कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी द्वारा
( २५० )
विपत्प्रतीकारपरेण अनर्थपरिहारार्थिना इत्यर्थ.
भूतिममुत्सुकेन वा ऐश्वर्यकामेन वा मङ्गन्नं निषेव्यते
गन्धमाल्यादिकं निषेव्यते अर्थात् ये जनाः भूतिमिच्छन्ति
ते मङ्गलवस्तूनि सेवन्ते किंतु जगच्छ्र रणयस्य संसार-
˙स्य यः शरणभूतोऽस्ति तस्य तथा निराशिष निरभि-
लापस्य सतः शिवस्य आशोपहतात्मवृत्तिभिः आशया
तृष्णया उपहता दूषितात्मवृत्तिः अन्त करणवृत्तिः
येषां तेः एभिः मङ्गलैः किम् अर्थात् शिवस्तु कस्यापि
वस्तुनः आशां न करोति स तु स्वयं लोकाय शरणं
दातु समर्थः अतएव तस्य मङ्गलवस्तुभिः किम् ।
(b) पार्वतींप्रतिशिवस्य एतद्वच —
अवस्तुनिर्वंधपरे अवस्तुनि तुच्छवस्तुनि निर्वेधोऽभि
निवेशः पर प्रधानं यस्याः तस्याः संबुद्धि तुच्छवस्तुनि
अभिलापवति आमुक्ताविवाहकौतुकः आमुक्तम् आ
सञ्जितम् विवाहे यत्कौतुकं हस्तसुत्रं तद्यस्य सः ते अय
करः वलयीकृतनाहिना भूषणीकृतसर्पेण शंभोः महादेवस्य
करेण करणभूतेन तत्प्रथमावलम्बनं तदेव प्रथमं तत्प्रथमम्
अपरिचितत्वादति भयंकरमि'तभावः तद्घलम्बन ग्रहणं
चेति कथं नु सहिष्यते । कथमपिनेत्यर्थः ।
II. (a) By her face, which was as fragrant as the
lotus ( itself ) and which shone, with the
quivering leaf of the nether lip, she at night
restored the ( beauty of ) lotuses to the
waters ( of the stream ) the wealth of which
was destroyed by the showers of snow.
( २५१ )
(b) “O thou of stooping limbs, henceforth I am
thy slave, bought by the austerities”—as the
Moon-crested God said these words, she
immediately forgot ( all ) her exhaustion
caused by the austerities : for, fatigue gives
fresh vigour again by the fruition ( i. e. the
achievement of the desired object )
III. (a) जब शंकर जी ब्रह्मचारी का रूपधारण कर पार्वती के
पास आये तब पार्वती ने उठकर उनका खूब सत्कार
किया इसी विषय पर कवि कहता है कि विशेष
व्यक्तियो में लोगो का कृत्य भी आदर पूर्ण होता है
अर्थात् यद्यपि कोई बराबर वाला भी हो तो भी स्थिर
चित्त लोग विशेष व्यक्तियो में विशेष प्रकार का व्यवहार
करते हैं ।
(b) शङ्कर को अपना पति न बनाने के लिये मना करते
हुये ब्रह्मचारी ने पार्वती से कहा तुम शिव के योग्य
नहीं हो । उसी बात को कवि समझाता है कि
यज्ञस्तम्भ के लिये जो वेद की क्रिया प्रयुक्त की जाती
है वह क्रिया श्मशान के खम्भे के लिये नहीं की जा
सकती । अर्थात् पार्वती के योग्य शिव नहीं हैं ।
IV. तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्—तुषार वृष्ट्या क्षता
पद्मसंपदो यासां तासां तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्
(b) शरव्य—शरगोसाधुः शरणा+शयत् सुगंधि—सुगंधोऽ
स्यास्तीति—सुगंध+इतच् ।