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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 84 में से

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चौदहवां उल्लास
गुरु-शिष्य-परीक्षा
देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरु और शिष्य की परीक्षा के
सम्बन्ध में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उपदेश का क्रम और
दीक्षा के भेद भी बताइये।
ईश्वर ने कहा—हे देवि ! शिष्य की विधिवत् परीक्षा लेने के
बाद ही गुरु को उसे मन्त्रोपदेश करना चाहिये, अन्यथा वह
निष्फल होता है। इसी प्रकार गुरु के सम्बन्ध में समुचित रूप
से जानकारी प्राप्त कर जब सन्तुष्ट हो जाय, तभी उनसे शिष्य
को मन्त्रोपदेश ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई गुरु और शिष्य
मोहवश एक दूसरे की परीक्षा किये बिना ही उपदेश देते और
लेते हैं, तो वे दोनों ही अनेक वर्षों तक नरक में वास करते हैं।
शिष्य के ज्ञान और क्रिया दोनों की परीक्षा एक वर्ष तक या
छः मास तक या तीन मास तक लेनी चाहिये। जो आकृष्ट करने
से या प्रताड़ित करने से दुःखी न होकर सदा यही सोचे कि यह
गुरु की कृपा ही है और श्रीगुरु का स्मरण, कीर्तन, दर्शन, वन्दन,
आज्ञापालनादि करने में जिसे आनन्द अनुभव हो, वह शिष्य
बनाये जाने योग्य है।
जिस विज्ञ पुरुष को जप, स्तोत्र, ध्यान, होमार्चनादि के करने
में आनन्द मिलता हो; जो ज्ञानोपदेश करने में निपुण हो और
जो मन्त्र में सिद्धिप्राप्त हो—ऐसे महापुरुष को 'उद्बोधक'
जानकर गुरुरूप में स्वीकार करे।