कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ उल्लास
पुरश्चरण-कथन
देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं पुरश्चरण के लक्षण सुनना
चाहती हूँ । स्थान, आहारादि भेद मुझे बताइए ।
ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो । जपयज्ञ से बड़ा अन्य कोई
यज्ञ नहीं है । इसलिये जप के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
को सिद्ध करे । सब धर्मों को छोड़कर बिना किसी प्रमाद के
मन्त्रराज का अभ्यास करे । प्रमाद अर्थात् विधि की उपेक्षा करने
से हानि होती है । संसार तो दुःख का स्थान है । यदि आत्म-
सफलता चाहिये, तो पञ्चाङ्ग उपासना करे, जिससे मन्त्रजप करने-
वाला सुखी होता है ।
तीनों काल की नित्यपूजा, जप, तर्पण, होम और ब्राह्मण-
भोजन यही पुरश्चरण कहा जाता है । जो अङ्ग न हो, उसकी संख्या
का दुगना मन्त्र जप करे अन्यथा अङ्गहीनता के दोष से अभीष्ट
फल की प्राप्ति नहीं होती । चतुर्विध अन्न के पदार्थों से, जो छः
रसों से युक्त हों, विप्रों को भोजन कराकर सन्तुष्ट करे, तो सभी
कर्म सफल होते हैं । इस पञ्चाङ्ग उपासना से जो एक मन्त्र को सिद्ध
कर लेता है, उसे सभी मन्त्र हे कुलेश्र्वरि ! आपकी कृपा से सिद्ध
हो जाते हैं । उपदेश के सामर्थ्य, श्रीगुरुदेव की प्रसन्नता और
मन्त्र के प्रभाव से मन्त्रसिद्धि होती है ।
तीर्थस्थान, नदीतट, गुफा, पर्वत-शिखर, नदियों का सङ्गम-
स्थल, तपोवन, उद्यान, विल्वमूल, पर्वत-तट, देवमन्दिर, समुद्रतट