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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 84 में से

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पृष्ठ 59

साधनमाला ५३
पूजा करनी चाहिये। परिहास, प्रलाप, अति वार्तालाप, उदासीनता,
भय, क्रोध आदि से चक्र के समय में बचना चाहिये।
हाथ में पात्र लेकर चक्र में घूमना-फिरना नहीं चाहिये।
पूर्णपात्र ग्रहण कर अधिक देर तक न बैठे। हाथ में पात्र हो,
तो बातचीत न करे। एक हाथ से बिना मुद्रा के पात्र न दे। न
उसे स्थान से हटावे और न अन्य पात्रों में उसे मिलने दे। शब्द
करते हुए द्रव्य का पान न करे और न ही पात्र को पूर्ण करते समय
शब्द करे। एक दूसरे के पात्रों को टकराना नहीं चाहिये। आधार
के सहित पात्र को न उठाये और न आधार से वह गिरने पाये।
पात्र को सर्वथा खाली न करे। उसे धोकर छिपाकर रखे।
उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता
है या पश्वाचार-परायण होता है, तो उसके धर्म, अर्थ, आयु, यश,
पुण्य, ज्ञान, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। श्रीचक्र-स्थित कुलद्रव्य
को जो अपनी इच्छा से या लोभ से या भय से पशुओं को देता
है, वह योगिनियों के द्वारा मारा जाता है। चक्र के बीच में शत्रु
के भी साथ वाद-विवाद न करे। उसके कठोर वचनों को भी
सह ले।
अपने कुटुम्बी या प्यारे मित्र को देखकर जैसी प्रसन्नता होती
है, वैसी ही प्रसन्नता कौलिक को देखकर जिसे होती है, वह योगिनी
का प्रियपात्र होता है। श्री गुरुदेव, कुलशास्त्र और पूज्य स्थानों को
भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनका माहात्म्य-वर्णन करना चाहिये।
जपकाल को छोड़कर गुरुदेव के नाम का उच्चारण न करे।
‘श्रीनाथदेव स्वामी’ इस नाम से उनका उल्लेख करे। श्रीगुरु-
पादुका, मूलमन्त्र और अपनी पादुका शिष्य को छोड़कर अन्य
किसी को न बताये। मन्त्रादि गुरुमुख से प्राप्त होने पर ही सफल
होते हैं। अपनी पत्नी के समान कुलशास्त्रों का सेवन करे, पशु-
शास्त्रों को पराई स्त्री के समान समझे।