क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
१५८ क्षेमकुतूहलम्
भोजनान्तर दुग्ध प्रयोग
गौदुग्ध या माहिष दुग्ध-करीषाग्नि (उपलों की आग) पर पक्व तथा षड्भाग
शोषित, कदुष्ण या सुखोष्ण, भोजन करने के पश्चात् (अन्त में) विज्ञ (बुद्धिमान)
मनुष्य को दुग्ध सेवन (पान) करना चाहिए।।९८।।
बहुधा पटसम्पूतं नव्ये पात्रे सुपाचितम्।
सनागरमजादुग्धं सुसिद्धारुणवर्णकम् ।। ९९ ।।
अजादुग्ध सेवन
पटसंपूत (वस्त्र से छानकर), नव्य मृत्तिकापात्र में अजादुग्ध (बकरी के दूध) में
शुण्ठी मिश्रित कर पाकोपरन्त अरुण वर्णीय हो जाने पर- सुखोष्ण पान करना चाहिए।
गव्यं सुशीतलं क्षीरं स्निग्धं गुरु रसायनम्।
अल्पाभिष्यन्दकृद्रक्तपित्तघ्नं वातनाशनम् ।। १०० ।।
१. सुशीतल २. स्निग्ध ३. गुरु
४. रसायन ५. अल्पाभिष्यन्दी ६. समपित्तनाशक
७. वातनाशक
महिषदुग्धस्य गुणाः
माहिषं मधुरं स्निग्धं सुशीतं बृंहणं गुरु।
निद्राकरं मतिहरं स्तोकमग्निप्रबोधकम् ।। १०१ ।।
माहिष दुग्ध
गुण-
१. मधुर २. स्निग्ध ३. अतिशीतल
४. बृंहण ५. गुरु ६. निद्राकर
७. मतिहर ८. अग्नि प्रबोधक (स्तोक)
अथ दुग्धस्य गुणाः
आजं लघुतरं क्षीरं कासश्वासनिबर्हणम्।
दीपनं शोषिणां पथ्यं गव्यदुग्धगुणावहम् ।। १०२ ।।
द्वादशोत्सवः २५९
आजदुग्ध
गुणा-
१. लघुतर २. कास ३. श्वास
४. क्षय (नाशक २-४) ५. दीपन ६. शोष रोगियों को पथ्य
७. गव्य दुग्ध समान गुणवान्
कालक्रमेण वयःक्रमेण च पीतदुग्धस्य गुणाः
वृष्यं बृंहणमग्निदीपनकरं पूर्वाह्नकाले पयो
मध्याह्ने बलवर्धनं कफहरं पित्तापहं दीपनम्।
बाले वृद्धिकरं क्षये क्षयहरं वृद्धेषु रेतोवहं
रात्रौ पथ्यमनेकदोषशमनं क्षीरं सदा चाक्षुषम् ।। १०३ ।।
काल-आयु क्रमानुसार दुग्ध सेवन
अ. प्रातःकाल : बल्य, बृंहण, वृष्य
आ. पूर्वाह्ण : बल्य, कफ-पित्तनाशक, दीपन
इ. बाल्यावस्था : देह वृद्धिकर
ई. क्षीणावस्था : क्षयहर
उ. वृद्धावस्था : वीर्यवर्धक
ऊ. रात्रिकाल : पथ्य (सदैव), अनिक दोषशमन, चक्षुष्य
अथ खाण्डवनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोलामलकजं चूर्णं शुण्ठ्येलाशर्करान्वितम्।
मातुलुङ्गरसेनोक्तं शोषितं सूर्यरश्मिभिः ।। १०४ ।।
एवं तु बहुशोऽभ्यक्तं शोषितं च पुनः पुनः।
ईषल्लवणसंयुक्तं चूर्णं खाडवमुच्यते ।। १०५ ।।
खाण्डव
क. विधि- कोल (बदर) तथा आमलक (धात्री) चूर्ण में शुण्ठी-एला (चूर्ण) तथा
शर्करा मिश्रितकर, मातुलुंग (बीजपूर) स्वरस से प्लावित सूर्य रश्मि में शोषित
(मुहुर्मुहु) का चूर्ण सैन्धवयुक्त बनाये। इसको 'खाण्डव' कहा जाता है।
२६० क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण- १. मुखवैशद्यकर २. रुचिधारक
३. हृद्रोगशमन ४. मुखवैरस्य नाशन
अथ भुक्तोच्छिष्टान्नदानविधानम्
खाडवं मुखवैशद्यकारकं रुचिधारकम्।
हृद्रोगशमनं चेति मुखवैरस्यनाशनम्॥ १०६॥
मुद्भुक्तोच्छिष्टमन्नं तु भुञ्जन्तु पित्तरोऽधमाः।
तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०७॥
भुक्तोच्छिष्टान्न विधान
अ. मेरे भोजन (के उपरान्त) अवशिष्ट/ उच्छिष्ट अन्न भाग (अंश) का अधम
पितृगण ग्रहण करें ऐसी धारणापूर्वक विधान है॥१०६-१०७॥
रौरवेऽपुण्यनिलये पद्माम्वुधिनिवासिनाम्।
प्राणिनामुदकं ह्येतदक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०८॥
आ. शंख संज्ञक अपुण्य स्थान में पद्माम्वुधि में निवासी प्राणियों को अक्षय्य उदक
प्रदान करता हूँ- इसे ग्रहण कीजिए॥१०८॥
अथाचमनोदकपानविधानं गुणाश्च
काले धाराधराणां निपटततितरां व्योम्नि वारिप्रपूर्णे
स्वच्छं त्वम्भोजवृन्दद्युतिमतिसरसि त्वानवीनाच्च कुम्भात्
पूर्णोदानीयमम्भः प्रतिदिनममलं न्यस्तकर्पूरसारं
भुङ्क्ते संसेव्यमानं नृपवरशुचिदं वारि चारोग्यकारि॥ १०९॥
आचमनोदक पान
मेघ कमल समूह (जलपूर्णाकाश) प्रकाशमान् सरास में पतित स्वच्छ जलको नव
घट से प्राप्त- कर्पूर सुगन्धित जल- का पान (सेवन) करते हुए आहार ग्रहण करते
हैं- ऐसा जलपान नृपों को शुचि-पवित्रता तथा आरोग्य प्रदान करता है॥१०९॥
अथेषिकाखण्डकस्य विधानं गण्डूषकरणस्य फलञ्च
दन्तनिष्कोषणं कार्यं रोहिषस्य शलाकया।
ततो गण्डूषकरणमास्योच्छिष्टविशुद्धये॥ ११०॥
द्वादशोत्सवः २६१
इषिका खण्डक विधि
भोजनोपरान्त रोहिण शलाका से दन्त-मध्य को स्वच्छ करें। (दन्त निष्को वर्ण);
फिर उच्छिष्ट मुख की विशुद्धि हेतु गण्डूष धारण करते हैं॥११०॥
अथ जानुस्पर्शनविधानम्
मा करेण करं पार्थ मा गण्डौ मा च चक्षुषी।
जानुनी स्पृश राजेन्द्र भर्तव्या बहवो यदि॥ १११॥
जानुस्पर्शनम्
हे! राजेन्द्र, यदि प्रजा का पालन-पोषण (भर्तव्या बहनो यदि) करने की
अभिलाषा है, तो अपने हाथों (या करेण कर) से हाथ, (हस्त), उभार गण्डस्थल तथा
उभय (दोनों) नेत्रों का स्पर्श नहीं करके, इसके स्थान पर उभय जानु का स्पर्श करना
चाहिए॥१११॥
अथचमनान्ते करमर्दनचन्दनस्य विधानम्
कृष्णागुरुप्रभृतिकैरतिसौरभैश्च
कर्पूरसाररजसाऽऽचमनान्तमुच्चैः।
आराधितत्रिपुरवैरिपदाम्बुजानां
भुक्तावसानकरमर्दन चन्दनं स्यात्॥ ११२॥
करमर्द चन्दनम्
कृष्णागुरु प्रभृति सुगन्धि द्रव्य तथा कर्पूरसार के चन्दन से आचमन करे, उसके
अन्त में त्रिपुरवैरि (भगवान् शंकर) का पूजन (पदाधुजानाम्) करने के उपरान्त,
अयोजन के अन्त में, करमर्दन चन्दन किया जाना चाहिए॥११२॥
अथ भोजनपरिणामार्थश्लोकपाठविधानम्
भोजनान्ते हि सद्भिप्रस्वेतद्वाक्यानि वै पठेत्।
आहारपरिणामार्थमायुर्वृद्धिकराणि च॥ ११३॥
भोजन से परिपाकवार्थ ईश्वर प्रणधान
स्वेत् विप्र (सुब्राह्मण) द्वारा गृहीत आहार का सम्यक् पाचन (परिणाम) के उद्देश्य
से मन्त्र (श्लोक) सत् वाक्यों को भोजनान्त में पाठन (उच्चारण) करना अपेक्षित
है॥११३॥
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२६२ क्षेमकुतूहलम्
नेत्रशक्तिवर्द्धकोमन्त्रः
शर्यातिं च सुकन्यां च च्यवनं शक्रमश्विनौ।
भोजनान्ते स्मरेद्यस्तु चक्षुस्तस्य न हीयते ॥११४॥
चक्षुष्यमन्त्र
शर्याति, सुकन्या, च्यवन, इन्द्र, अश्विनौ, (उभयकुमार) को स्मरण करने से नेत्र
(दृष्टि) शक्ति वृद्धि होती है॥११४॥
भोजनस्य परिपाकाय मन्त्रः
अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम्।
आहारपरिणामार्थं संस्मरेच्च वृकोदरम् ॥११५॥
भोजन सुपरिपाक विधान
अगस्त्य मुनि, कुम्भकर्ण, (रावणभ्राता) शनैश्चर, बडवानल एवं वृकोदर
(भीम) का आहार का परिणाम (पाचन) हेतु भोजन के अन्त में स्मरण करना
चाहिए॥११५॥
विष्णुः समस्तेन्द्रियदेहदेही प्रधानभूतो भगवान् यथैकः।
सत्येन तेनान्नमशेषमेतदारोग्यमन्तं परिणाममेतु ॥११६॥
समस्त इन्द्रियाँ शरीर की आत्मा एक ही प्रधानभूत भगवान् विष्णु है- इसे सत्य
(स्मरण करने) के कारण आरोग्य प्राप्ति- निर्व्याधि अवस्था-शरीर को हो सके, तदर्थ
(भगवान विष्णु) का स्मरण किया जाना हितकर है॥११६॥
इत्यादिबहुवाक्यानि भोजनान्तेषु यः पठेत्।
स भवेद्वल्लभो राज्ञां चायुरवाप्नुयात् ॥११७॥
इस प्रकार (पूर्वोक्त) सदवाक्यों- मन्त्रों-स्मरणीय वचनों आदि का जो व्यक्ति
पाठन करता है, वह भोजनार्थी एवं सदोच्चारण के कारण, राजवल्लभ (राजाओं का
प्रिय) हो जाता है, तथा राजा स्वयं दीर्घायुष्य का लाभ प्राप्त करता है (राजा
आयुरवाऽप्नुयात्)॥११७॥
अथ ताम्बूलभक्षणविधानम्
ताम्बूलं स्वर्णवर्णं क्रमुकफलयुतं साग्रमग्र्यं गृहीतं
कर्पूरैणाण्डजाभ्यां कृतखदिरवटीसौरभेणातिपूर्णम्।
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द्वादशोत्सवः २६३
चूर्णं ग्रावानुजातं शशधरकिरणप्रोज्ज्वलं तेन सार्कं
दत्त्वा विप्राय पूर्वं तदनु नरपतिर्भक्षयेदामदत्तम् ॥११८॥
ताम्बूल भक्षण
स्वर्ण वर्णिय अग्रभाग समान (सहित) ताम्बूल, में पूगखण्ड (क्रमुक), कर्पूर
एवं कस्तूरी मिश्रित सुगन्धित खदिर वटी (कत्था) तथा चन्द्र किरण समान चूर्ण (चूना)
रखकर सर्वप्रथम राजा ब्राह्मण (द्विपु) को प्रदान करे, फिर विश्वस्त व्यक्ति (आप्तदत्तम्)
द्वारा प्राप्त, राजा से स्वयं (नरपतिर्भक्षयेत्) चर्वण (भक्षण) करना चाहिए॥११८॥
अथाजीर्णोपशमनद्रव्याणि
विरुद्धाध्यशनात्यर्थचिन्ताविण्मूत्रधारणात् ।
असात्म्यभोजनाद्द्वेषात्क्रोधात्स्वप्नविपर्ययात् ॥११९॥
इत्यादिकारणैर्जन्तोर्यदा त्वन्नं न पच्यते।
तदाऽन्नपरिपाकार्थमेतद्द्रव्यान्तरं भजेत् ॥१२०॥
पिष्टान्ने सलिलं प्रियालफलजे पथ्या हिता मांसजे
क्षीरे गव्यभवे च तक्रमुचितं मोचाफलं सर्पिषि।
नारङ्गे गुडभक्षणं च कथितं मत्स्योद्भवे काञ्जिकं
गोधूमेऽपि च कर्कटी हितेतरा शेषाणि बुद्ध्या भजेत् ॥१२१॥
अजीर्ण निवारण विधानम्
क. अजीर्ण के हेतु आहार-विहार
१. विरुद्ध भोजन २. अध्यशन ३. अतिचिन्ता
४. असात्म्य भोजन ५. द्वेष ६. क्रोध
७. निद्रा विपर्यय ८. अन्य कारण
ख. अजीर्ण का शमन
१. पिष्टान्न : जल २. मांस : हरीतकी ३. गोदुग्ध : तक्र
४. घृत : कदली ५. नारंग : गुड़ ६. मत्स्य : कर्कटी
अन्य द्रव्यों (आहार-विहार) से उत्पन्न अजीर्ण की स्थिति में (शेषाणि बुद्ध्या
भजेत) स्वबुद्धि/ आवश्यकतानुसार उपयुक्त पाचक द्रव्यों/ उपायों का अनुसरण/
प्रयोग हितकर होता है।
२६४ क्षेमकुतूहलम्
ग्रन्थकर्तृवंशवर्णनम्
वंशोऽयं किमु वर्ण्यते सुविमलो नानागुणैरुन्नतो
यत्रैकेन विभीषणश्च भिषजा नीरोगतामाप्तवान्।
श्रीरामादपरेण या सुविदिता लब्धा ह्यकोलापूरी
ग्रामा द्वादश एव चान्यविदुषा लब्धा हि दिल्लिश्वरात्॥१२२॥
ग्रन्थ कर्त्ता-वंश वृत्त
अनेक गुणों से उन्नत तथा सुविमल ग्रन्थकार के वंश का क्या वर्णन किया जा
सकती है अर्थात् उनका वंश अत्युत्तम है। जिस वंश के एक वैद्य (भिषक्) विभीषण
को रोग से विमुक्ति की थी (निरोगता)। एक अन्य चिकित्सक ने भी राम के द्वारा
सुप्रसिद्ध अकोलापुरी को प्राप्त किया था। उसी वंश के अन्य विद्वान (विदुषा) ने दिल्ली
नरेश (दिल्ली खर) से बारह ग्राम (ग्रामा द्वादश) प्राप्त किये थे॥१२२॥
पुत्राः क्षेमभिषग्वरस्य षडिमे नानागुणैरुन्नता
गोपालो शिवपालमाधववरौ नारायणस्त्वद्भुतः।
रामो लक्ष्मणसंज्ञकः सुविदिताः संवत्सराणां शत
जीव्यासुः पृथीतलेऽतिसुखिनो नित्योत्सवैरुत्सुकाः॥१२३॥
भिषखर (चिकित्साकों) में श्रेष्ठ-उत्तम गुणों से युक्त छह (षडिमे) पुत्र हुए-
गोपाल, शिवपाल, माधववर, अद्भुत सम्पन्न नारायण, राम तथा लक्ष्मण। यह समस्त
पृथ्वी पर अतिसुखी, नित्यप्रति अनेक उत्सवों से प्रसन्न (नित्योत्सवैरुत्सुकाः) रह कर
ख्यातनामा थे॥१२३॥
प्रजाक्षेमकृता क्षेमशर्मणा वंशपद्धतिः।
स्वकीया स्वयमावर्त्य वर्णविन्यासशालिना॥१२४॥
वर्णों को यथास्थान चुनावपूर्व स्थापित-कुशल (कवि) वर्णविन्याशाली-क्षेम शर्मा
वे स्वयं स्ववंश परम्परा का परिचर्या, प्रजाक्षेम (प्रजाओं-जनमानस के कल्याणार्थ)
प्रस्तुत था॥१२४॥
परदोषकथास्वनादरा बहवः सन्त्यवनौ सुसज्जनाः।
इति चेतसि सन्निधाय यत्क्रमेवाद्रियतां तदार्यकैः॥१२५॥
इस पृथ्वी पर बहुत से सज्जन (बहवः सत्यवनौ सुसज्जनाः) अन्य व्यक्तियों के
द्वादशोत्सवः २६५
दोषों पर ध्यान नहीं देते (परदोषकथास्वनादरा), इस धारणा को मन में रखकर (चेतसि
सन्निधाय), जो कुछ मैंने लेखन ग्रन्थ रूप में किया है, इसका सम्मान आर्यजन (यत्कृत
मेवाद्रियतां तदार्यकैः:) को करना चाहिए, ऐसी आशा (विश्वासपूर्वक) है॥१२५॥
नन्दन्तां नीतिभाजः सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्वं
दुर्हत्ता यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा।
नीरं यच्छन्तु मेघाः कलयतु सुकविः काव्यकौशल्यलीला-
मव्यादव्याजभाजं परिहतदुरितं क्षेमशर्माणमीशः॥१२६॥
नीति का पालन कर्त्ता (नीतिभाज नन्दताम्), समस्त पृथ्वी पर निवास करने वाले
संसार का पालन करें (सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्व), दुर्जन नष्ट हो जायें (दुर्हत्ता
यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा), मेघ जल की वर्षा करें (नीरं यच्छन्तु मेघाः
कलयतु), सुकवि काला कुशलता की लीला प्रगट करें (सुकविः काव्यकौशल्यलीलाम-
व्याजभांज परिहत दुरितं) तथा भगवान् शिव शंकर का निष्कयोजन (निष्कास) भजन
कर्त्ता निष्पाप क्षेम शर्मा (क्षेमशर्माणमीशः) की सुरक्षा प्रदान करें।
बाणाकाशसुते नादे (१६०५) वत्सरे विक्रमाङ्किते।
ऊर्जे शुक्लत्रयोदश्यां ग्रन्थः पूर्णोऽयमैन्दवे॥१२७॥
इति श्रीनरवैद्यमन्थात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
गोरसपानकादिप्रशंसनो नाम द्वादशोत्सवः॥१२॥
विक्रम संवत्सर सौलह सो पाँच (१६०५) कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी सोमवार के
दिन यह ग्रन्थ ने पूर्णता को प्राप्त किया॥१२७॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का गोरस-पानक निर्माण-
वर्णननामक बारहवां उत्सव समाप्त॥
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