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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] अनुपलब्धि लक्षण का खण्डन ३११
तथा सति च यत्र भावोपलम्भस्तत्राप्यभावप्रमा स्यात् । न हि तत्र हेतुव्यतिरेकेणैव
वा सत्येव वा तदभावप्रमोत्पद्यते ।
तत्तदविनाभूतविरहसहितः स तथेति चेन्न । तदविनाभूतव्यतिरेकस्य तद्‌व्यति-
रेकेणैवान्यथासिद्धसन्निधेरपि हेतुत्वाङ्गीकारे प्रमाणाभावात् । अत एव आलोकस्या-
ध्यक्षणे नाऽऽलोकान्तरवत्ताऽवयवेनावयविना वा, आलोकेनान्यथासिद्धसन्निधि-
र्हेतुरित्यालोकाभावग्रहे सा नापेक्ष्यते । अर्थाक्षयोगस्तु नार्थव्याप्तः , अंशत
ऐक्यात् ।
तद्विरहसहितः स तथेति चेन्न । इन्द्रियसन्निकर्षस्य हि प्रतियोग्युपलम्भे
तावद्धेतुताऽङ्गीक्रियते । तत्र किं सन्निकर्षव्यतिरेके कार्यानुदयोदाहरणमेष्टव्यं न वा ?
योगी ) का प्रत्यक्ष होता है, वहाँ भी अभाव की प्रमा हो जायगी । अर्थात् जहाँ 'घटः'
ऐसी प्रमा है, वहाँ भी 'घटो नास्ति' ऐसी प्रमा हो जानी चाहिए । कारण वहाँ हेतु के
बिना ही या विद्यमान ही घटादि-प्रमा नहीं होती है, किन्तु हेतु से ही होती है ।
अतः प्रतियोगी की प्रमा की कारणसमूहरूप योग्यता विद्यमान है ।
समर्थन—प्रतियोगी और प्रतियोगिव्याप्त के अभाव से युक्त प्रतियोगिप्रमाजनक
साकल्य उक्त स्थल में नहीं है, किन्तु प्रतियोगी का सन्निकर्ष ही है। अतः अभाव की
प्रमा नहीं होती । खण्डन—प्रतियोगिव्याप्त का अभाव प्रतियोगी के अभाव से
अन्यथासिद्ध होने से उसे प्रमा का हेतु मानने में कोई प्रमाण नहीं है। अर्थात् जब
अभाव की प्रमा में प्रतियोगी-व्याप्त का अभाव कारण ही नहीं है, तब प्रतियोगिव्याप्त
के होने पर भी अभाव-प्रमा होनी चाहिए। अन्यथासिद्ध हेतु नहीं होता, इसीलिए
अवयवी या अवयवरूप आलोक के प्रत्यक्ष में अवयव या अवयवीरूप अन्य आलोक
अन्यथासिद्ध होने के कारण आलोकाभाव ( तम ) के प्रत्यक्ष में भी उसकी
अपेक्षा नहीं होती ।
किञ्च—योग्यता के लक्षण में 'तदविनाभूत' शब्द से प्रतियोगी के सन्निकर्ष का
ग्रहण अभिप्रेत है । किन्तु प्रतियोगी से व्याप्त प्रतियोगी का सन्निकर्ष नहीं होता,
कारण प्रतियोगी का सन्निकर्ष 'प्रतियोगी' से घटित है; अतः अंशतः एक है । एवञ्च
स्व से व्याप्त स्व नहीं होता, अतः असंभव हो जायगा ।
समर्थन—प्रतियोगी के अभाव से सहित प्रतियोगी की प्रमा का जनक साकल्य
अभाव-प्रमा क हेतु है, ऐसा कहेंगे । प्रतियोगी के प्रत्यक्षस्थल में प्रतियोगी का
अभाव नहीं है, अतः वहाँ अभाव की प्रमा नहीं होती । खण्डन—इन्द्रिय-सन्निकर्ष

३१२ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम

न यदि, तदा सन्निकर्षस्य हेतुतैव कुतो मन्तव्या, अन्यथैव कार्योत्पत्त्युपपत्तेः।
एष्टव्यं चेत्तर्हि तत्रैवोदाहरणे व्यवधायकेनेन्द्रियसन्निकर्षशून्ये परमार्थतश्चाभाववति
उक्तकारणसम्पत्तेरभावप्रमा स्यात्।
तत्र व्यवधायकाभावः प्रतियोग्युपलम्भको नास्तीति चेन्न। सन्निकर्षस्य प्रमा-
व्यतिरेकप्रयोजकत्वावधारणोदाहरणमेव तर्हि तन्न स्यात्। व्यवधायकस्य सन्निकर्ष-
विरोधिनैव प्रमाविरोधित्वमिति चेत्; तर्हि व्यवधायकाभावः सन्निकर्षोत्पत्तौ
कारणम्, न त्वभावप्रमाविशेषोत्पत्ताविति स्थिते स प्रसङ्गस्तदवस्थ एव।
न च सन्निकर्षाभावादेव तदानीमुक्तकारणासम्पत्तिः, प्रतियोगिसन्निकर्षस्य
अभावप्रमोत्पादकत्वे नित्यं तदनुत्पत्त्यापत्तेः।
को आप प्रतियोगी के उपलम्भ में हेतु मानते हैं। वहाँ सन्निकर्ष के अभाव में प्रति-
योगी की अप्रत्यक्षता इष्ट है या नहीं? यदि नहीं, तो सन्निकर्ष की हेतुता ही सिद्ध
कैसे होगी, कारण सन्निकर्ष के बिना भी कार्य की उत्पत्ति हो गयी। यदि उक्त स्थल में
अप्रत्यक्ष इष्ट हो, तो उसी उदाहरण में व्यवधायक के होने पर इन्द्रिय-सन्निकर्ष
नहीं है और वस्तुतः अभाव और उक्त योग्यता भी है। अतः वहाँ अभाव-प्रमा
होनी चाहिए।
समर्थन—वहाँ व्यवधायकाभावरूप प्रतियोगी के उपलम्भ का कारण नहीं है,
अतः उक्त योग्यता के न होने से अभाव की प्रमा नहीं होती। खण्डन—यदि व्यव-
धायकाभाव को कारण मानें, तो उक्त स्थल सन्निकर्ष के अभाव से प्रतियोगी की प्रमा
के अभाव का उदाहरण नहीं हुआ। एवञ्च सन्निकर्ष की हेतुता सिद्ध नहीं होगी।
यदि कहें कि व्यवधायक सन्निकर्ष का विरोधी होने से प्रमा का विरोधी है, तो व्यव-
धायक का अभाव सन्निकर्ष की उत्पत्ति में कारण है, प्रतियोगी की प्रमा में नहीं। अतः
उक्त स्थल में अभाव की प्रमा क्यों नहीं होती, यह आपत्ति वैसी ही बनी रही।
समर्थन—प्रतियोगी का सन्निकर्ष प्रतियोगी का व्याप्त नहीं है, कारण अंशतः
एक है और स्व से स्व व्याप्त नहीं होता। अतः तत्-तत् अविनाभूत से अन्य प्रति-
योगी के प्रमापक साकल्य के मध्य प्रतियोगी का सन्निकर्ष भी आता है और उक्त
स्थल में वह नहीं। अतः वहाँ अभाव की प्रमा नहीं होती। खण्डन—प्रतियोगी का
सन्निकर्ष अभाव-प्रमा का कारण नहीं है; क्योंकि यदि उसे कारण मानें, तो प्रति-
योगी के सन्निकर्षस्थल में नियमतः अभाव का ही ग्रहण होने लगेगा।

परिच्छेद ] अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन ३१३
अत एव नाव्‍यवधानमधिकं कारणमेष्टव्यम्, इन्द्रियसन्निकर्षे एव तदुपपत्तेः ।
न चाऽऽश्रयसाक्षात्कारोऽपि, प्राङ्नास्तिताग्रहादौ व्यभिचारात् ।
ननु व्यवधायकसद्भावेऽपि यत्र परमार्थतोऽस्त्यभावः, तत्रोक्तकारणाद्भावा-
वधारणमस्त्येव को विरोधः । स न तावद्भावयोगिन्यपि तावता तद्विरहग्रमा
प्रसज्येत । तर्हि प्रतियोग्यभावसहितोऽनुपलम्भ एवाभावप्रमाणमस्तु, जहीहि
योग्यताविशेषणनिवेशव्यसनम् । योग्यताविशेषणाप्रक्षेपेऽनुपलम्भमात्रतो वस्तु-
गत्या प्रतियोग्यभाववत्यपि न भावनिश्चयः । कदाचित्तु संशयो जायते, तत्कथं
तथाऽङ्गीक्रियत इति चेत् ; तर्हि व्यवधानेऽप्येवमेवेति योग्यताविशेषणाप्रक्षेपेऽपि
तुल्यम् ।
अतएव व्यवधायक के अभाव के तुल्य व्यवधान का अभाव भी प्रतियोगी
के प्रत्यक्ष में अधिक कारण नहीं है । कारण इन्द्रियसन्निकर्ष की उत्पत्ति में ही
उसका सार्थक्य है । समर्थन—अभाव के प्रत्यक्ष में आश्रय का साक्षात्कार भी कारण
है । उक्त स्थल में वह नहीं है, अतः अभाव की प्रमा नहीं होती । खण्डन—यदि
अभाव की प्रमा में आश्रय के साक्षात्कार को कारण मानें, तो घर से बाहर स्थित
पुरुष को गृहनिष्ठ चैत्राभाव का प्रत्यक्ष नहीं होगा, कारण उसे आश्रय का साक्षात्कार
नहीं है ।
समर्थन—व्यवधायक के होने पर भी वस्तुतः जहाँ अभाव है, वहाँ उक्त कारण
होने से अभाव-प्रमा होती ही है। उसमें विरोध ही क्या है ? जहाँ व्यवहित भाव है,
वहाँ प्रतियोगिविरहरूप कारण न होने से अभाव की प्रमा नहीं होगी । खंडन—तब तो
प्रतियोगी के अभाव से विशिष्ट अनुपलब्भ को ही अभाव-प्रमा का कारण मानिये,
'योग्यता' के निवेश का व्यसन छोड़िये ।
समर्थन—यदि योग्यता का निवेश न करें, तो अन्धकार में वस्तुतः अभावयुक्त देश
में भी अनुपलब्धिमात्र से अभाव का निश्चय नहीं होता; किन्तु कदाचित् सन्देह
ही होता है (पिशाच के न रहते हुए भी अन्धकार में 'पिशाच रहता हुआ भी
दिखायी नहीं पड़ता या वह है ही नहीं ?' ऐसा सन्देह होता ही है ), वह उपपन्न कैसे
होगा ? अर्थात् यदि योग्यता पद न दें, तो ऐसे अनुपलब्भ में अतिव्याप्ति हो जायगी ।
खण्डन—तब तो व्यवधायक होने पर भी अभाव का सन्देह ही होता है,
निश्चय नहीं । एवञ्च उक्त योग्यता का निवेश करने पर भी अतिव्याप्ति तुल्य ही है ।
४०

१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अपि च--मेयस्य वास्तवसत्त्वं प्रमाणकोटावनिवेशार्हमेव । मेयवस्तुसत्त्व-
निर्धारणार्थमेव हि प्रमाणाप्रमाणविवेचनं विचारकाणाम् । अन्यथाऽनुमाने
व्याप्तावुपाधिनिरासाय आयासो व्यर्थः स्यात्, व्याप्तपक्षधर्मताज्ञानमात्रस्यैव
कारणत्वाङ्गीकारेण सौष्ठव्यात् ।
प्राङ्नास्तिताप्रमितौ च यद्यभावप्रमाणतां मन्यसे, तर्हि सा न स्यात् ।
तत्रेदानों जायमानाभावप्रमोत्पत्तौ अभाववास्तवसत्ताविरहस्यापोदानीं क्वचित्स-
म्भवात् । फलविषयकालिकाभावोपलक्षिताश्रयादेः कारणकोटिनिवेशने विशेषा-
भावात् । तदुपलक्षितत्वस्यैव विशेषणस्य विशेषत्वेऽतिप्रसङ्गात् ।
तथापि सामान्यतो विशेषाभावोऽसिद्ध इति चेन्न । तस्य सत्त्वे निर्वचनापातात् ।
किञ्च--मेय का वास्तविक सत्त्व प्रमाण-कोटि में निवेशार्ह नहीं है। कारण मेय-
रूप वस्तु के सत्त्व के निर्धारणार्थ ही विचारक लोग लक्षण से प्रमाण-अप्रमाण का
विवेचन करते हैं । अन्यथा (यदि मेय के स्वरूप का प्रमाण-दल में निवेश कर सकें,
तो ) अनुमानस्थल में व्याप्ति में उपाधि के निरासार्थ प्रयास व्यर्थ हो जायगा । कारण
मेयविशिष्ट व्याप्तिपक्षधर्मता के ज्ञानमात्र को कारण मानने से ही निर्वाह हो सकेगा ।
किञ्च--यदि 'प्रतियोगी के अभाव से विशिष्ट प्रतियोगी के प्रमापक साकल्यरूप
योग्यता से विशिष्ट अनुपलब्धि' को प्रमाण मानें, तो जहाँ सम्प्रति घट है, किन्तु पहले
उसका अभाव था, वहाँ अतीत अभाव की 'प्रागत्र घटो नासीत्' ऐसी प्रमा नहीं होगी,
कारण सम्प्रति अभावघटित उक्त प्रमाण नहीं है। यदि 'फल (प्रमा) विषय जो अतीत-
काल तात्कालिक अभाव से उपलक्षित अधिकरण से विशिष्ट प्रतियोगी के प्रमापक
साकल्य' को योग्यता कहें, तो उक्त स्थल में यद्यपि आपाततः दोष की प्रतीति नहीं होती,
तथापि उक्त निवेश में कोई विशेष नहीं है । 'फलविषयकालिक अभावोपलक्षितत्व' को
अतिप्रसङ्ग होने से विशेष कह नहीं सकते । यदि अभाव से उपलक्षित आश्रय
को अभाव-प्रत्यक्ष में कारण मानें, तो सर्वत्र प्रतियोगी से युक्त अधिकरण में अभाव
की प्रमा हो जायगी, कारण यदा-कदाचित् विद्यमान अभाव से उपलक्षित प्रतियोगी
से युक्त अधिकरणमात्र है ही ।
समर्थन--यद्यपि विशेष का निर्वाचन नहीं हो सकता, तथापि प्राङ्नास्तितास्थल में
अभाव की मा होती है और अन्यत्र प्रतियोगी से युक्त अधिकरण में अभाव की प्रमा
नहीं होती; अतः फल के अनुरोध से विशेष की कल्पना करेंगे कि कोई विशेष है ।
खण्डन--यदि उक्त स्थल में विशेष है, तो अवश्य ही उसका निर्वाचन होना चाहिए ।
अन्यथा सर्वत्र सामान्यतः ही उत्तर होगा, विशेषतः उत्तर का सर्वत्र अभाव हो जायगा ।

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१५
हेत्वाभासखण्डने असिद्ध-लक्षण-खण्डनम्
कश्चायमसिद्धो नाम ? तथाहि—व्याप्तिपक्षधर्मत्वाभ्यामप्रमितोऽसिद्ध
इत्यलक्षणम्; हेत्वाभासान्तराणामपि ह्यसिद्धप्रवेश एवं सति स्यात्। व्याप्तिं
पक्षधर्मतां तत्प्रमिति वा न विरुन्धतां हेतुदोषत्वासम्भवात् ।
ननु नेदमीदृशम् । तथाहि—केचिद् दोषा व्याप्तिपक्षधर्मतातत्प्रमितिविरहा-
हेत्वाभास के खंडन में असिद्ध-लक्षण का खंडन
'सामान्यतो विशेषाभावोऽसिद्धः' यह जो पीछे कहा है, वहाँ असिद्ध भी क्या वस्तु
है ? अर्थात् लक्षण न होने से अनिर्वचनीय है । निर्वचन—व्याप्ति और पक्षधर्मता से
जो अप्रमित हो, वह असिद्ध है । खण्डन—ऐसा मानने पर विरुद्ध आदि अन्य हेत्वा-
भासों का भी असिद्ध में ही प्रवेश हो जायगा । कारण व्याप्ति तथा पक्षधर्मता और
उनकी प्रमिति के जो विरोधी नहीं, वे हेतु-दोष ही नहीं कहे जा सकते । विरुद्धादि
हेतुदोष हैं, अतः वे व्याप्ति तथा पक्षधर्मता और तत्प्रमिति के विरोधी अवश्य हैं ।
एवञ्च विरोधी होने से वे व्याप्ति-पक्षधर्मता से अप्रमित हैं ही ।
समर्थन—ऐसा बात नहीं है। देखिये—कोई दोष व्याप्ति-पक्षधर्मता और तत्प्र-
मिति के अभावरूप हैं, कोई व्याप्ति आदि के अभाव के अनुमापक हैं, तो कोई
१ यहाँतक प्रमाण-सामान्य का लक्षण और उसके विशेष प्रत्यक्ष, अनुमानादि के लक्षणों का
विस्तार के साथ खण्डन किया जा चुका । अब प्रसंगतः प्रमाणाभासों का भी खण्डन कर रहे हैं,
जिनमें अनुमानाभास या हेत्वाभासों का यह खण्डन आरम्भ हो रहा है । यहाँ सहज ही यह शंका
उठती है कि जब प्रमाणाभासों का ही खण्डन करना है, तो प्रत्यक्षाभासों का खण्डन ग्रन्थकारने
क्यों नहीं किया ? किन्तु इसका समाधान यही है कि न्यायसूत्रकार ने भी शब्दतः प्रत्यक्षाभासों का
निरूपण नहीं किया है। अतः अलग से उनका खण्डन आवश्यक नहीं है । ग्रन्थकारों ने तत्तत्
प्रसंग में उनका उल्लेख अवश्य किया है, तो यहाँ भी प्रसंगतः तत्तत् स्थलों में उनका खण्डन
किया ही गया है। इसके विपरीत हेत्वाभास कथाङ्ग होने के कारण सूत्रकार ने उन्हें कण्ठतः कहा
है । अतएव उनका यहाँ प्रधान रूप से खण्डन किया जा रहा है । यदि कहें कि संशय भी उन्होंने
कण्ठतः कहा है, तो उसका भी प्रत्यभिज्ञा-खण्डन के समय कुछ खण्डन किया ही गया है, शेष
चतुर्थ परिच्छेद में भी होगा। हेत्वाभासों में भी सव्यभिचार, विरुद्ध, सत्प्रतिपक्षित, असिद्ध,
बाधित—यह क्रम होने पर भी यतः यहाँ पीछे 'सामान्यतः विशेषाभावोऽसिद्धः' कहा गया है,
अतः प्रकृततया बुद्धिस्थ होने से पहले असिद्ध का ही खण्डन प्रस्तुत किया जा रहा है। यद्यपि
भेदस्थापना के लिए हेत्वाभासों का उपन्यास करना वादी का स्ववधार्थ उद्यम ही माना जायगा,
क्योंकि उनका सहज परिहार हो जाने से वादी निगृहीत हो जायगा । अतः उसके हेत्वाभासों का
खण्डन आवश्यक नहीं। फिर भी उन्हीं हेत्वाभासों को लेकर द्वैतापत्ति तो आ ही सकती हैं।
इसलिए उनका यहाँ खण्डन उचित ही है ।

३१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

त्मानः, केचित्तु व्याप्त्यादिभङ्गे लिङ्गभूताः, प्रतिबन्धकतयाऽनुमित्युत्पत्तिं निरुन्धा-
नाश्च केचिद्दोषभूयं भजन्ते । तत्र प्रथमे तावदसिद्धमध्यमध्यासते । तद्यथा—
व्याप्यत्वासिद्धः सोपाधिरूपः, अनौपाधिकसम्बन्धिता हि व्याप्तिः, सहोपाधिता
चानुपाधिताविरहरूपैव ।
एवमधिकरणासिद्धिरपि असिद्धावेवान्तर्भाविष्णुः, पक्षपदोपात्तस्याऽऽश्रयस्य
व्यतिरेकरूपा हि सा । सिद्धसाधनमपि तथैव । सिषाधयिषितधर्मविशिष्टो हि पक्ष
उच्यते । यच्च सिद्धं न तत्र सिषाधयिषाऽस्ति । ततो विशेषणाभावायत्तो
विशिष्टपक्षरूपस्य तत्राभावः ।
न च वाच्यं यथा सव्यभिचारत्वादङ्गव्याप्तिकमिति पृथगेव सव्यभिचारस्य
दोषत्वम् , तथाऽसिद्धत्वात्तत्र सिषाधयिषा नास्तीति सिद्धत्वस्यापि पृथगेव दोषत्वं
प्राप्नोति, लिङ्गद्वारेणासिद्धिपर्यवसायित्वात् । अन्यथा व्याप्त्यादिविरहपर्यवसायित-
मात्रेण सव्यभिचारत्वादीनामप्यसिद्धावेवान्तर्भावः स्यादिति ।
यतः सिषाधयिषाभावो न प्रतिपत्रा सिद्धत्वाल्लिङ्गाद्गम्यते । किं नाम ?
प्रतिबन्धक होने से अनुमिति का निरोध करते हैं । उनमें प्रथम दोष असिद्ध के मध्य
आता है, कारण व्याप्यत्वासिद्ध सोपाधिरूप है । अनौपाधिक सम्बन्ध ही व्याप्ति है
और अनौपाधित्वविरह ही सोपाधित्व है ।
इसी प्रकार अधिकरणासिद्धि भी असिद्ध के मध्य अन्तर्भूत होने योग्य है, कारण
वह पक्ष पद से उपात्त आश्रय का व्यतिरेकरूप है । ऐसे ही सिद्धसाधन भी असिद्ध के
मध्य अन्तर्भूत है । कारण सिषाधयिषित ( सिद्धिविषयक इच्छा का विषय ) धर्मविशिष्ट ही
पक्ष कहा जाता है । जो सिद्ध है, उसमें सिषाधयिषा नहीं होती । तस्मात् विशेषण
( सिषाधयिषा ) के अभाव से प्रयुक्त विशिष्टरूप पक्ष का भी वहाँ अभाव है ही ।
प्रश्न—'जैसे 'यह हेतु नष्टव्याप्तिक है, सव्यभिचार होने से' ऐसी अनुमिति होने
के कारण असिद्ध से पृथक् ही सव्यभिचारत्व दोष होता है, वैसे ही साध्य के सिद्ध
होने से सिषाधयिषा नहीं होती, अतः सिद्धत्व भी असिद्धि से पृथक् ही दोष होना
चाहिए । सिद्धत्व का हेतुरूपता द्वारा असिद्धि में पर्यवसान है। यदि सिद्धसाधन को
पृथक् दोष न मानें, तो व्याप्त्यादि के विरह में पर्यवसित होने से सव्यभिचार आदि
का भी असिद्ध में ही अन्तर्भाव हो जायगा ।
उत्तर—प्रतिपत्ता ( ज्ञाता ) को सिद्धत्वरूप हेतु से सिषाधयिषाभाव का ज्ञान
नहीं होता, किन्तु इच्छाभावरूप उसका ज्ञान न्यायमत में प्रत्यक्ष से और मीमांसक के

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१७
इच्छाभावस्य तस्य यथादर्शनं प्रत्यक्षादेरेवाधिगमः । इच्छैव तु तत्र यन्नास्ति तत्र
सिद्धत्वं प्रयोजकमित्येतावन्मात्रेण सिद्धत्वमुपन्यस्यते सिद्धसाधने, न त्विच्छाभाव-
मनुमातुं लिङ्गतयेति । एवं स्वरूपासिद्धिरपि पक्षधर्मताविरहरूपैव ।
ये तु व्याप्तिपक्षधर्मताविरहलिङ्गभूतास्तेऽसिद्धतः पृथगेव हेत्वाभासाः ।
तद्यथा—विरुद्धः साध्यविपरीतव्याप्तः । तत्र साध्यव्यतिरेकव्याप्तता हेतोर्न
साध्यव्याप्तताभावः । किन्नाम ? साध्यव्यतिरेकेण सहानौपाधिकः सम्बन्धोऽन्य
एवासौ । इत्थमेव पक्षधर्मताविरहात्माऽपि नायम् । किन्नाम ? ततः साध्यव्यति-
रेकेण सह निरुपाधिसम्बन्धत्वात् तत्र साध्यव्याप्तिरस्य नास्तीत्यनुमीयते । तथा
सति च साध्यव्याप्तिव्यतिरेकलिङ्गं सद्विरुद्धः पृथगेव हेत्वाभासो भवति ।
एवमनैकान्तिकोऽपि न व्याप्तिव्यतिरेकरूपः, किन्तु तल्लिङ्गमेव । तथाहि—
हेतोरन्वयस्य व्यतिरेकस्य वा व्यभिचारो न साध्यसाधनव्याप्तिविरहात्मा । किं
नाम ? व्यभिचारो हेतोः साध्यव्याप्तिविरहं विना न सम्भवतीति लिङ्गभावेन
मत में अनुपलब्धि से ही होता है। वहाँ जो इच्छा नहीं होती, उसमें सिद्धत्व प्रयोजक
है, इसीलिए सिद्धत्व का सिद्धसाधन में कथन है, इच्छाभाव के अनुमान में लिङ्गरूप से
नहीं । इसी प्रकार 'शब्दोऽनित्यः चाक्षुषत्वात्' यहाँ स्वरूपासिद्धि भी पक्षवृत्तित्वरूप
पक्षधर्मता का अभावरूप ही है ।
प्रश्न—तब तो व्याप्ति और पक्षधर्मतादि के अभाव के हेतु हेत्वाभास भी असिद्ध
में ही अन्तर्भूत हो जायेंगे, क्योंकि दोनों के आभासत्व में कोई विशेष ही नहीं है ?
उत्तर—जो दोष व्याप्ति और पक्षधर्मता के अभाव के हेतु हैं, वे असिद्ध से पृथक् ही
हेत्वाभास हैं । देखिये, साध्याभाव से व्याप्त विरुद्ध है । हेतु में साध्याभावव्याप्तता
साध्यव्याप्तत्वाभावरूप नहीं, किन्तु उससे अन्य साध्याभाव के साथ अनौपाधिक सम्बन्ध-
रूप है। इसी प्रकार विरुद्ध भी पक्षधर्मता का विरहरूप नहीं है; किन्तु यतः साध्याभाव
के साथ निरुपाधिक सम्बन्ध होने से 'साध्य की व्याप्ति इस हेतु में नहीं है' ऐसी अनुमिति
होती है, अतः विरुद्ध भी साध्य की व्याप्ति के अभाव में हेतु होने से पृथक् ही
हेत्वाभास है ।
इसी प्रकार अनैकान्तिक भी व्याप्ति का अभावरूप नहीं, किन्तु व्याप्त्यभाव का
लिंगरूप है । देखिये—हेतु के अन्वय या व्यतिरेक का व्यभिचार साध्य-साधनव्याप्ति-
विरहरूप नहीं है । किन्तु हेतु में साध्य की व्याप्ति के विरह के बिना व्यभिचार हो
ही नहीं सकता, अतः वह हेतुरूप से व्याप्तिभङ्ग का बोधन करता है । यदि हेतु

३१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
व्याप्तिभङ्गं बोधयति । यदि हि निरुपाधिः साध्येन सम्बन्धोऽस्य भवेत्, कथं
व्यभिचरितुं शक्नुयात् । तस्माद् व्याप्तिविरहलिङ्गं व्यभिचारः , न तु व्याप्ति-
विरहः । पक्षधर्मताविरहरूपता त्वनैकान्तिकस्यासम्भावितैव ।
सत्प्रतिपक्षतायां चानवगम्यमानविशेषप्रतिपक्षप्रतिरुद्धतया यत्साध्यनिश्चया-
ऽजनकत्वं हेतोः स प्रतिबन्धकसद्भावे कार्याजनकत्वमितरकारणसाधारणो वस्तु
स्वभावः । तस्य व्याप्तिपक्षधर्मताविरहरूपताऽसम्भावितैव ।
बाधस्तु साधनवति पक्षे साध्याभावबोधनात्मा भवन्नपि न व्याप्तिविरहाव-
गमरूपः । सामान्यतोऽनौपाधिकसम्बन्धरूपा हि व्याप्तिः, साधनवति च पक्षे
साध्यविरहो न सोपाधिता साध्याविरोधिस्वभावत्वात्तस्याः ।
नाप्यसौ सामान्यतः साध्यसाधनसम्बन्धस्य विरहरूपः, बाधे सत्यपि
सामान्येन साध्यसाधनयोः सम्बन्धस्य दृष्टान्तावगतस्यानपलापात् ।
में साध्य का निरुपाधिक सम्बन्ध होता, तो व्यभिचार कैसे होता ? इसलिए व्यभिचार
व्याप्तिविरह का लिङ्ग है, व्याप्तिविरहरूप नहीं । 'शब्दोऽनित्यः सत्त्वात्' इत्यादि
व्यभिचारस्थल में पक्षधर्मता ही है, अतः व्यभिचार को पक्षधर्मता का विरहरूप भी नहीं
कह सकते ।
सत्प्रतिपक्ष में प्रकृत हेतु साध्यनिश्चय का जनक नहीं हो पाता । कारण प्रतिपक्षी
द्वारा उद्भावित प्रतिहेतु की अपेक्षा हेतु में व्याप्ति-पक्षधर्मता का सत्त्व या असत्त्वरूप
विशेष ज्ञात न होने से वह प्रतिहेतु द्वारा प्रतिबद्ध हो जाता है । सत्प्रतिपक्ष में प्रति-
बन्धक होने पर साध्यनिश्चय की यह अजनकता अन्य कारण-साधारण वस्तुस्वभाव
है । वह कोई व्याप्तिविरहरूप या उसका उन्नायक होने से दोष नहीं है । अतः
सत्प्रतिपक्ष की व्याप्ति-पक्षधर्मताविरहरूपता सम्भव ही नहीं ।
साधनयुक्त अधिकरण' में साध्याभाव का ज्ञानरूप बाध भी व्याप्ति-विरह का ज्ञान-
रूप नहीं है । देखिये—सामान्यतः अनौपाधिक सम्बन्ध ही व्याप्ति है । साधनवान् पक्ष
में साध्य का अभाव उपाधिरूप नहीं है, क्योंकि उपाधि साध्य की विरोधि नहीं है और
साध्याभाव साध्य का विरोधी है ।
इसी प्रकार सामान्यतः साध्य-साधनसम्बन्ध का विरह भी बाध नहीं है, कारण
बाध होने पर भी दृष्टान्त में ज्ञात साध्य-साधनसम्बन्ध का अपलाप नहीं हो सकता ।

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१६
बाधस्य किञ्चिद्विशेषविषयत्वात् सामान्याकारपरिगृहीतस्य सम्बन्धस्य विशे-
षान्तरमादाय पर्यवसानाविरोधात् । तस्माद्विशेषबाधेन सामान्यतः सम्बन्धस्य
सोपाधिकताऽनुमीयते, निरुपाधित्वे बाधानुपपत्तेः। यथाऽऽह—'बाधाद्वोपाधिरुन्नी-
यतेऽन्यथा वेति न कश्चिद्विशेषः' इति ।
अन्यस्तु सत्प्रतिपक्षवत् बाधस्यापि प्रतिबन्धकत्वमेव, तेन बाधे सति प्रति-
बद्धत्वान्निश्चयं न करोति हेतुरिति व्याप्तिपक्षधर्मतादोषमनालोच्य अन्यथैव
बाधस्य दोषत्वमित्याह ।
तस्माद् व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितत्वानां यत्र साक्षादेव विरहस्योद्भावनं
तत्रासिद्धः, यत्र तु व्याप्त्यादिविरहलिङ्गोपन्यासः सत्प्रतिपक्षोपन्यासो वा तत्रान्यो
हेत्वाभासः ।
ननु सोपाधित्वादयोऽपि यतोऽवगम्यन्ते, तत् कुतः पृथक् दूषणं न भवत्य-
नैकान्तिकत्वादिवत् । मैवम्; अनैकान्तिकत्वादेर्व्याप्त्यादिविरहबोधने लिङ्गभाव-
नियमात् पृथगुपन्यासः । सोपाधित्वादेस्तु प्रत्यक्षादपि प्रतीतेः , न तु लिङ्गभाव-
नियमं तत्र प्रतिपादकं किञ्चिदस्ति ।
बाध पर्वतादि विशेषविषयक है और सामान्याकार से गृहीत व्याप्ति का अन्य
विशेष (महानस) का आदान करके भी उसका पर्यवसान हो सकता है । अतः
विशेषविषयक बाध से सामान्यतः गृहीत सम्बन्ध में सोपाधित्व का अनुमान होता
है, कारण निरुपाधि में बाध नहीं हो सकता । कहा भी है कि बाध से अथवा
अनुकूलतर्काभाव से उपाधि का अनुमान होता है ।
वाचस्पति मिश्र तो सत्प्रतिपक्ष के तुल्य बाध को भी अनुमिति का प्रतिबन्धक ही
मानते हैं । तस्मात् बाध होने पर प्रतिबन्धक होने से हेतु साध्य का निश्चय नहीं कर
पाता । अतः व्याप्ति-पक्षधर्मता के अभाव का पर्यालोचन न कर बाध साक्षात् ही दोष है ।
इस तरह स्पष्ट है कि जहाँ व्याप्ति, पक्षधर्मता या तत्प्रमिति के साक्षात् अभाव
का उद्भावन हो, वहाँ तो असिद्ध है और जहाँ व्याप्ति आदि के विरह के लिङ्ग
का अथवा सत्प्रतिपक्ष का उपन्यास हो, वहाँ अन्य हेत्वाभास हैं ।
प्रश्न—जैसे व्याप्तिविरह का हेतु व्यभिचार पृथक् हेत्वाभास है, वैसे ही सोपा-
धित्व का ज्ञान जिनसे होता है, वे भी पृथक् हेत्वाभास क्यों न कहे जायँ ? उत्तर—
व्याप्ति-विरह के बोधन में अनैकान्तिक (व्यभिचार) नियमतः हेतु होता है । अतः
उसका पृथक् उपन्यास है । किन्तु हेतु में उपाधि तो प्रत्यक्ष से भी ज्ञात होती है,
लिङ्गभाव से नियतप्रतिपादक वहाँ कुछ नहीं है ।

३२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
न च वाच्यं यत्र लिङ्गात्सोपाधितादेः प्रतीतिरतीन्द्रियप्रभृतिविषये, तत्र
तल्लिङ्गं पृथगेव दूषणतयाऽभिधीयताम्, न ह्यनैकान्तिकत्वादिकमपि सार्वत्रिकं
व्याप्तिविरहलिङ्गमिति हेत्वाभासाधिक्यमापन्नमिति । अनैकान्तिकत्वादिवत्तेषां
लिङ्गानामैकरूप्येण निर्देशतुमशक्यात्, पृथक् पृथगेव वाऽभिधानमशक्यमपरिस-
ङ्ख्येयत्वादिति । वक्ष्यामश्चाग्रे हेतुं तदनभिधानस्य ।
नन्वनुचितमुच्यते व्याप्त्यादिविरहलिङ्गतया अनैकान्तिकत्वादीनां पृथग्दूषण-
त्वमिति, यतो व्याप्तिपक्षधर्मतोपेतलिङ्गप्रमितिसाध्यानुमितिस्तद्वैकल्यान्न भवेत् ।
यतश्च सा न भवति, तदेव तस्यां दूषणं वक्तुं युक्तम्—‘इदमनुमित्युत्पत्तिकारणमिह
नास्ती’ति ।
न च व्याप्तिपक्षधर्मते तत्प्रमितिश्च विहायान्यत् तदुत्पत्तिकारणमस्ति
व्यतिरेकोपदर्शनयोग्यम् । तस्मादनुमितिदोषप्रतीतिकारणत्वमनैकान्तिकत्वादीनाम्,
प्रश्न—अतीन्द्रिय स्थल में जहाँ ( ‘अध्वरे हिंसाऽधर्मसाधनम्, हिंसात्वात्, ब्राह्मण-
हिंसावत्’ यहाँ निन्दितत्व हेतु से ज्ञायमान निषिद्धत्व-उपाधिक स्थल में ) लिङ्ग से
सोपाधित्व की प्रतीति होती है, वहाँ उस लिङ्ग को असिद्धि से पृथक् दूषण कहना
चाहिए । यदि कहें कि यहाँ सोपाधिकत्व-ज्ञान लिङ्ग द्वारा होने पर भी सर्वत्र लिङ्ग
से वह ज्ञान नहीं होता, अतः पृथक् हेत्वाभास नहीं होगा, तो यह भी ठीक नहीं ।
कारण व्यभिचार भी सर्वत्र व्याप्तिविरह का लिङ्ग नहीं है, विरुद्धादि से भी कहीं-कहीं
व्याप्तिविरह का ज्ञान होता ही है । एवञ्च व्यभिचार भी पृथक् दोष न होने
लगेगा । अतः यह हेत्वाभासाधिक्य हो ही गया । उत्तर—अनैकान्तिक के तुल्य उन
लिङ्गों का एकरूप से निर्देश नहीं हो सकता और असंख्येय होने से पृथक् पृथक्
निर्देश भी असंभव है । अतः सोपाधित्व के लिङ्ग पृथक् हेत्वाभास नहीं हैं । इसके
अन्य भी हेतु आगे कहे जायेंगे ।
प्रश्न—‘व्याप्ति आदि के विरह का लिङ्ग होने से अनैकान्तिक आदि पृथक् दूषण
हैं’ आपका यह कथन अनुचित है, कारण व्याप्तिपक्षधर्मताविशिष्ट लिङ्ग की प्रमिति से
साध्य की अनुमिति होती है और उसके वैकल्य में नहीं होती । एवञ्च जिनसे
अनुमिति नहीं होती, उन्हींको अनुमिति में दोषरूप से कहना उचित है कि ये अनुमिति
के कारण यहाँ नहीं है ।
व्याप्ति, पक्षधर्मता, तत्प्रमिति से अन्य अनुमिति का कारण नहीं है,
जिनका व्यतिरेक अनुमिति के व्यतिरेक में ही देखा जा सकता है । तस्मात्

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२१
न तु साक्षाद्दोषत्वम् । दोषप्रतिपादकतयाऽपि च दोषत्वं साक्षाद्दोषत्वमनुपजीव्या-
शक्याभिधानमिति प्रधानदोषस्यैव दोषतयोद्भावनं युक्तम्, न सव्यभिचारत्वा-
दीनामिति विभागसूत्रमनर्थकमिति ।
सत्यमेतत् । साक्षाद्दोषत्वं प्रतिबन्धकस्य व्याप्त्यादिविरहस्य वा । विरुद्धत्वा-
दीनां तु तत्प्रमापकतया यद्यपि दोषपक्षनिक्षेपः; तथापि विरुद्धत्वादयो यद्दोषप्रति-
पादकतयोक्तास्तदुद्भावनलाघवानुरोधात् ।
व्याप्त्यादिविरहे तत्रोद्भाव्यमाने न हेतुर्मन्तुं शक्यते ।
अनैकान्तिकत्वादौ तु उद्भाविते व्याप्त्यादिविरहोऽर्थाद् गम्यते, व्याप्त्यादि-
विरहव्यतिरेकेण अनैकान्तिकत्वादेरनुपपन्नत्वात् । यथा 'तस्माद्दीर्घोऽयम्'
अनैकान्तिक आदि अनुमिति-दोषों का प्रतीति में कारण हैं, साक्षात् दोष नहीं हैं। जो
दोष-प्रतिपादक होने से दोष हैं, उनका अभिधान साक्षात् दोष के उपजीवन के बिना
अशक्य है । अतः प्रधान दोष का ही दोषरूप से अभिधान युक्त है, सव्यभिचार आदि
का दोषरूप से कथन युक्त नहीं । एवञ्च सव्यभिचार आदि हेत्वाभास-भेदप्रतिपादक
गौतमीय विभाग-सूत्र अनर्थक है ।
उत्तर—आपकी यह शङ्का युक्त ही है, साक्षाद्दोष तो अनुमिति-प्रतिबन्धक सत्प्रति-
पक्ष या व्याप्ति आदि के विरह ही हैं । विरुद्ध आदि की भी व्याप्त्यादि-विरह के
प्रमापक होने से ही दोषों में गणना है । फिर भी विरुद्ध आदि को जो पृथक् दोषरूप में
कहा गया है, वह उद्भावन में लाघव होने से ही है । वे अपनी प्रतीति में अन्य की
अपेक्षा नहीं करते, यही उद्भावना-लाघव है ।
यदि कहें कि फिर तो व्याप्त्यादि-विरह को ही दोष मानिये, क्योंकि प्रधान वे ही
हैं और उनमें एतादृश लाघव भी है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण ‘अनयोर्न
व्याप्तिः’ इस प्रकार व्याप्त्यादिविरह का उद्भावन करेंगे, तो ‘कुतः’ यह हेत्वाकांक्षा
बनी रहेगी और उसके रहते इसका ज्ञान नहीं हो सकता । याने व्याप्त्यादिविरह
अनैकान्तादि हेतुदोष-विशेष से व्याप्त होने के कारण उन्हें भी उसके साथ कहना होगा
और इस तरह गौरव हो जायगा ।
इस पर यह नहीं कह सकते कि ‘तुल्ययुक्त्या अनैकान्तादि का उद्भावन करने पर
भी व्याप्त्यादि-विरह का ज्ञान न हो सकने से तत्कल्पनाकृत गौरव होगा ही। कारण
अनैकान्तिक स्थल में यदि अनैकान्तिक का उद्भावन करें, तो व्याप्त्यादि का विरह
४१

३२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
इत्युक्ते 'अस्मात् ह्रस्वः सः' इत्यर्थाद्गम्यते, न तु तत्र प्रतिपाद्यान्तरापेक्षा, तथे-
हापि 'निरग्नौ धूमोऽस्ती'ति प्रतिपादिते 'अग्निनाऽसौ न व्याप्तः' इत्यर्थाद् गम्यते ।
न हि सम्भवति 'अग्निना च व्याप्तोऽनग्नौ चास्ती'ति ।
अत एवऽऽनन्त्यात् अतीन्द्रियोपाध्यादिलिङ्गानां येषां पूर्वमनभिधानं
समर्थितम् , तेषामनभिधानेऽयमपि हेतुः—तानि ह्युपाधिलिङ्गानि नार्थवशादु-
पाधिमनपेक्षाणि गमयन्ति, येन तेषां व्याप्तिर्नावधारिता तं प्रति तत्प्रतिपादन-
मन्तरेणा अप्रतिपादकत्वस्यापि सम्भवात् । अनैकान्तिकत्वाद्यवगतौ च
व्याप्यादिविरहबोधाय न प्रतिपादनीयान्तरापेक्षा कस्यचित्सचेतसः सम्भवतीति
पूर्वपक्षसङ्क्षेपः ।
एवमसिद्धलक्षणे व्यवस्थिते बाधोऽयमभिधीयते । एतेन कीदृशमसिद्धलक्षणं
व्यवस्थापितमायुष्मता¹ भवति ? व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वाभ्यामप्रमितोऽसिद्ध इति तावत्
अर्थाद्गम्य होता है, कारण व्याप्ति-विरह के बिना अनैकान्तिकत्व अनुपपन्न है । जैसे
'उससे यह दीर्घ है' यह कहने पर 'इससे वह ह्रस्व है' यह अर्थाद्गम्य होता है, अन्य
प्रतिपाद्य की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही 'अग्नि के अनधिकरण में धूम है' ऐसा कहने
पर 'धूम अग्नि से व्याप्त नहीं है' यह अर्थाद्गम्य होता है । कारण यह सम्भव नहीं
कि धूम अग्नि से व्याप्त हो और अग्नि के अनधिकरण में रहता हो ।
'अतीन्द्रिय उपाधियों के लिङ्गों के अनन्त होने से उनका हेतुदोष के रूप में
अभिधान नहीं है' यह जो पीछे कह आये , वहाँ उनके अनभिधान में यह भी हेतु
जानना चाहिए कि उपाधियों के वे लिङ्ग अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा न करके उपाधि के
अर्थवशात् बोधक नहीं है । कारण जिस पुरुष ने उपाधि की उपाधि-लिंग में व्याप्ति
न जानी हो, सम्भव हैं वह व्याप्ति के प्रतिपादन के बिना उपाधि की अनुमिति न
कर सके । किन्तु किसी सचेता को अनैकान्तिकत्व आदि का ज्ञान होने पर व्याप्यादि-
विरह-बोधन के लिए अन्य प्रतिपाद्य ( व्याप्तिविरह की अनैकान्तिकत्व में व्याप्ति ) की
अपेक्षा नहीं होती, यह पूर्वपक्ष का संक्षेप है ।
खण्डन—इस तरह असिद्ध का लक्षण व्यवस्थित होने पर यह दोष होता है कि
आयुष्मान् ( आप ) ने इस पूर्वपक्ष में उक्त कथन से असिद्ध का कौन-सा लक्षण स्थिर
किया ? 'व्याप्ति-पक्षधर्मता से अप्रमित असिद्ध है' यह लक्षण विरुद्धादि-साधारण है या नहीं,
१. 'आयुष्मता' यहां निन्दा अर्थ में मतुप् प्रत्यय है ।

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२३
विरुद्धादिषु लक्षणं किं नास्ति, किं वाऽस्ति ? यदि नास्ति, तदा व्याप्तिपक्षधर्म-
ताभ्यां प्रमिता विरुद्धादयः प्राप्नुवन्ति । अथास्ति तदा तेऽप्यसिद्धभेदाः प्राप्ताः ।
अथैतस्मिँल्लक्षणे सत्यपि ते नासिद्धान्तर्भूताः, तर्हि लक्षणमिदमतिव्यापकमपन्नम् ।
अथ यत्र व्याप्तिपक्षधर्मत्वाप्रमितत्वं साक्षादुद्भाव्यते तदसिद्धमित्युच्यते, तर्हि
लक्षणान्तरमिदमुक्तं स्यात् । न चैतदपि युक्तम्; यत्र व्याप्यत्वासिद्धेर्व्याप्तिविरहमात्रं
प्रतिपाद्यते, तत्र व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितत्वानां हानं मिलितं नोद्भाव्यत इति
नासावसिद्धः स्यात् । एवं सर्वासिद्धविशेषमुदाहृत्य प्रसङ्गो विधातव्यः ।
अथ प्रत्येकमिदं लक्षणम्—व्याप्त्यप्रमिततया साक्षादुद्भाव्योऽसिद्धः, पक्ष-
धर्मत्वाप्रमिततया चेति ; तर्हि अन्योन्योदाहरणाव्याप्तेरव्यापकत्वमुभयोः । अथो-
भयोरप्यसिद्धविशेषलक्षणत्वात् अन्योन्यविषयाव्यापकता न दोषायेति मन्यसे । न;
सामान्यलक्षणे निर्वक्तुमशक्ये कथमिदं विशेषलक्षणमपि घटते ।
यदि नहीं, तो विरुद्धादि तो व्याप्तिपक्षधर्मता से प्रमित उपलब्ध होते हैं, उनकी क्या
गति होगी ? यदि यह विरुद्धादि-साधारण है, तो विरुद्धादि भी असिद्ध के ही भेद सिद्ध
हुए । यदि इस लक्षण का समन्वय होने पर भी विरुद्धादि को असिद्ध में अन्तर्भूत न
मानें, तो प्रस्तुत लक्षण अतिव्याप्ति दोष से दूषित हो जायगा ।
समर्थन—'जिसमें व्याप्ति-पक्षधर्मता से प्रमितत्व का अभाव साक्षात् उद्भावित
हो, वह असिद्ध है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन---फिर तो यह लक्षणान्तर हुआ, अतः
प्रतिज्ञाहानिरूप आपका निग्रह हुआ । किञ्च—व्याप्यत्वासिद्ध में केवल व्याप्ति का ही
विरह उद्भावित होता है । एवञ्च वहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमितत्व का अभाव उद्भावित
न होने से वह असिद्ध नहीं कहलायेगा । इसी तरह आश्रयासिद्ध और स्वरूपासिद्ध
में केवल पक्षधर्मता का विरह ही उद्भावित होने से उनमें भी उक्त लक्षण की अव्याप्ति
हो जायगी ।
समर्थन—प्रत्येक यह लक्षण है अर्थात् 'व्याप्ति की प्रमिति के अभाव का जहाँ
साक्षात् उद्भावन हो, वह असिद्ध है' तथा 'पक्षधर्मता की प्रमिति के अभाव का जहाँ
साक्षात् उद्भावन हो, वह असिद्ध है' इस प्रकार दो लक्षण करेंगे । खंडन—ऐसा
करने पर प्रथम लक्षण की आश्रयासिद्ध में और द्वितीय लक्षण की व्याप्यत्वासिद्ध में
अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि ये लक्षण असिद्धविशेष के हैं, अतः अव्याप्ति
नहीं है, तो सामान्य-लक्षण के निर्वचनीय न होने पर विशेष-लक्षण का भी निर्वचन
हो नहीं सकता; कारण सामान्य-ज्ञान के बिना विशेष की जिज्ञासा ही नहीं होती ।

३२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अथ अनुमितेरसाधारणहेतुव्यतिरेकोद्भावनं सामान्यलक्षणमस्तु । मैवम्;
सत्प्रतिपक्षोद्भावनं तथेत्यतिव्याप्तेः । भावरूपतया हेतुविशेषणे च निरुपाधित्व-
व्यतिरेकोद्भावनाव्याप्तेः । स्वरूपासिद्धिः सर्वप्रमाणसाधारणो दोष इत्यत्र
तदुद्भावनाव्याप्तेश्च ।
अथोच्यते-व्याप्तत्वपक्षधर्मताभ्यां प्रमितत्वस्य व्यतिरेको यत्र साक्षादुपन्य-
स्यते, सोऽसिद्ध इति । इदमप्यलक्षणम्; अव्यापकत्वात् । यत्र व्याप्त्यादिव्यतिरेक
उपन्यस्यते, तत्र वस्तुगत्या व्याप्तत्वप्रमितेर्व्यतिरेकोऽस्तु नाम, न तु उपन्यस्यतेऽपि,
प्रयोजनाभावात् । व्याप्तिव्यतिरेकदर्शनादेव अनुमानाङ्गवैकल्यात्मनो दोषस्योद्भा-
वनपर्यवसानात् । तस्मात्तत्र प्रमितत्वव्यतिरेकोद्भावनं नास्तीत्यव्यापकत्वं दोषः ।
ननु विशेषणाद्यभावोऽपि वस्तुतो विशिष्टाभाव एवेति नोक्तदोषः । न; यदि
विशेषाणाद्यधिको विशिष्टः, तदा तदभावभेदोऽपि स्यात् । अथ नाधिकः, तदा
समर्थन–'अनुमिति के असाधारण कारण के अभाव का उद्भावन असिद्ध है,'
ऐसा सामान्य-लक्षण करेंगे । खंडन—अनुमिति का असाधारण कारण असत्प्रतिपक्षत्व भी
है और उसका अभाव सत्प्रतिपक्षत्व है । अतः सत्प्रतिपक्ष का उद्भावन भी असिद्ध हो
जायगा । यदि कहें कि 'अनुमिति के भावरूप असाधारण कारण अभाव का उद्भावन
असिद्ध है', तो व्याप्यत्वासिद्ध में अव्याप्ति हो जायगी । कारण अनुमिति का
असाधारण कारण अनौपाधिकत्व भावरूप नहीं है, जिसके अभाव औपाधिकत्व का
उद्भावन करने से वह असिद्ध हो पाता । किञ्च स्वरूपासिद्धि सर्वप्रमाणसाधारण दोष है,
अनुमिति का असाधारण नहीं । अतः उसके उद्भावन में अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन–'जहाँ व्याप्तत्व और पक्षधर्मत्व से विशिष्ट प्रमितत्व का अभाव साक्षात्
उद्भावित हो, वह असिद्ध है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो अव्याप्ति न होगी । खंडन—अव्यापक
होने से यह भी लक्षण संभव नहीं । कारण जहाँ व्याप्ति के अभाव का उद्भावन
होता है; वहाँ भले ही वस्तुतः व्याप्ति-प्रमिति का अभाव रहे, किन्तु कोई प्रयोजन न
होने से उसका उपन्यास नहीं होता, क्योंकि व्याप्तिव्यतिरेक के दर्शन से ही अनुमान-
साधनत्व का अभाव उद्भावित हो जाता है । तस्मात् वहाँ प्रमितत्वव्यतिरेक का उद्भावन
न होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—विशेषण (व्याप्ति) का अभाव भी वस्तुतः विशिष्टाभाव (व्याप्ति-
प्रमितत्वाभाव) रूप ही है, अतः उक्त दोष नहीं होगा । खण्डन—यदि विशिष्ट
विशेषण-विशेष्य से भिन्न है, तो विशिष्टाभाव भी विशेषणाभाव से भिन्न ही है । यदि

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२५
विशेषणाभावत्वान्नान्या सा विशिष्टाभावतेति विशेष्याभावेऽपि तथात्वे पृथगेव
विशिष्टाभावत्वार्थस्तयोरित्यननुगम एव । स्वार्थानुमित्यसिद्धव्यव्याप्तिश्चानुद्भा-
वनादिति ।
अथ ब्रूषे—यत्र व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः साक्षाच्छक्योपन्यासस्तद-
सिद्धम् , शक्योपन्यासत्वस्यानुपन्यस्तेऽपि सम्भवान्नास्त्यव्यापकतेति ।
नैतदपि युक्तम् ; तथाहि—शक्योपन्यासत्वं किं शक्यस्वरूपनिर्देशत्वमात्रम् ,
उत शक्यप्रमापणत्वम् ? आद्ये अनैकान्तिकादावपि व्याप्तिशून्यत्वं शक्यप्रतिज्ञं
भवत्येव । द्वितीयेऽपि यदि साक्षादिति प्रत्यक्षेणेत्यर्थः, तदा प्रत्यक्षेण प्रमाप-
णीयत्वं व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितिविरहस्य प्रत्यक्षप्रतियोगिकाभावप्रत्यक्षतावादिमते
विरुद्धादावप्यस्तीत्यतिव्याप्तिः । अन्यमते न क्वचिदपीति सर्वाव्याप्तिः ।
अथ व्याप्तिपक्षधर्मताविरहस्यापि प्रत्यक्षप्रमापणीयता विवक्षिता, सा न
वह भिन्न नहीं है, तो जैसे विशेषणाभाव विशिष्टाभाव है, वैसे ही विशेष्याभाव भी
विशिष्टाभाव है, अतः अननुगम हो जायगा । किञ्च– स्वार्थानुमिति में व्याप्त्यादि-
व्यतिरेक का उद्भावन न होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—‘जिस स्थल में व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमितत्व का व्यतिरेक साक्षात् शक्यो-
पन्यास हो, वह असिद्ध है। जहाँ उपन्यास नहीं होता, वहाँ भी वह संभाव्य तो है
ही, अतः अव्याप्ति नहीं होगी ।
खंडन—‘शक्योपन्यास’ शब्द का क्या अर्थ है ? जिसके स्वरूप का निर्देश शक्य
( संभव ) हो यह अर्थ है, अथवा जिसका प्रमापण शक्य हो, यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में
अनैकान्तिक आदि में भी व्याप्ति-व्यतिरेक का उपन्यास शक्य है, अतः अव्याप्ति
तदवस्थ ही है । द्वितीय पक्ष में साक्षात् शब्द का ‘प्रत्यक्षतः’ ऐसा अर्थ करें, तो प्रत्यक्ष-
धर्मिक अभाव को प्रत्यक्षरूप माननेवालों के मत में व्याप्ति-पक्षधर्मता-प्रमिति के विरह
का प्रत्यक्ष से प्रमापणीयत्व विरुद्धादि में भी है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । जो
प्रत्यक्षधर्मिक अभाव को प्रत्यक्ष नहीं मानते, अपितु षष्ठ प्रमाण मानते हैं, उनके मत में
सर्वत्र असम्भव हो जायगा । अर्थात् असिद्ध में भी व्याप्त्यादि-प्रमिति के व्यतिरेक की
प्रत्यक्षता नहीं है, कारण वह अनुपलब्धिगम्य है ।
समर्थन—‘जहाँ व्याप्ति तथा पक्षधर्मता का अभाव प्रत्यक्षज्ञान का विषय हो, वह
असिद्ध है’ ऐसा कहेंगे। खंडन-– यह भी युक्त नहीं, कारण प्रमितिघटित उक्त लक्षण-
वाक्य ( ‘व्याप्तत्व-पक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः’ ) में यह अर्थ बोधन करने की सामर्थ्य ही

३२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
युक्ता; उक्तलक्षणवाक्यस्य व्याप्तिपक्षधर्मताविरहानभिधायित्वात् । तद्विरहेऽपि
तात्पर्याभ्युपगमे प्रत्येकसमुदितलक्षणताविकल्पेन अव्यापकत्वापातात् । अतीन्द्रिय-
पक्षादिविरहे च विषये तदभावादव्यापकत्वापत्तेः ।
एतेन यदि लिङ्गानपेक्षत्वं साक्षादर्थः, सोऽपि निरस्तः ।
अथोच्यते—यत्र व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः प्रतिपादनीयान्तरानपेक्ष-
तया तत्प्रमापकस्य लिङ्गस्योपन्यासव्यतिरेकेण शक्योद्भावनः, तदसिद्धमिति ।
नैतदप्युपपन्नम् ; अतिव्यापकत्वात् । तथाहि—विरुद्धादौ शक्यते तावद्वि-
नहीं है। मान भी लें कि उक्त वाक्य का यह भी अर्थ है, तो यदि उभयविरह का
उद्भावन मिलितरूप में असिद्ध हो, तो जहाँ केवल व्याप्तिविरह का उद्भावन है, वहाँ
अव्याप्ति हो जायगी। यदि एक-एक के अभाव का उद्भावन असिद्ध है, तो व्याप्तिविरह
के उद्भावन को असिद्ध मानने पर पक्षधर्मताविरह के उद्भावनस्थल (आश्रयासिद्ध)
में और पक्षधर्मता-व्यतिरेक के उद्भावन को असिद्ध मानने पर व्याप्तत्वासिद्ध में
अव्याप्ति हो जायगी ।
किञ्च—जहाँ पक्षादि-विरह अतीन्द्रिय है, वहाँ पक्षधर्मता और व्याप्ति का
व्यतिरेक प्रत्यक्षप्रमा का विषय नहीं है; अतः वहाँ भी अव्याप्ति हो जायगी । अर्थात्
मीमांसक द्वारा प्रयुक्त ‘परमाणवः अनित्याः सर्वगतत्वात्’ यहाँ अतीन्द्रिय पक्षधर्मत्व का
विरह है और ‘वन्ध्यासुतः चतुर्वेदाभिज्ञः ब्राह्मणीप्रसूतत्वात्’ यहाँ अतीन्द्रिय व्याप्तिविरह
है । वे प्रत्यक्ष-प्रमा के विषय हो ही नहीं सकते, अतः वहाँ अव्याप्ति है ।
अतएव “साक्षात्' शब्द का लिङ्गानपेक्षत्व अर्थ है, अर्थात् जहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मता
का विरह लिङ्ग की अपेक्षा न रखकर प्रमा का विषय हो, वह असिद्ध है” ऐसा जो कहते
थे, वह भी खण्डित हो जाता है । कारण अतीन्द्रिय पक्षस्थल में आश्रयासिद्धि का लिंग
से ही बोध होता है, अतः अतीन्द्रिय आश्रयासिद्धि में अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—‘जहाँ अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा न रखते हुए तथा प्रमितिजनक हेतु के
उपन्यास के बिना ही व्याप्ति-पक्षधर्मता या तत्प्रमिति के व्यतिरेक का कथन हो सके,
वह असिद्ध है' ऐसा कहेंगे । इस लक्षण में विरुद्ध में लिङ्ग का उपन्यास होने से अति-
व्याप्ति नहीं है । इसी तरह अतीन्द्रिय पक्षस्थल में लिंग का उपन्यास तो है, किन्तु लिंग
में व्याप्ति-प्रतिपादन की अपेक्षा न होने से वहाँ अव्याप्ति भी नहीं है ।
खण्डन—यह भी युक्त नहीं है, कारण ‘शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्, शब्दोऽनित्यः

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२७
पक्षवृत्तित्त्वेऽप्यङ्गभूततर्काभावात् सोपाधिकत्वावगन्तुम् । यदाह—'यत्रानुकूलस्तर्को
नास्ति सोऽप्रयोजकः' इति । तस्मात्तेषामप्येवं लक्षणयोगित्वादसिद्धत्वप्रसङ्गः ।
न च तादृशतर्काविषयत्वमपि प्रतिपादनीयान्तरानपेक्षव्याप्तिपक्षधर्मताप्रमिति-
विरहप्रमापकलिङ्गभूतमेवेति वाच्यम्; तथा सति विरुद्धत्वादिवत्तस्य हेत्वाभासा-
न्तरत्वप्रसङ्गात् ।
अथोच्यते—तथोपन्यस्यमानं तदसिद्धं भवतु । साध्यविपरीतव्याप्तत्वादिना
तु दूष्यमाणं विरुद्धाद्येव तत् । उपन्यासप्रकारभेदाच्च भेदव्यवस्था हेत्वाभासा-
नाम् । न ह्यत्र गोत्वाश्वत्वादिवदत्यन्तासङ्कर इष्यते । किं नाम ? प्रमाणप्रमेय-
भाववत् प्रकारासङ्करमात्रमिति ।
तदप्ययुक्ताभिधानम्; वक्तव्यं हि केन प्रकारेणासिद्धत्वं भवति ? न
प्रमेयत्वात्' इत्यादि विरुद्ध-अनैकान्तिक स्थलों में विपक्षबाधक तर्काभाव से भी व्याप्ति के
व्यतिरेक का अवगम होता है। यह बात उदयनाचार्यजी ने भी कही है कि जहाँ
अनुकूल तर्क न हो, वह हेतु अप्रयोजक (व्याप्तिरहित) है । तस्मात् विरुद्धादि में उक्त
लक्षण चला जाने से अतिव्याप्ति हो जायगी।
समर्थन—विपक्ष-बाधक तर्क का अभाव भी इतर प्रतिपादनीय की अपेक्षा न होने
से लिंगरूप से ही विरुद्धादि में व्याप्तिविरह का अनुमापक है, अतः अतिव्याप्ति नहीं
है। खंडन—ऐसा मानने पर विरुद्धादि की तरह विपक्षबाधक तर्काभाव भी हेत्वाभास
हो जायगा।
समर्थन—कृतकत्व आदि हेतुओं में जिस समय विपक्षबाधक तर्क के अभाव से
व्याप्यभाव का ज्ञान होता है, उस समय वह असिद्ध है और जब साध्याभावव्याप्तत्वा-
दिरूप हेतु से व्याप्यभाव का ज्ञान होता है, तब वह विरुद्धादि है। इस तरह उपन्यास
के प्रकार-भेद से ही हेत्वाभासों में भेद है। यह भेद गोत्व, अश्वत्व के तुल्य नहीं,
किन्तु प्रमाण, प्रमेय के तुल्य है । अर्थात् जैसे एक ही वस्तु चक्षुरादि-प्रमिति की
करण होने से प्रमाण और प्रमिति की विषय होने से प्रमेय है, वैसे ही प्रकार का
यह असङ्करमात्र है ।
खंडन—यह कथन भी अयुक्त है, कारण प्रकार का असङ्कर होने पर भी यह
अवश्य कहना होगा कि किस प्रकार से असिद्धत्व है ? उक्त लक्षणरूप प्रकार से
असिद्धत्व नहीं कह सकते, कारण व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमिति के अभाव का शक्योद्भावनत्व-

३२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तावदुक्तलक्षणेन, तथाशक्योद्भावनत्वस्य विरुद्धोचितप्रकारेणोपन्यस्यमानस्य
सम्भवात् । सर्वथा निष्प्रकारकस्य असिद्धधर्मिणस्तदुद्भावनाशक्यत्वात् ।
न च तथाशक्योद्भावनत्वमप्युद्भाव्यते असिद्धेः, येन प्रकारभेद-
व्यवस्थितिरनेन भवेत् ।
न च शक्योद्भावनपदस्थाने उद्भाव्यमानत्वमिति कृते निस्तारः; सोपाधित्वा-
द्युद्भावने प्रमित्यभावोद्भावनं व्यर्थत्वान्न क्रियत इति तद्व्यापकत्वं प्रसज्येतेति
प्रागेवोक्तत्वादिति ।
एतेन 'असिद्धः साध्यसमः' इति प्रत्युक्तम्; यथाकथञ्चित्साध्यसाम्यस्य सर्वसा-
धारण्यात् । साम्यविशेषस्य चोक्तप्रकारपर्यवसानव्यतिरेकेण अन्यस्यासम्भवात् ।
रूप उक्त प्रकार विरुद्ध के उचित प्रकार ( लक्षण ) द्वारा कथित कृतकत्वादि में भी
विद्यमान है। अर्थात् यदि असिद्ध का उक्त लक्षण करें, तो विरुद्धस्थल में असिद्धरूप
हेत्वाभास से ही अनुमिति का प्रतिबन्ध होने से विरुद्ध की पृथक् हेत्वाभास में गणना
व्यर्थ हो जायगी ।
समर्थन—'जहाँ साध्य के अभाव से व्याप्तत्वरूप विरुद्धत्व का उद्भावन न हो और
व्याप्तिपक्षधर्मता-प्रमिति के व्यतिरेक शक्योद्भावनत्व का उद्भावन हो, वह असिद्ध है।'
खण्डन—ऐसा कोई स्थल नहीं है, जहाँ विरुद्धादि प्रकार न हों, केवल असिद्ध
ही हो । किञ्च—स्वार्थानुमिति में असिद्धस्थल में भी शक्योद्भावनत्व का उद्भावन
नहीं होता । फिर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से भी व्यवस्था कैसे होगी ?
समर्थन—'शक्योद्भावन' पद के स्थान में 'उद्भावन' मात्र देंगे अर्थात् 'व्याप्ति-
पक्ष-धर्मताप्रमिति के व्यतिरेक का जहाँ उद्भावन हो, वह असिद्ध है, ऐसा कहेंगे ।
विरुद्धादि में यद्यपि उक्त व्यतिरेक है, तथापि उसका उद्भावन नहीं होता, अतः अति-
व्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—व्याप्यत्वासिद्ध स्थल में केवल व्याप्ति के व्यतिरेक का ही
उद्भावन होता है, प्रयोजन न होने से व्याप्तिप्रमिति के व्यतिरेक का उद्भावन नहीं
होता । एवञ्च वहाँ अव्याप्ति ही जायगी, इत्यादि पीछे कह ही आये हैं ।
समर्थन—'साध्य से सम असिद्ध है।' खण्डन—यदि अस्तित्व, ज्ञेयत्व आदि धर्म
से साम्य की विवक्षा करें, तो विरुद्धादि हेतु भी साध्यसम होने से असिद्ध हो जायेंगे ।
यदि साम्यविशेष की विवक्षा करें, अर्थात् जैसे 'साध्य, साध्य से व्याप्तत्वरूप से प्रमित
नहीं है, एक होने से' तथा 'साध्य, पक्षधर्मता से प्रमित नहीं है, संदिग्ध होने से' इस
तरह व्याप्ति-पक्षधर्मता से जो प्रमित न हो, वह साध्यसम है' ऐसी विवक्षा करें, तो उक्त
प्रकार में ही पर्यवसान होगा और उन प्रकारों का खण्डन कर ही चुके हैं ।

परिच्छेद ] [ विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ३२६
लक्ष्णान्तरेषु चोक्तदूषणप्रकारा यथासम्भवमिह योजनीया इत्यलं
विस्तरेणेति ।
विरुद्ध-लक्षण-खण्डनम्
अपिच—असिद्धलक्षणविशेषणेषु प्रमाणाव्यवच्छेदकव्यतिरिक्तेन यद्व्य-
वच्छेद्यं तत् किं केनचिद्विरुद्धं केनचिदन्यदिति चेत्, विरुद्धमेव किमुच्यते ?
तथाहि—साध्यविपरीतव्याप्तो विरुद्ध इत्याहुः । तन्न; साध्यव्यतिरेकेण हि
व्याप्तिः कात्स्न्र्येन वा, अनौपाधिको वा स्वाभाविको व, सम्बन्ध इत्याद्युक्तिभिः
सविशेषणः सहभाव एव निरुच्यते । तथा सति च साध्यव्यतिरेकेण सामानाधि-
करण्यमेव विशेषणविशेषयुक्तं विरुद्धत्वमित्युक्तं स्यात् । यदा चैवं तदा साध्य-
व्यतिरेकसामानाधिकरण्यमेव हेतोरगमकत्वे समर्थमिति तन्मात्रमुद्भाव्यम्, वृथा
विशेषणप्रक्षेपः । तथा चानैकान्तिक एवायं स्यात् ।
असिद्ध के अन्य लक्षणों में भी उक्त दूषणों की या उक्त दूषणों के सदृश
अन्य दूषणों की यथासंभव योजना करनी चाहिए, ग्रन्थ का विस्तार व्यर्थ है।
विरुद्ध-लक्षण का खण्डन
किञ्च—'व्याप्ति-पक्षधर्मता-तत्प्रमिति के व्यतिरेक का जहाँ लिङ्ग के उपन्यास के
बिना कथन हो सके, वह असिद्ध है' इस लक्षण में प्रमित्यन्त पद प्रमाण (सद्धेतु)
का व्यवच्छेदक है, किन्तु 'लिङ्ग के उपन्यास के बिना' तथा 'शक्योन्नयान' इन विशेषणों
के व्यवच्छेद्य कौन हैं ? यदि कहें कि किसी का व्यवच्छेद्य विरुद्ध है और किसी का
स्वार्थानुमितिस्थितीय असिद्ध का संग्रह फल है, तो विरुद्ध ही क्या वस्तु है ? अर्थात्
लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय ही है। अतः व्यवच्छेद्य के न होने से उक्त
विशेषण व्यर्थ ही हैं ।
समर्थन—'साध्याभाव से व्याप्त हेतु विरुद्ध है ।' खण्डन—ऐसा नहीं कह
सकते, कारण यहाँ साध्याभाव के साथ व्याप्ति पदार्थ विशेषणयुक्त सहभाव ही कहना
होगा, क्योंकि सार्वत्रिक, अनौपाधिक या स्वाभाविक सम्बन्ध ही व्याप्ति है। एवञ्च
साध्याभाव के साथ विशेषण (सार्वत्रिकत्वादि) से युक्त सहभाव (सामानाधिकरण्य)
ही विरुद्ध हुआ। यदि ऐसा ही है, तो साध्याभाव के साथ सामानाधिकरण्य ही हेतु
के व्याप्तिशून्यत्व में समर्थ प्रयोजक है, अतः उतना ही लक्षण कहना चाहिए,
विशेषण का प्रक्षेप व्यर्थ है । तथाच यदि विशेषण न दें, तो विरुद्ध भी अनैकान्तिक
ही हो जायगा ।
४२

३३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
ननु साध्यव्यतिरेकसम्बन्धो यद्यपि विरुद्धानैकान्तिकयोर्द्वयोरप्यस्ति, तथापि
वस्तुगत्या स्वाभाविकोसौ विरुद्ध एवेत्येतावन्मात्रविशेषविवक्षया विरुद्धस्यानै-
कान्तिकाद्भेदोपन्यासः ।
मैवम् ; दत्तोत्तरत्वात् । वस्तुगत्या सन्नप्ययं विशेषो नोद्भावनार्ह इत्युपेक्षणीय
इत्युक्तम् । तथाहि—नेदमस्य साधकम्, एतत्साध्यं प्रति विरुद्धत्वादित्यभिधीय-
माने विरुद्धशब्दार्थनिरुक्तौ विशेषणाधिक्यस्योक्तन्यायेन दुष्परिहरत्वात् ।
अत एव 'अनैकान्तिके सन्देहेन प्रत्यवस्थानम्, विरुद्धे तु व्यतिरेकनिश्चयेनेति
विशेषादनयोर्भेदेनोपन्यासः' इत्यप्यनवकाशम् ; अनुमितिहेतुव्यतिरेको हि हेतुदोषः,
अनुमितिहेतुश्चैको व्याप्तिः, ततस्तदभावस्य दोषत्वात्तावन्मात्रं ज्ञाप्यम् । तच्च
हेतुविपक्षसम्बन्धोद्भावनमात्रादेव गम्यते । तस्मादनुमितिहेतुव्याप्तिप्रमिति-
व्यतिरेकबोधनाय संशये व्यतिरेकनिश्चये चोद्भाव्यमानेऽपि 'कुतस्ताविवे'त्यत्र
समर्थन—यद्यपि साध्याभाव के साथ विरुद्ध और अनैकान्तिक दोनों का सम्बन्ध
है, तथापि स्वाभाविक सम्बन्ध विरुद्ध में ही है । केवल इसी दृष्टि से विरुद्ध से
अनैकान्तिक का भेद कहा गया है ।
खण्डन—वस्तुतः सार्वत्रिकत्व-निवेशकृत ही यह भेद है । किन्तु यह भेद कथन
के योग्य नहीं, अतः उपेक्षणीय हैं, यह हम कह ही चुके हैं । देखिये—'यह हेतु
साध्य का साधक नहीं है, साध्य-विरुद्ध होने से' यह कहने पर तद्धटक विरुद्ध-
शब्दार्थ की निरुक्ति में उक्त रीति से विशेषण के वैयर्थ्यका परिहार किया ही नहीं
जा सकता । तथाच यह हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हो जायगा ।
समर्थन—अनैकान्तिक में हेतु में साध्याभाव की व्याप्ति का सन्देहमात्र
रहता है और विरुद्ध स्थल में हेतु में साध्याभाव के साथ व्याप्ति का निश्चय रहता
है, यही दोनों में परस्पर भेद है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण अनुमिति-
हेतुओं का अभाव ही हेतु-दोष है । अनुमिति का एक हेतु व्याप्ति है और दूसरा
पक्षधर्मता । एवञ्च इन दोनों का अभाव ही दोष होने से तन्मात्र ही ज्ञाप्य है और
उसका ज्ञान हेतु के विपक्ष में सम्बन्धमात्र से ही हो जाता है । तस्मात् अनुमिति-हेतु
व्याप्ति-प्रमिति के अभाव के बोधनार्थ पूर्वोक्त सन्देह या निश्चय का उद्भावन भी करें,
तो 'वे (उक्त सन्देह या निश्चय) ही कैसे हुए ?' ऐसी जिज्ञासा होने पर विपक्षसम्बन्धमात्र
तथा नियत विपक्षसम्बन्ध अवश्य कहने होंगे । एवञ्च व्याप्ति या तत्प्रमिति के अभाव