कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदसवां उल्लास
विशेष दिवसों के पूजन
देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं विशेष दिनों की पूजा के
विषय में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उस पूजा का फल भी
मुझे बताइए।
ईश्वर ने कहा—हे देवि ! नित्यपूजा उत्तम है, पर्वपूजा
मध्यम है, मासपूजा अधम है और एक मास से अधिक समय
हो जाने पर साधक भ्रष्ट हो जाता है।
कृष्णाष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति
—ये पाँच पर्व हैं। गुरु, परम गुरु, परापरगुरु के और अपने
जन्मदिवस पर आचार्य के द्वारा या स्वयं चक्रपूजा करे। प्रति
मास, हर दूसरे मास या छठे मास या वर्ष में श्रीगुरुपूजा
भक्तिपूर्वक करे। गुरु के अभाव में किसी कौल या उसके शिष्य
का पूजन करे और कुलपूजन-पूर्वक कुलद्रव्यों से उन्हें सन्तुष्ट
करे।
नवरात्रों में प्रथमा तिथि में एक वर्ष की सुललक्षणा कन्या
को स्नान करा कर पूजास्थान में लाकर देवता के पास
बैठावे। फिर गन्धपुष्पधूपदीप और कुलदीपकों से उसका पूजन
कर खीर, मधु-मांस, केला, नारियल आदि फलों से उसे संतुष्ट
करे। तब इष्टदेवता का ध्यान कर यथाशक्ति जप करे और
अन्त में देवता समझकर उस कन्या को नमस्कार कर विदा
करे। द्वितीया तिथि में दो वर्ष की और पूर्व तिथि में पूजिता
एक वर्ष की सुललक्षणा कन्या का पूजन पूर्ववत् करे। इसी क्रम