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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 84 में से

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४४ हिन्दी कुलार्णव
'शिव' में अपनी आत्मा को लय रखता है, उसे 'समाधिस्थ'
कहते हैं। जिस प्रकार जल में जल, दूध में दूध और घी में
घी डालने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसी प्रकार जीव-आत्मा-
परमात्मा के सम्बन्ध में समझे। जिस प्रकार ध्यानशक्ति से
कीड़ा भौंरे का रूप ले लेता है, उसी प्रकार ध्यान के द्वारा
मनुष्य ब्रह्मभूत हो जाता है। दूध से निकाला हुआ घी जैसे
पुनः उसमें फेंकने से पहले जैसा मिश्रित नहीं होता, वैसे ही
गुणों के द्वारा पृथक् किया हुआ आत्मा यहाँ कहा जाता है।
जिस प्रकार अंधेरे कारागार में बन्दी व्यक्ति कुछ नहीं देख
पाता, उसी प्रकार अलक्ष्य योगी प्रपंच को नहीं देखता। जैसे
आँख बन्द रहने पर प्रपंच नहीं दिखाई देता, उसी प्रकार
आँख खुली होने पर भी वह दृष्टिगत न हो—यही 'ध्यान'
का लक्षण है। जीव और आत्मा के ऐक्य को 'योग' कहते
हैं। जो एक क्षण के लिए 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्म-
चिन्तन करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सहजा-
वस्था उत्तम है, ध्यान-धारणा मध्यम है, जप-स्तुति अधम है
और होम-पूजा अधमाधम है; तत्त्वचिन्ता उत्तम, जपचिन्ता
मध्यम, शास्त्रचिन्ता अधम और लोकचिन्ता अधमाधम है।
कोटिपूजा के समान स्तोत्र, कोटिस्तोत्र के समान जप, कोटि-
जप के समान ध्यान और कोटिध्यान के समान लय है। नाद
से परे मन्त्र नहीं, आत्मा से परे देवता नहीं, अनुसन्धि से परे
पूजा नहीं और तृप्ति से परे फल नहीं है। हे देवि ! देह देवालय
है और जीव सदाशिव है। अज्ञानरूपी निर्माल्य को छोड़कर
'सोऽहं'-भाव से पूजन करे। जीव शिव है, शिव जीव है—
वह जीव केवल शिव है। पाशों से बँधा हुआ 'जीव' है और
पाशों से मुक्त 'सदाशिव' कहलाता है। जिस प्रकार भूसी से युक्त
धान होता है और भूसी के दूर हो जाने पर चावल कहलाता