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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 84 में से

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सोलहवां उल्लास
काम्यकर्म का विधान
देवी ने कहा—हे दयासागर कुलेश ! मैं काम्य कर्म के विधान
को सुनना चाहती हूँ । उसे बताइये ।
ईश्वर ने कहा—तुम जो पूछती हो, उसे मैं कहूँगा । विशुद्ध
हृदय से मन्त्र-साधक श्रीप्रासाद परामन्त्र का पाँच लाख जप करे ।
जप की दशांश संख्या का हवन करे, दशांश तर्पण करे और उत्तम
भोजन, दक्षिणा आदि से यथाशक्ति योगिनियों को सन्तुष्ट करे ।
इस प्रकार न्यास, जप, ध्यानपूर्वक होमार्चन और तर्पण से मन्त्र-
सिद्ध होकर साधक साक्षात् शिवरूप हो जाता है । तब वह अभीष्ट
प्रयोगों का साधन करे । मन्त्रसिद्ध साधक के सभी प्रकार के
षट्कर्मादि प्रयोग निश्चय ही सफल होते हैं ।
काम्य प्रयोग करनेवालों का मोक्ष नहीं होता । उन्हें अपने
प्रयोगों में सिद्धि मिलती है; यही उनकी सफलता है । एक विधान
से दो फल कहीं भी नहीं मिलते । हे देवेशि ! इसी से देवता का
यजन निष्काम भाव से करना चाहिए ।
षट्कर्मों के प्रयाग अपने और दूसरों के लिये किये जाते हैं ।
प्रयोग के दोषों की शान्ति के लिये और अपनी रक्षा के लिए न्यास-
ध्यानपूर्वक एक लाख जप मन्त्र का कर लेना चाहिए । नहीं तो,
सफलता के स्थान पर हानि की संभावना रहती है ।
ऋषि, छन्द, बीज, शक्ति, कीलक, देवता, अङ्गन्यास, ध्यान
और पूजाविधि का ज्ञान प्राप्त कर मन्त्रों को साधना करनी