ३२- | व्यासजीद्वारा वाराणसीके मध्यमेश्वर महादेव तथा मन्दाकिनीकी महिमाका वर्णन....... | १९७ | |||
| ३३- | वाराणसी-माहात्म्यके प्रसंगमें व्यासजीका शिष्योंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें गमन, ब्रह्मतीर्थका आख्यान, व्यासजीद्वारा विश्वेश्वर |
[ ७ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| लिङ्गका पूजन तथा वहाँ रहते हुए शिवाराधना, एक दिन भिक्षा न मिलनेपर क्रोधाविष्ट व्यासजीका वाराणसीके निवासियोंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, उसी समय देवी पार्वतीका प्रकट होना, देवीका व्यासको वाराणसी त्यागनेकी आज्ञा, पुनः स्तुतिसे प्रसन्न देवीके द्वारा चतुर्दशी तथा अष्टमीको वहाँ (वाराणसीमें) रहनेकी अनुमति देना | १९९ | नाड़ियोंका वर्णन तथा उनका कार्य, बारह महीनोंके बारह सूर्योंके नाम तथा छः ऋतुओंमें उनका वर्ण, आठ ग्रहोंका वर्णन, सोमके रथका वर्णन, देवोंद्वारा चन्द्रकलाओंका पान करना, पितरोंद्वारा अमावस्याको चन्द्रमाकी कलाका पान, बुध आदि ग्रहोंके रथका वर्णन ................................... | २२१ | ||
| ३४- | प्रयागका माहात्म्य, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवाद, प्रयागमें संगम-स्नानका फल ............. | २०२ | ४२- | महः आदि सात लोकों तथा सात पातालोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन, वैष्णवी तथा शाम्भवी शक्तियोंका वर्णन ............ | २२४ |
| ३५- | प्रयाग-माहात्म्य, प्रयागके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा, त्रिपथगा गङ्गाका माहात्म्य, गङ्गास्नानका फल ............................ | २०६ | ४३- | सात महाद्वीपों और सात महासागरोंका परिमाण, जम्बूद्वीप तथा मेरुपर्वतकी स्थिति, भारत तथा किंपुरुष आदि वर्षोंका वर्णन, वर्षपर्वतोंकी स्थिति, जम्बूद्वीपके नाम पड़नेका कारण, जम्बूद्वीपके नदी एवं पर्वतोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन ............................ | २२६ |
| ३६- | प्रयाग-माहात्म्य, माघमासमें संगमस्नानका फल, त्रिमाघीकी महिमा, प्रयागमें प्राण-त्याग करनेका फल ............................ | २०९ | ४४- | ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओंकी पुरियोंका तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, गङ्गाकी चार धाराओं और आठ मर्यादापर्वतोंका वर्णन ........................... | २२९ |
| ३७- | प्रयाग-माहात्म्य, यमुनाकी महिमा, यमुनाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन, गङ्गामें सभी तीर्थोंकी स्थिति, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादकी समाप्ति................................ | २१० | ४५- | केतुमाल, भद्राश्व, रम्यकवर्ष तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, हरिवर्षमें स्थित विष्णुके विमानका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनमें भारत-वर्षके कुलपर्वतों, महानदियों, जनपदों और वहाँके निवासियोंका वर्णन, भारतवर्षमें चार युगोंकी स्थितिका प्रतिपादन ................ | २३२ |
| ३८- | भुवनकोश-वर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका वर्णन, प्रियव्रतके पुत्र राजा अग्नीध्रके वंशका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका तथा वर्षोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके नौ वर्षोंमें राजा अग्नीध्रके नाभि, किंपुरुष आदि नौ पुत्रोंका आधिपत्य.... | २१२ | ४६- | विभिन्न पर्वतोंपर स्थित देवताओंके पुरोंका वर्णन तथा वहाँके निवासियों, नदियों, सरोवरों और भवनोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनका उपसंहार ........................................ | २३५ |
| ३९- | ‘भू’ आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा..... | २१५ | ४७- | प्लक्ष आदि महाद्वीपों, वहाँके पर्वतों, नदियों तथा निवासियोंका वर्णन, श्वेतद्वीपमें स्थित नारायणपुरका वर्णन, वहाँ वैकुण्ठमें रहनेवाले लक्ष्मीपति शेषशायी नारायणकी महिमाका ख्यापन ............................................ | २४० |
| ४०- | सूर्य-रथ तथा द्वादश आदित्योंके नाम, सूर्य-रथके अधिष्ठातृ देवता आदिका वर्णन, सूर्यकी महिमा ................................... | २१९ | |||
| ४१- | सूर्यकी प्रधान सात रश्मियोंके नाम, इनके द्वारा ग्रहोंका आप्यायन, सूर्यकी अन्य हजारों |
$[ ८ ]$
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| ४८- | पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन ...... | २४५ | भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना ..................................... | २७४ | |
| ४९- | स्वारोचिषसे वैवस्वत मन्वन्तरतकके देवता, सप्तर्षि, इन्द्र आदिका वर्णन, नारायणद्वारा ही विभिन्न मन्वन्तरोंमें सृष्टि आदिका प्रतिपादन, भगवान् विष्णुकी चार मूर्तियोंका विवेचन, विष्णुका माहात्म्य ..................... | २४७ | ७- | ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन .................... | २७८ |
| ५०- | अट्ठाईस व्यासोंका वर्णन, अट्ठाईसवें कृष्णद्वैपायन-द्वारा वेदसंहिताका विभाजन तथा पुराणेतिहासकी रचना, वेदकी शाखाओंका विस्तार तथा विष्णुके माहात्म्यका कथन .............................. | २५० | ८- | महेश्वरका अद्वितीय परमेश्वरके रूपमें निरूपण, सांख्य-सिद्धान्तसे तत्त्वोंका सृष्टिक्रम, महेश्वरके छः अङ्ग, महेश्वरके स्वरूपके ज्ञानसे परमपदकी प्राप्ति ....................... | २८० |
| ५१- | कलियुगमें महादेवके अवतारों तथा उनके शिष्योंका वर्णन, भविष्यमें होनेवाले सात मन्वन्तरोंका नाम-परिगणन, कूर्मपुराणके पूर्वविभागका उपसंहार ........................ | २५३ | ९- | महादेवके विश्वरूपत्वका वर्णन तथा ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका प्रतिपादन ..................... | २८२ |
| ( उपविभाग ) | १०- | ईश्वरद्वारा परम तत्त्व तथा परम ज्ञानके स्वरूपका निरूपण और उसकी प्राप्तिके साधनका वर्णन ................................... | २८४ | ||
| १- | ईश्वर (शिव) तथा ऋषियोंके संवादमें ईश्वरगीताका उपक्रम............................... | २५७ | ११- | योगकी महिमा, अष्टाङ्गयोग, यम, नियम आदि योगसाधनोंका लक्षण, प्राणायामका विशेष प्रतिपादन, ध्यानके विविध प्रकार, पाशुपत-योगका वर्णन, वाराणसीमें प्राण-त्यागकी महिमा, शिव-आराधनकी विधि, शिव और विष्णुके अभेदका प्रतिपादन, शिवज्ञान-योगकी परम्पराका वर्णन, ईश्वर-गीताकी फलश्रुति तथा उपसंहार ........... | २८६ |
| २- | आत्मतत्त्वके स्वरूपका निरूपण, सांख्य एवं योगके ज्ञानका अभेद, आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका वर्णन................................... | २६० | १२- | ब्रह्मचारीका धर्म, यज्ञोपवीत आदिके सम्बन्धमें विविध विवरण, अभिवादनकी विधि, माता-पिता एवं गुरुकी महिमा, ब्रह्मचारीके सदाचारका वर्णन ................................ | २९८ |
| ३- | अव्यक्त शिवतत्त्वसे सृष्टिका कथन, परमात्माके स्वरूपका वर्णन तथा प्रधान, पुरुष एवं महदादि तत्त्वोंसे सृष्टिका क्रम-वर्णन, शिवस्वरूपका निरूपण......................... | २६५ | १३- | ब्रह्मचारीके नित्यकर्मकी विधि, आचमनका विधान, हाथोंमें स्थित तीर्थ, उच्छिष्ट होनेपर शुद्धिकी प्रक्रिया, मूत्र-पुरीषोत्सर्गके नियम | ३०४ |
| ४- | शिव-भक्तिका माहात्म्य, शिवोपासनाकी सुगमता, ज्ञानरूप शिवस्वरूपका वर्णन, शिवकी तीन प्रकारकी शक्तियोंका प्रतिपादन, शिवके परम तत्त्वका निरूपण ............ | २६७ | १४- | ब्रह्मचारीके आचारका वर्णन, गुरुसे अध्ययन आदिकी विधि, ब्रह्मचारीका धर्म, गुरु तथा गुरु-पत्नीके साथ व्यवहारका वर्णन, वेदाध्ययन और गायत्रीकी महिमा, अनध्यायोंका वर्णन, | |
| ५- | ऋषियोंको दिव्य नृत्य करते हुए भगवान् शंकरका आकाशमें दर्शन, मुनियोंद्वारा महेश्वरकी भावपूर्ण स्तुति करना ........... | २७० | |||
| ६- | ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी |
[ ९ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| ब्रह्मचारी-धर्मका उपसंहार........................ | ३०९ | रखना आवश्यक .................................... | ३८० | ||
| १५- | गृहस्थधर्म तथा गृहस्थके सदाचारका वर्णन, धर्माचरण एवं सत्यधर्मकी महिमा ........ | ३१८ | २५- | गृहस्थ ब्राह्मणकी मुख्य वृत्ति तथा आपत्कालकी वृत्ति, गृहस्थके साधक तथा असाधक दो भेद, न्यायोपार्जित धनका विभाग एवं उसका उपयोग ..................................... | ३८२ |
| १६- | सदाचारका वर्णन................................. | ३२३ | |||
| १७- | भक्ष्य एवं अभक्ष्य-पदार्थोंका वर्णन ........... | ३३२ | |||
| १८- | गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र, अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले पञ्च-महायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान... | ३३७ | २६- | दानधर्मका निरूपण एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा विमल-चतुर्विध दान-भेद, दानके अधिकारी तथा अनधिकारी, कामना-भेदसे विविध देवताओंकी आराधनाका विधान, ब्राह्मणकी महिमा तथा दानधर्म-प्रकरणका उपसंहार ............................................. | ३८५ |
| २७- | वानप्रस्थ-आश्रम तथा वानप्रस्थ-धर्मका वर्णन, वानप्रस्थीके कर्तव्योंका निरूपण ........... | ३९२ | |||
| १९- | भोजन-विधि, ग्रहणकालमें भोजनका निषेध, शयन-विधि, गृहस्थके नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका महत्त्व .................................. | ३४८ | २८- | संन्यासधर्मका प्रतिपादन, संन्यासियोंके भेद तथा संन्यासीके कर्तव्योंका वर्णन.......... | ३९५ |
| २०- | श्राद्ध-प्रकरण—श्राद्धके प्रशस्त दिन, विभिन्न तिथियों, नक्षत्रों और वारोंमें किये जानेवाले श्राद्धोंका विभिन्न फल, श्राद्धके आठ भेद, श्राद्धके लिये प्रशस्त स्थान, श्राद्धमें विहित तथा निषिद्ध पदार्थ ................................. | ३५१ | २९- | संन्यासाश्रमधर्म-निरूपणमें यतियोंकी भैक्ष्य-वृत्तिका स्वरूप, यतियोंके लिये महेश्वरके ध्यानका प्रतिपादन, व्रतभङ्गमें प्रायश्चित्तविधान तथा पुनः यथास्थितिमें आनेकी विधि, संन्यासधर्म-प्रकरणकी समाप्ति ............... | ३९८ |
| २१- | श्राद्ध-प्रकरणमें निमन्त्रणके योग्य पंक्तिपावन ब्राह्मणों तथा त्याज्य पंक्ति-दूषकोंके लक्षण | ३५५ | ३०- | प्रायश्चित्त-प्रकरणमें प्रायश्चित्तका स्वरूप-निरूपण, पाँच महापातकोंके नाम तथा ब्रह्महत्याके प्रायश्चित्तका संक्षिप्त निरूपण.. | ४०२ |
| २२- | श्राद्ध-प्रकरणमें ब्राह्मण निमन्त्रित करनेकी विधि, निमन्त्रित ब्राह्मणके कर्तव्य, श्राद्ध-विधि, श्राद्धमें प्रशस्त पात्र, पितरोंकी प्रार्थना, श्राद्धके दिन निषिद्ध कर्म, वृद्धिश्राद्धका विधान, श्राद्ध-प्रकरणका उपसंहार ........ | ३६१ | ३१- | प्रायश्चित्त-प्रकरणमें कपालमोचन-तीर्थका आख्यान .............................................. | ४०५ |
| २३- | आशौच-प्रकरणमें जननाशौच और मरणाशौचकी क्रिया-विधि, शुद्धि-विधान, सपिण्डता, सद्यःशौच, अन्त्येष्टि-संस्कार, सपिण्डीकरण-विधि, मासिक तथा सांवत्सरिक श्राद्ध आदिका वर्णन ....................................... | ३७१ | ३२- | प्रायश्चित्त-प्रकरणमें महापातकोंके प्रायश्चित्तका विधान तथा अन्य उपपातकोंसे शुद्धिका उपाय .................................................. | ४१४ |
| २४- | अग्निहोत्रका माहात्म्य, अग्निहोत्रीके कर्तव्य, श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्म, तृतीय शिष्टाचारधर्म, वेद, धर्मशास्त्र और पुराणसे धर्मका ज्ञान तथा इनपर श्रद्धा | ३३- | प्रायश्चित्त-प्रकरणमें चोरी तथा अभक्ष्य-भक्षणका प्रायश्चित्त, प्रकीर्ण पापोंका प्रायश्चित्त, समस्त पापोंकी एकत्र मुक्तिके विविध उपाय, पतिव्रताको कोई पाप नहीं लगता, पतिव्रताके माहात्म्यमें देवी सीताका आख्यान, सीताद्वारा अग्निस्तुति, ज्ञानयोगकी प्रशंसा तथा प्रायश्चित्त-प्रकरणका उपसंहार ......... | ४१९ |
[ १० ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| ३४- | तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें प्रयाग, गया, एकास्र तथा पुष्कर आदि विविध तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, सप्तसारस्वत-तीर्थके वर्णनमें शिवभक्त मङ्कणक मुनिका आख्यान ................ | ४३२ | समीपवर्ती तीर्थोंकी महिमा, मार्कण्डेय तथा युधिष्ठिरके संवादकी समाप्ति ......... | ४७१ | |
| ३५- | तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थोंका माहात्म्य, कालञ्जर-तीर्थकी महिमाके वर्णनके प्रसंगमें शिवभक्त राजा श्वेतकी कथा ..... | ४३८ | ४१- | तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नैमिषारण्य तथा जप्येश्वर-तीर्थकी महिमा, जप्येश्वर-तीर्थमें महर्षि शिलादके पुत्र नन्दीकी तपस्या तथा उनके गणाधिपति होनेका आख्यान ........ | ४७४ |
| ३६- | तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थोंकी महिमा, देवदारु-वन-तीर्थका माहात्म्य ............. | ४४१ | ४२- | विविध शैव-तीर्थोंके माहात्म्यका निरूपण, तीर्थोंके अधिकारी तथा तीर्थ-माहात्म्यका उपसंहार ............................................. | ४७८ |
| ३७- | देवदारु-वनमें स्थित मुनियोंका वृत्तान्त एवं शिवलिङ्गका पतन, मुनियोंको ब्रह्माका उपदेश, शिवको प्रसन्न करने-हेतु ऋषियोंद्वारा तपस्या तथा स्तुति, शिवद्वारा सांख्यका उपदेश ............................................. | ४४६ | ४३- | चतुर्विध प्रलयका प्रतिपादन, नैमित्तिक प्रलयका विशेष वर्णन, विष्णुद्वारा अपने माहात्म्यका निरूपण ............................ | ४८० |
| ३८- | तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादका प्रारम्भ, मार्कण्डेयजीद्वारा नर्मदा तथा अमरकण्टकतीर्थके माहात्म्यका प्रतिपादन............................................. | ४६० | ४४- | प्राकृत प्रलयका वर्णन, शिवके विविध रूपों और विविध शक्तियोंका वर्णन, शिवकी आराधनाकी विधि, मुनियोंद्वारा कूर्मरूपधारी विष्णुकी स्तुति, कूर्मपुराणकी विषयानुक्रमणिकाका वर्णन, कूर्मपुराणकी फलश्रुति तथा इस पुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्पराका प्रतिपादन, महर्षि व्यास तथा नारायणकी वन्दनाके साथ पुराणकी पूर्णताका कथन ...................... | ४८५ |
| ३९- | तीर्थमाहात्म्य-वर्णनके प्रसंगमें नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका विस्तारसे वर्णन ..................... | ४६३ | |||
| ४०- | तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नर्मदा तथा उसके |