कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें:१२ हिन्दी कुलार्णव
इसी प्रकार क्रमशः मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद देश
में क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी आदि अँगुलियों से न्यास करे ।
तब उक्त क्रम से क्रमशः ऊर्ध्व, प्राक्, दक्षिण, उदीच्य और
पश्चिम मुखों में क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी आदि अँगुलियों से
न्यास करे ।
तदनन्तर 'ह्सां ह्सीं' इत्यादि से षडङ्गन्यास कर 'स्हां
स्हीं' इत्यादि से भी षडङ्गन्यास करे ।
इसके बाद निम्न प्रकार षडङ्ग न्यास करे—
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौं स्हौं सर्वज्ञाय नमः—अंगुष्ठयोः ।
,, ,, अमृते तेजोमालिनि नित्यतृप्ताय नमः
तर्जन्योः ।
,, ,, ब्रह्मशिरसे स्वाहा ज्वलितशिखि-
शिखायानादिबोधाय नमः मध्यमयोः ।
,, ,, वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय नमः
अनामिकयोः ।
,, ,, सौं वौं हौं नित्यमलुप्तशक्तये नमः
कनिष्ठिकयोः ।
,, ,, श्रीं श्लीं पशु हुं फट् नित्यमनन्त-
शक्तये नमः करतलयोः ।
इसी क्रम से हृदयादि षडङ्गों में भी न्यास करे ।
अब अड़तीस कलाओं का न्यास करे । सब मन्त्रों के पूर्व
'ॐ' लगा ले । यथा—
पहले समुष्टि अंगुष्ठ से न्यास करे—
ॐ ईशानः सर्वविद्यानां शशिन्यै नमः ऊर्ध्ववक्त्रे ।
ईश्वरः सर्वभूतानां अङ्गदायै नमः पूर्ववक्त्रे ।
ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मेष्टदायै नमः दक्षवक्त्रे ।