कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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है, उसे असीम पुण्य मिलता है और जो भी उसकी मनोकामना
हो, वह पूर्ण होती है ।
सभी संक्रान्ति-पर्वों में १ गौरी-शिव, २ रमा-विष्णु ३ वाणी-
ब्रह्मा, ४ शची-इन्द्र, ५ रोहिणी-चन्द्र, ६ स्वाहा-अग्नि, ७ प्रभा-रवि,
८ भद्रकाली-वीरभद्र और ९ भैरवी-भैरव इन नौ युगलों की पूर्वोक्त
विधि से पूजा करे । 'ॐ ॐ ॐ गौरीशिवेभ्यः नमः' आदि नाम-
मन्त्रों से उक्त मिथुनों का गन्ध-पुष्पादि से पूजन कर उन्हें
प्रौढ़ान्तोल्लास से युक्त ध्यान करे । इस प्रकार पूजन करने से
ये मिथुनदेवता प्रसन्न होकर साधक के मनोरथ को पूर्ण करते हैं ।
प्रतिवर्ष जो यह पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर
उक्त मिथुनलोकों में निवास करता है ।
वैशाख मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्राह्ममुहूर्त में उठकर
स्नान-सन्ध्यादि से निवृत्त हो मनोरम एकान्त स्थान में पूर्व की
ओर मुख करके बैठे । फिर विधिपूर्वक अपने आपको गन्ध-पुष्पों
से अलंकृत कर पूर्वोक्त न्यास कर देवताभाव को प्राप्त करे । सूर्य-
मण्डल के कुछ उदित होने पर इष्टदेवता का आवरणों के सहित
ध्यान कर षोडशोपचारों से चक्रपूजा-युक्त पूजन करे । इसके बाद
कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को भक्ष्य-भोज्यादि-सहित
अर्घ्य निवेदित करे और उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास
से युक्त होकर निर्विकार चित्त से पान करे । देवी के उक्त मण्डल
का ध्यान करते हुए १०८ बार जप करे । फिर जपफल समर्पित
कर पूजा और देवता का विसर्जन करे । इस प्रकार शुक्ल प्रति-
पदा के शुभ दिन से प्रारम्भ कर कृष्ण चतुर्दशी के दिन तक जप-
पूजा करे और अमावास्या के दिन कृपणता छोड़कर यथाशक्ति
तीन, पाँच या सात शक्तियों तथा कौलिकों का पूजन करे । एक
मास तक जो यह सूर्योदय का अर्चन करता है, उससे देवता
फा० ४