कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ३१
इत्यादि से और सदाशिवकलाओं के पूजन के बाद 'विष्णुर्यो-
र्न०' इत्यादि मन्त्र से पूजन करे। फिर 'अखण्डैकरसानन्द०'
इत्यादि दीपनी मन्त्रों से पूजा कर धेनुमुद्रा दिखाकर 'ब्रह्माण्ड-
सम्भूत०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्र को नमस्कार करे। इस
प्रकार शुद्ध किए गए द्रव्य से और उसी से शुद्धीकृत पुष्पाक्षतों
से न्यासोक्त सभी मन्त्रों द्वारा हे प्रिये ! अपनी पूजा करे।
मूर्ध्नि में श्रीगुरुपंक्ति की और मूलाधार में श्रीपादुका की पूजा
करे। तदनन्तर पीठपूजा कर देवी का 'महापद्मवनान्तस्थे०'
इत्यादि मन्त्र से आवाहन कर, ध्यानपूर्वक, मुद्राएँ दिखाकर
गन्धपुष्पाक्षतों से उनकी पूजा करे। यन्त्र में प्राणप्रतिष्ठा कर
अर्चन करे, अन्यथा कोई फल नहीं होता। पूजन के बाद
'मन्त्रहीनं क्रियाहीनं' इत्यादि प्रार्थना द्वारा क्षमायाचना करे। ✽
देवता को, यन्त्र के स्वरूप को और मन्त्र की व्यापकता
को जाने बिना जो अर्चन किया जाता है, वह हे शाम्भवि !
व्यर्थ होता है। 'यन्त्र' साक्षात् देवता का रूप और मन्त्रमय
होता है। कामक्रोधादि दोषों और सभी प्रकार के दुःखों पर
नियन्त्रण रखने के कारण इसका नाम 'यन्त्र' पड़ा है। यन्त्र
में पूजा करने से देवता प्रसन्न होता है। जीव के लिए जैसे
शरीर है और दीपक के लिए जैसे तेल या घी है, उसी प्रकार
सभी देवताओं के लिए उनका प्रतिष्ठित यन्त्र होता है। अतः
यन्त्र रचना कर देवता की पूजा करे। एक पीठ में पृथक्
देवताओं की पूजा उनके अलग यन्त्रों में उनकी पद्धति से
उनके आवरणों के सहित करे। एक देवता का आवाहन करे
✽ देवता का यह पूजाविधान तत्तद्देवताओं की पूजा-
पद्धतियों में विस्तार से दिया है। जिज्ञासु पाठक वहाँ देखने
की कृपा करें।