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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

स्वग्राह्यसम्बद्धविशेषणतायाः प्रत्यासत्तित्वनियमात् । अन्यथा आप्यपरमाण्वादौ
पृथिवीत्वादेरन्यत्र ग्राह्यतया निरस्तस्वरूपयोग्यत्वस्याभावो दृगादिभिर्गृह्येत । न हि
इन्द्रियविहारदेशेषु निष्परमाणुकत्वनियमो युक्ताभ्युपगमः । शब्दाभावप्रत्यक्षत्व-
वादिनवे श्रोत्रेन्द्रियविशेषणता सप्तमः सन्निकर्षः, न तु तत्र सम्बद्धविशेषणतेत्यतो-
ऽपि न व्यभिचारः ।
नहीं सकता । क्योंकि जलीय परमाणु में ग्रहण के स्वरूप-योग्य पृथिवीत्व का अभाव चक्षु
से गृहीत न हो, इसलिए उस इन्द्रिय से सम्बद्ध विशेषणतारूप प्रत्यासत्ति तत्तत् इन्द्रिय-
जन्य ज्ञान के विषय पदार्थ से घटित ही होती है, अग्राह्य पदार्थ से नहीं, ऐसा
नियम है।
समर्थनकर्ता—पृथिवीत्वाभाव के साथ संबद्ध-विशेषणता भी नहीं है, क्योंकि जलीय
परमाणु के साथ चक्षुःसन्निकर्ष नहीं है। फलतः जल-परमाणु में पृथिवीत्वाभाव का ग्रहण
नहीं होता। अतः 'सम्बद्ध-विशेषणता ग्राह्य पदार्थ से घटित ही होती है' इस नियम को मानना
उचित नहीं है। खंडनकर्ता—इन्द्रिय-प्रचारस्थल में सर्वत्र ही चतुर्विध परमाणु व्याप्त
हैं। अतः जलीय परमाणु के साथ चक्षुःसन्निकर्ष नहीं है, यह कथन उचित नहीं।
समर्थनकर्ता—यह नियम नहीं है कि उस-उस इन्द्रिय से सम्बद्ध-विशेषणता स्वग्राह्य-
पदार्थ से घटित ही होती है। क्योंकि घ्राण तथा रसनेन्द्रिय से गन्धाभाव तथा रसा-
भाव का घ्राण या रसना से अग्राह्य पुष्प एवं गुड़ से घटित घ्राण-संयुक्त पुष्प-विशेषणता
अथवा रसना-संयुक्त गुड़-विशेषणता से भी ग्रहण होता है।
खंडनकर्ता—उन-उन गन्ध आदि की ग्राहक इन्द्रियों से अग्राह्य हैं आश्रय जिनके—
ऐसे पदार्थ (गन्धादि) प्रतियोगी हैं जिन अभावों के, उनसे इतर पदार्थों का जहाँ
ग्रहण होता है, उस स्थल के लिए यह नियम है; गन्धाद्यभाव के ग्रहण के लिए नहीं।
शब्दाभाव का प्रत्यक्ष माननेवाले नैयायिक के मत में श्रोत्रेन्द्रियविशेषणता सप्तम
सन्निकर्ष है, सम्बद्ध-विशेषणता नहीं। अर्थात् स्वग्राहक इन्द्रियों से अग्राह्य हैं आश्रय
जिनके—एवम्भूत पदार्थ हैं प्रतियोगी जिन अभावों के, उनसे इतर स्थल में यह विशे-
षण न भी दें; तथापि शब्दाभाव-प्रत्यक्ष में व्यभिचार नहीं होगा। कारण 'स्वग्राह्य-
पदार्थ से घटित विशेषणता ही प्रत्यासत्ति है' यह नियम सम्बद्धविशेषणतारूप षष्ठ
सन्निकर्ष के लिए है; सप्तम शुद्ध विशेषणता (जो शब्दाभाव के प्रत्यक्ष में है) के
लिए नहीं।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०५
न चाऽऽत्मसंयुक्तमनः प्रति. पूर्वानुभूतार्थात्मप्रत्यासत्तिरेव संस्कार इति तदती-
न्द्रियत्वं न दोषाय, प्रत्यासत्तेरतीन्द्रियाया इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य उपगमादिति
स्वीकृते निस्तारः । तथा सति स इत्यंशे चक्षुरादेः प्रत्यासत्त्यभावात् प्रत्यभिज्ञाया
अचाक्षुषत्वापातात् । अयमित्यंशो दृगादिना, तदंशस्तु मनसा गृह्यताम्, तदेतद्-
भेदस्तु केनेत्युक्तमप्यावर्तत इति ।
एतेन संस्कारः सहकारिमात्रमिन्द्रियस्यातिप्रसङ्गन्निवारकः, प्रत्यभिज्ञायां तदर्थ
इन्द्रियेणासन्निकृष्ट एवोल्लिख्यते विभ्रमार्थवत् । सन्निकृष्टग्राहिता चेन्द्रियस्य सन्नि-
कर्षसहकार्यवश्यम्भावमात्रम् । तच्चेदमंशसन्निकर्षादेव स्यात्, न तु सर्वग्राह्यसन्निकर्ष-
सहकारितेत्यपि निरस्तम् । 'सोऽयं न वे'ति संशयाभावापातेनैवेति ।
समर्थनकर्ता—'स एवाऽहम्' इस प्रत्यभिज्ञा में संस्कार ही आत्म-संयुक्त मन की
पूर्वानुभूत आत्मा में प्रत्यासत्ति है । 'स एवाऽयम्' इस प्रत्यभिज्ञा में भी
संस्कार ही पूर्वानुभूत घट की प्रत्यासत्ति है । संस्काररूप प्रत्यासत्ति का अतीन्द्रियत्व
दोष नहीं है, क्योंकि घट-प्रत्यक्षस्थल में भी चक्षुःसंयोगरूप प्रत्यासत्ति अतीन्द्रिय
है । अतः प्रत्यासत्ति अतीन्द्रिय भी मानी जाती है ।
खंडनकर्ता—ऐसा होने पर 'सः' इस अंश में प्रत्यभिज्ञा चाक्षुष सिद्ध नहीं होगी ।
समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा 'सः' इस अंश में मानस तथा 'अयम्' इस अंश में
चाक्षुष ही है—ऐसा ही मानें, तो क्या हानि है ?
खंडनकर्ता—तत्ता-विशिष्ट से इदन्ता-विशिष्ट के अभेद में न संस्कार है और न
सन्निकर्ष ही । अतः अभेदांश का न चाक्षुष प्रत्यक्ष होगा और न मानस ही, यह
पूर्वोक्त दोष बना ही रह जायगा ।
समर्थनकर्ता—प्रत्यक्ष में यावत् विषयों के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष कारण नहीं,
किन्तु कहीं-कहीं यत्किञ्चित् विषय के साथ सन्निकर्ष भी कारण है । प्रकृत में 'इदम्'
अंश के साथ चक्षुःसन्निकर्ष है । अतः तत्तांश, अभेद, इदमंश—सब प्रत्यक्ष में भासते
हैं । असन्निकृष्ट अंश के भान में संस्कार सहकारी है, अतः संस्कार के अविषय
असन्निकृष्ट पदार्थ का भान नहीं होता ।
खंडनकर्ता—अभेद-अंश में न सन्निकर्ष है और न अतिप्रसङ्गकारक संस्कार ही, अतः
प्रत्यभिज्ञा में अभेद का भान नहीं होगा । किञ्च—सर्वत्र प्रत्यभिज्ञा की सामग्री निश्चयरूप
होने से प्रत्यभिज्ञा भी निश्चयरूप ही होगी । कहीं भी 'सोऽयं न वा' इस प्रकार सन्देहरूप
प्रत्यभिज्ञा नहीं होगी. क्योंकि सन्देह का प्रयोजक दोष उक्त युक्ति से खण्डित है ।
१४

१०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
'तदद्राक्षमि'त्यादिस्मृतिरपि चैवमनुभव एव स्यात् । मनस आत्मसंयोग-
सहकृतादात्मार्थसन्निकर्षात् संस्कारात् जायमानायास्तस्या इन्द्रियार्थसन्निकर्ष-
जत्वादेव, मनसा आत्मसंयोगादात्मसमवायेन प्रत्यक्षीक्रियमाणैर्ज्ञानादिभिः स्मर्य-
माणस्य अर्थस्याविशेषादिति ।
एतेन तत्तावच्छिन्नप्रतियोगिकान्योन्याभावविरहः स्वरूपाभेदो वाऽयं भाती-
त्यपि निरस्तम् । अन्योन्याभावव्यतिरेकोऽन्योन्यमेव तच्चेदन्तोपाध्यवच्छिन्नयोः
स्यात्, न च तन्मिलितमेकेन सुग्रहम् । एवं स्वरूपाभेदेऽपि तयोधर्मैक्यं तदनव-
गाहिना दुरवगममेव ।
संस्कारोपनीते च विषये यदि ज्ञानमनुभवः स्यात्, स्मृतिरपि कुतो नानुभूतिः ?
किञ्च—संस्कार के प्रत्यासत्तित्व या सहकारित्व पक्ष में 'तद् अद्राक्षम्'
यह स्मृति भी प्रत्यक्ष हो जायगी, क्योंकि 'मनःसंयुक्तआत्मसमवेत-संस्कारविषयत्व'रूप
प्रत्यासत्ति में मन के साथ स्मर्यमाण पदार्थ के होने से पूर्वोक्त स्मृति भी आपकी
रीति से इन्द्रियजन्य ही है । 'जानामि' इस अनुव्यवसाय में मनःसंयुक्तआत्मसमवाय-
सन्निकर्ष से प्रत्यक्षीकृत ज्ञान से स्मृतिविषय तत्ताविशिष्ट में कोई विशेष नहीं है । स्मृति
का विषय तो प्रत्यक्ष है नहीं, अतः 'जानते हैं' में संस्कारघटित प्रत्यासत्ति नहीं होती ।
समर्थनकर्ता—अभेद तत्ताविशिष्ट के भेद ( अन्योन्याभाव ) का अभावरूप
अथवा स्वरूप-रूप हो, दोनों पक्षों में वह इदन्ताविशिष्ट धर्मी का स्वरूप
ही है । अतः उसका इदन्ताविशिष्ट की ग्राहक-सामग्री से ही ग्रहण होने के कारण
प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है ।
खंडनकर्ता—अन्योन्याभाव का अभाव अन्योन्यरूप ही है । प्रकृत में तत्ता और
इदन्ता इन दोनों उपाधियों से युक्त धर्मी ही अन्योन्य पदार्थ है । वह अन्योन्य केवल
संस्कार अथवा इन्द्रिय से गृहीत नहीं हो सकता । इसी तरह 'तत्' और 'इदं' दोनों
का स्वरूप-रूप अभेद भी अन्योन्यरूप ही हैं, अतः वह अन्योन्य को अविषय करनेवाले
इन्द्रिय से अग्राह्य ही है ।
किञ्च—यदि संस्कार से जन्य प्रत्यभिज्ञारूप ज्ञान अनुभव होता है, तो स्मृति
भी अनुभव क्यों न हो ?

परिच्छेद ] अनुभूति-जाति का खण्डन १०९
अथ न संस्काराधीनत्वमात्रेण स्मृतित्वम्, किन्त्वनुभवकारणासम्पृक्त-
संस्कारजत्वेन । ततश्चाधिकार्थाक्षसन्निकर्षापेक्षं प्रत्यभिज्ञानमनुभव एव भवति, न
तु स्मृतिरिति चेन्न । संस्कारासम्पृक्तानुभवकारणजत्वेन अनुभवत्वं भवति, प्रत्यभि-
ज्ञानन्तु संस्कारसहितानुभवकारणजं स्मृतिरेवेति वैपरीत्यं किं न स्यात् ।
अन्यत्र न स्मृतिरनुभवकारणसम्पृक्तसंस्कारजन्मेति तु नान्यत्रानुभवोऽपि
संस्कारसम्पृक्तार्थेन्द्रियसंयोगजन्मेति साम्यादेवाबाधकम् ।
तदेवं विनिगमनायां प्रमाणाभावात् स्वयं कल्पितव्यवस्थानवैपरीत्येनाऽपि
कल्पनासम्भवात् प्रत्यभिज्ञानमुभयकारणसम्भवात् स्मृतिश्चानुभवश्चेति मन्तव्यम् ।
तथा च स्मृतिव्यावृत्तमनुभवत्वं जातिरस्तीति दुष्प्रत्याशा निरवकाशा ।
समर्थनकर्ता—कोई भी ज्ञान केवल संस्कारजन्य होने से स्मृति नहीं होता, किन्तु
अनुभवकारणशून्य संस्कार से जन्य होने पर ही स्मृति होता है। अतः इन्द्रिय और अर्थ
के सन्निकर्ष की अपेक्षा रखनेवाली प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है, स्मृति नहीं ।
खंडनकर्ता—कोई भी ज्ञान संस्काररहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने पर ही अनुभव
होता है। किन्तु प्रत्यभिज्ञा संस्कारसहित अनुभव-सामग्री से जन्य है, अतः वह स्मृति
ही है—ऐसा विपरीत ही क्यों न मानें ?
समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा को छोड़ अन्यत्र कहीं भी स्मृति अनुभव-कारणयुक्त संस्कार-
जन्य नहीं देखी जाती। केवल प्रत्यभिज्ञा ही अनुभवकारणयुक्त संस्कारजन्य है,
अतः वह स्मृति नहीं है। खंडनकर्ता—तब तो हम भी यह प्रतिबन्दी उत्तर दे सकते हैं
कि अनुभव भी प्रत्यभिज्ञा से अन्यत्र संस्कारयुक्त अनुभव-सामग्री से जन्य नहीं देखा जाता।
केवल प्रत्यभिज्ञा ही संस्कारयुक्त अनुभव-सामग्री से जन्य है, अतः वह अनुभव नहीं है।
तस्मात् प्रत्यभिज्ञा संस्कारजन्य होने से स्मृति है अथवा इन्द्रियजन्य होने से अनुभव
है, इनमें से कोई एक पक्ष मानने में विनिगमक तो है नहीं। अतः प्रत्यभिज्ञा
स्मृति है और अनुभव भी है।
समर्थनकर्ता— जो केवल संस्कार से जन्य हो, वह स्मरण है। प्रत्यभिज्ञा केवल
संस्कार से जन्य नहीं, अतः वह स्मृति नहीं है। खंडनकर्ता—हम भी यह कह सकते
हैं कि कोई भी ज्ञान संस्काररहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने पर ही अनुभव होता
है, प्रत्यभिज्ञा संस्कार-सहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने से अनुभव नहीं है; ऐसी
स्थिति में स्मृति में न रहनेवाली अनुभवत्व एक जाति है, यह आशा ही जाती रही ।

१०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
न च विषयांशे स्मृतित्वानुभवत्वयोर्व्यवस्था कर्तुं शक्यते, तन्निरासस्य
निवेदितत्वात् । ततश्च तदेव ज्ञानं तस्मिन्नेवांशे स्मृतिश्चानुभूतिश्चेत्यापतितेऽपि
यदि न विरोधबुद्धिर्भवतस्तदा तदधीने तत्रैवार्थे प्रमात्वाप्रमात्वापाते साऽस्तु ।
एतेन विरोधापत्त्या अनुभवत्वस्वीकारे बाधकेन स्मृतिव्यतिरिक्तमलुभवत्वं
नामानुगतं साक्षात्कारज्ञानानुमित्यादिसाधारणमनुभवबलादेव व्यवस्थापनीय-
मिति प्रतीतिकलहोऽपि निरस्तः ।
ननु चानुभव एव शरणमिह, प्रत्यभिज्ञाने ह्यनुभवत्वमेवानुभूयते, न तु
स्मृतित्वम् । तेन संस्कारजत्वेऽपि इन्द्रियार्थसन्निकर्षाधिकापेक्षया अनुभवत्वमेवेति
विनिगमनायामपीदमेव प्रमाणम् । अन्यथा प्रत्यभिज्ञानेऽनुभवप्रत्ययो न स्यादिति
प्रतीतिकलहेन प्रत्यवस्थेयमिति । न ; इदन्तातत्तावभासयोरनुभवस्मरणभागयोः
सत्त्वेनानुभवस्यैकपक्षे असाधारणीकृत्य प्रमाणयितुमिहाशक्यत्वात् ।
एतेन स्मृत्यनुभवसङ्करप्रसङ्गेन अनुभूतिपदव्यवच्छेद्यं परिप्लुतं मन्तव्यम् ।
प्रत्यभिज्ञा तत्ता-अंश में स्मृति और इदन्ता-अंश में अनुभव है; इस व्यवस्था का
तो पहले ही खण्डन हो चुका है । अतः प्रत्यभिज्ञा उसी अंश में स्मृति और उसी अंश
में अनुभव होने लगेगी, जिससे एकत्र स्मृतित्व और अनुभवत्व इन दो विरुद्ध धर्मों का
सन्निवेश हो जायगा । ऐसा होने में भी यदि आपको विरोध-बुद्धि न हो, तो प्रत्यभिज्ञा
में प्रमात्व और अप्रमात्व इन दो विरुद्ध धर्मों के सन्निवेश में भी विरोध-बुद्धि छोड़
दें । अनुभवरूप होने से उसमें प्रमात्व और स्मृतिरूप होने से अप्रमात्व स्पष्ट है ।
समर्थनकर्ता—स्मृति में अवृत्ति और प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में वृत्ति अनुभवत्व जाति
की सिद्धि 'अनुभवामि' इस अनुगत-प्रतीति से ही हो जायगी । खंडनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा
में ही इन परस्पर विरुद्ध स्मृतित्व और अनुभवत्व का समावेश है, अतः सङ्कर
होने से अनुभवत्व जाति नहीं हो सकती ।
समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में 'अनुभवामि' इत्याकारक प्रतीति होती है, अतः
प्रमाण होने से संस्कारजन्य होने पर भी प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व ही है, स्मृतित्व नहीं ।
खंडनकर्ता—जैसे इदन्ता-अंश में 'अनुभवामि' इत्याकारक प्रतीति होती है,
वैसे ही तत्ता-अंश में 'स्मरामि' इत्याकारक भी प्रतीति होती है । अतः प्रत्यभिज्ञा में
'अनुभवामि' यही प्रतीति होती है—ऐसा नहीं कह सकते ।
जब प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व भी है, तो 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में अनुभूति
विशेषण का व्यावर्तनीय प्रत्यभिज्ञा है, यह कथन खण्डित जानना चाहिए ।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०६
न च वाच्यं प्रत्यभिज्ञानं व्यवच्छेद्यं मा भूत्, स्मृत्यन्तरन्तु भविष्यतीति ।
तस्याप्यनुभूतित्वेन भवताऽवश्यं स्वीकर्तव्यत्वात् । तथा हि—'घटस्तत्रासीदि'त्या-
दिस्मृतौ पूर्वकालविशिष्टो घटः स्फुरति । न चासौ पूर्वमनुभूता भूतता, या
संस्कारेणोपनीयेत । प्रत्युत पूर्वं वर्तमानतया एवानुभूत्या ग्रहणम् । तस्मादिदानीं
पूर्वताधीसामग्रीसम्भेदात् सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञानवद्विशिष्टावगमोऽप्यसौ स्मृत्य-
नुभवात्मक एवाभ्युपगन्तव्यः ।
एतेन — अनुभवसामग्रीसहितः संस्कारोऽनुभवकारणमिति पक्षे पूर्वं शङ्कित
इदमपि दूषणं द्रष्टव्यम् । तथा सति स्मृत्युच्छेदापत्तेः । न च तदस्ति स्मरणं यत्र
सा न प्रकाशते, ततश्च व्यवच्छेद्यानुपपत्तिः ।
यदपि कैश्चिदुच्यते दोषवशात् प्रमुष्टतत्तांशस्मरणं भवतीति । तदपि नोपपन्नम्;
तदीयस्मरणत्वे प्रमाणाभावात् । न चानुभवसामग्र्यभावात् परिशेष्येण स्मृतित्वम् ;
समर्थनकर्ता — उक्त-लक्षण में 'अनुभूति' पद का व्यवच्छेद्य प्रत्यभिज्ञा नहीं, किन्तु
शुद्ध स्मृति है । खंडनकर्ता—आप शुद्ध स्मृति को भी अनुभव अवश्य मानेंगे ।
देखिये, 'घटस्तत्राऽऽसीत्' इस स्मृति में पूर्वकाल से युक्त घट भासता है । वह भूतता
( तत्ता ) पूर्वकाल में अनुभूत न होने से संस्कार द्वारा उपनीत नहीं हो सकती । किन्तु
पूर्वकाल में वर्तमानता ही अनुभूत है । तस्मात् इस काल में भूतता की प्रत्यक्षसामग्री
का मिश्रण होने से 'सोऽयम्' इस प्रत्यभिज्ञा के तुल्य 'घटस्तत्राऽऽसीत्' यह भी ज्ञान
स्मृति और अनुभव उभयरूप ही मानना होगा ।
'अनुभवसामग्री से युक्त संस्कार अनुभव का कारण है', इस पूर्वकथन में यह
भी दोष है कि ऐसा मानने पर स्मृति का उच्छेद हो जायगा, क्योंकि ऐसा कोई
स्मरण नहीं, जिसमें भूतता ( तत्ता ) भासती न हो । इस तरह जब स्मृतिमात्र भूतता-
अंश में मानस अनुभवरूप है, तो 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में 'अनुभूति' पद के
व्यवच्छेद्य का उच्छेद जानना चाहिए ।
समर्थन—'इदं रजतम्' इस स्थल में दो ज्ञान हैं—'इदम्' यह अंश तो प्रत्यक्ष
है और 'रजतम्' यह अंश स्मरण । यद्यपि दोनों ज्ञानों में परस्पर भेद है, परन्तु
दोष से भेद का अग्रह है । साथ ही यद्यपि अन्यत्र तत्ता से युक्त का ही स्मरण होता है,
१. यद्यपि 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' यह लक्षण अन्यथाख्यातिवादी नैयायिक का है। अतः
मीमांसाभिमत अख्यातिवाद के अनुसार उसका पद-कृत्य अयुक्त है; तथापि प्रसङ्गतः अख्याति-
वाद के खण्डन के लिए यह कथन है ।

१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य
इन्द्रियार्थसन्निकर्षव्यावृत्त्या अनुभवसामग्र्यभावात् पारिशेष्येणानुमित्यादेरपि
स्मृतित्वापत्तेः ।
सर्वानुभवसामग्र्यसम्भवादिति चेत् , कथं पुनस्तत्तांशशून्यरजतादिज्ञान-
हेतुसामग्री नानुभवहेतुसामग्रीत्यवधारितमायुष्मता ?
पञ्चप्रमाणीकारणसामग्र्यसम्भवादिति चेन्न । चतुष्प्रमाणीजनकसामग्र्यसम्भवात्
पञ्चमी प्रमा किं न पारिशेष्यात् स्मरणं त्वया व्यवस्थापि । कुत्र च प्रतिपन्नं
पञ्चप्रमाणीकारणसामग्र्यभावे जायमानं ज्ञानं स्मृतिर्भवतीति, ‘घटस्तत्रासीत्’
इत्यादिज्ञानानामनुभवत्वोपन्यासस्य कृतत्वात् ।
अथ मन्यसे प्रत्यक्षादिकारणसामग्र्यनुपपत्त्या रजतमात्रस्य च पूर्वमनुभूतत्वेन
परन्तु प्रकृत में सादृश्य आदि दोषों से तत्ता-अंश का त्याग है—यहाँ ‘रजतम्’ यह
शुद्धस्मृति उक्त लक्षण में अनुभूति पद की व्यवच्छेद्य है । खंडन---यहाँ ‘रजतम्’ यह
अंश स्मृति है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । समर्थन---अनुभव की सामग्री नहीं है,
अतः परिशेषात् वह स्मृति है ही । खंडन—यदि ऐसा हो, तो इन्द्रियार्थ के सन्निकर्ष
की व्यावृत्ति होने से अनुमिति आदि भी परिशेषात् स्मृति होने लगेंगे ।
समर्थन--अनुभव की सम्पूर्ण सामग्री का अभाव होने से ‘रजतम्’ यह ज्ञान
स्मृति है, और अनुमिति में इन्द्रियार्थसन्निकर्षरूप प्रत्यक्ष-सामग्री न होने पर भी परामर्श
आदि अनुमितिसामग्री विद्यमान है ही, अतः वह स्मृति नहीं है । खंडन---तत्तांश
से रहित रजतज्ञान का हेतु सामग्री अनुभवसामग्री नहीं है, यह आपने कैसे
निश्चय कर लिया ?
समर्थन—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, इन पाँच प्रमाणों की
सामग्रियों के न होने से ‘रजतम्’ इस स्मृति-स्थल में अनुभवसामग्री नहीं है, यह निश्चय
किया है । खंडन—आप चार प्रमाणों की सामग्री के अभाव से पञ्चमी प्रमा ( अर्थापत्ति )
को भी स्मृति क्यों न मानें ? फिर, आपने किस उदाहरण में यह निश्चय किया है
कि पाँचों प्रमाणों की सामग्री के अभावस्थल में जायमान ज्ञान स्मृति होती है, क्योंकि
‘घटस्तत्राऽऽसीत्’ यह ज्ञान भी तत्तांश में स्मरण नहीं, किन्तु अनुभव है—यह पीछे
कहा ही जा चुका है ।
समर्थन--प्रत्यक्षादि-सामग्री के अभावस्थल में रजतमात्र पहले से अनुभूत
होने के कारण रजत-विषयक संस्कार है ही । अतः वहाँ ‘रजतम्’ इस ज्ञान में संस्कार

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १११
तद्विषयसंस्कारसम्भवात् संस्कारस्यैव हेतुताऽङ्गीक्रियते, न त्वन्यत्कारणत्वेन कल्प्यते,
इन्द्रियार्थसन्निकर्षाद्यसम्भवे जायमानस्य तु अनुमानादेरननुभूतविषयत्वेन
तस्मान्नोत्पत्तिसम्भव इति तत्कारणं लिङ्गादिकमङ्गीक्रियते । ततः प्रमाणान्तरासहकृत-
संस्कारजत्वं तद्व्यङ्ग्यो वा जातिविशेष एव स्मृतित्वमिति । मैवम्; तत्र कारणत्वं
किमिति नाक्षस्यैव, येन संस्कारजत्वं व्यवस्थाप्यते ।
तेनार्थेन सह तदाऽक्षस्य सन्निकर्षाभावादसन्निकृष्टस्य च तस्य ज्ञानजनकत्वेऽति-
प्रसङ्गात् नेन्द्रियजत्वं तस्येति चेन्न । संस्कारस्यापि केवलस्य तज्जननेऽतिप्रसङ्गताद-
वस्थ्यात् ।
सहचरितधर्मदर्शनादिना सहकारिणा युक्तस्य संस्कारस्य तज्जनने
नास्त्यतिप्रसङ्ग इति चेन्न । तेनैव सहकारिणा सहितस्येन्द्रियस्यापि तज्जनने-
ऽतिप्रसङ्गाभावात् ।
को ही कारण मानते हैं, अन्य किसीको नहीं । किन्तु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष आदि के
अभाव में जायमान अनुमिति आदि के विषय तो अनुभूत नहीं हैं, अतः वे संस्कार के
अभाव में वे उत्पन्न ही नहीं हो सकते । इसलिए उनके कारण लिङ्गादि माने
जाते हैं । तस्मात् अन्य प्रमाणों से असहकृत संस्कार से जायमान ज्ञानत्व अथवा संस्कार
से व्यंग्य जातिविशेष ही स्मृतित्व है । खण्डन—'रजतम्' इस ज्ञान को संस्कार से
जायमान क्यों माना जाय, इन्द्रिय से जायमान ही क्यों न माना जाय ।
समर्थन—उस काल में रजत के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष न होने से
'रजतम्' यह ज्ञान इन्द्रियजन्य नहीं है। क्योंकि यदि ज्ञान सन्निकर्ष के बिना
भी इन्द्रियजन्य माना जाय, तो अतिप्रसङ्ग हो जायगा । खंडन—तब तो केवल संस्कार
को भी स्मृति का कारण मानें, तो सादृश्य-दर्शनादि के अभावकाल में केवल संस्कार
से आपके मत में भी स्मृति की आपत्ति हो जायगी ।
समर्थन—चाकचिक्य आदि सदृशधर्म-दर्शनरूप सहकारी कारणों से युक्त
संस्कार को ही रजतस्मृति का कारण मानेंगे, तो अतिप्रसङ्ग नहीं होगा। खंडन—उन्हीं
सहकारी दोषों से युक्त इन्द्रिय को ही रजतभ्रम का कारण मान लेने पर हमारे मत में
भी कोई अतिप्रसङ्ग नहीं होगा ।

११२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अननुभूतेऽपि तर्हि प्रसङ्ग इति चेन्न । तत्रापि तद्धर्मतानधिगततद्धर्मवत्यधिगते
तस्य संस्कारवतः स्मृत्यापत्त्या समाधिसाम्यात् ।
लुप्ततत्सादृश्यदर्शनजसंस्कारस्याऽपि तथा सति सहचरितरजताद्यनन्तरप्रतीति-
प्रसङ्ग इति चेन्न । तवापि मते तादृशस्य रजतादिसंस्कारवतो रजतादिस्मृति-
प्रसङ्गसाम्यात् । तस्माद्यतस्ते कालव्यवधानादितः संस्कारलोपः तदनुपनिपातस्यापि
हेतुत्वोपगमेऽनतिप्रसङ्गात् ।
प्रश्न—इन्द्रियाँ दूर एवं व्यवहित पदार्थों का ग्रहण करने में संस्कार की अपेक्षा करती
हैं या नहीं ? यदि करती हों, तो संस्कारज होने से 'रजतम्' यह ज्ञान स्मृति ही होगा ।
यदि नहीं, तो संस्कार द्वारा पूर्वानुभव की अपेक्षा न होने से अननुभूत में भी 'रजतम्'
यह भ्रम क्यों न हो ? खंडन—आपके मत में भी यह दोष समान है । अर्थात् केवल
रजतविषयक संस्कार से स्मृति होती है अथवा रजत-विषयक संस्कार और सादृश्य-
विषयक संस्कार, दोनों से ? यदि दोनों संस्कारों की अपेक्षा हो, तो उभय-विषयक
स्मृति होनी चाहिए । यदि प्रथम पक्ष है, तो जहाँ सादृश्य आदि धर्मों का पूर्वानुभव
न हो और धर्मी मात्र पूर्व में ज्ञात हो, वहाँ भी रजत-विषयक-संस्कार से रजत की
स्मृति क्यों न हो ? इसपर यदि आपके पक्ष में यह समाधान हो कि 'जहाँ चाकचिक्यादि
साधारण धर्मों से युक्त रजत का पूर्वानुभव हो चुका हो और इदानीं चाकचिक्यादि रूप
से रजत के सादृश्य का प्रत्यक्ष हो, वहीं संस्कार से रजत का स्मरण होता है',
तो हमारे मत में भी वही समाधान होगा । अर्थात् हम भी कह सकते हैं कि
'रजतप्रतियोगिक सादृश्यज्ञान से युक्त चक्षुरादि' ही भ्रम के कारण हैं, अतः उक्त
स्थल में दोष नहीं है ।
समर्थनकर्ता—जहाँ रजत-संस्कार अथवा सादृश्य-संस्कार नष्ट हो गया हो, वहां
रजतभ्रम क्यों नहीं होता ? खंडनकर्ता—आपके मत में भी सादृश्य-संस्कार का उपयोग
रजत-स्मृति में तो है नहीं। फिर जहाँ वह नष्ट हो गया हो और केवल रजत-संस्कार ही
हो, वहाँ भी रजत की स्मृति क्यों न हो—यह शंका तुल्य है। यदि आप कहें कि
सादृश्यसंस्कार तो रजतस्मृति में कारण नहीं है; परन्तु संस्कार के विलोपक काल-
व्यवधान, चिन्ता, रोगादि के अभाव सहकारी अवश्य हैं। एवंञ्च सादृश्य-संस्कार के
नाशस्थल में काल-व्यवधानादि के अभावरूप सहकारी नहीं हैं, अतः स्मृति नहीं होती,'
तो हम भी कहेंगे कि 'रजत-संस्कार रजत-भ्रम का कारण तो नहीं है, परन्तु जहाँ

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ११३
तदेवं—
'तत्सदृक्प्रत्यभिज्ञानं यत्ते संस्कारबोधकम् ।
सहकारि तदेवास्तामक्षस्यातिप्रसक्तिनुत् ॥'
तत्सदृशप्रत्यभिज्ञानं तु स्मर्तव्यस्मरणपूर्वकमित्येतदपि सममेव ।
तथाऽप्यन्यत्र अर्थसन्निकर्षमन्तरेणेन्द्रियस्य ज्ञानकरणत्वं नोपलब्धचरमिति
चेन्न। विशिष्टरूपेण भ्रमविषये मया तदुपगमात् सहकारिभूतदोषशक्तेर्वा प्रत्या-
सत्तित्वेनेष्टत्वात् ।
रजत-संस्कार नष्ट हो गया हो, वहाँ रजत-भ्रम नहीं होता, क्योंकि काल-व्यवधानादि
का अभाव भी रजत-भ्रमका सहकारी है, और प्रकृत में इनका अभाव है।
तस्मात् आपके मत में जो सादृश्य-दर्शनादि संस्कार के उद्बोधक हैं, हमारे मत
में भी वे ही इन्द्रिय के सहकारी हैं; अतः कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है।
जिस सादृश्य-ज्ञान को उद्बोधक संस्कार।
मानो तुम, इन्द्रियन का वह करता सहकार ॥
समर्थन—आप रजत-भ्रम में इन्द्रिय के सादृश्य-ज्ञान को सहकारी मानते हैं,
पर वह रजतरूप प्रतियोगी के स्मरण के बिना हो नहीं सकता। अतः आवश्यक
होने से रजत-स्मृति को ही भ्रम माना जाय, रजत-विषयक अन्य अनुभव को भ्रम
मानना उचित नहीं।
खंडन—आपके मत में भी संस्कार के उद्बोधक सादृश्य-ज्ञान में प्रतियो-
गित्वरूप से अपेक्षित रजत-स्मृति तो भ्रम है नहीं, किन्तु संस्कार के उद्बोधन के
अनन्तर जायमान रजत-स्मृति ही भ्रम है। अतः प्रश्न हो सकता है कि प्रथम उत्पन्न
होने से सादृश्यज्ञान में अपेक्षित रजत-स्मृति ही भ्रम क्यों न कहलाये ?
समर्थन— फिर भी इन्द्रिय अन्य स्थल में सन्निकर्ष के बिना ज्ञान के कारण नहीं
देखे गये हैं। अर्थात् अक्षज-प्रत्यक्ष-ज्ञान में सर्वत्र इन्द्रियों का अर्थ-सन्निकर्ष से अन्वय-
व्यतिरेक देखा जाता है। फिर प्रकृत में सन्निकर्ष के बिना 'रजतम्' यह भ्रम कैसे होगा ?
खंडन—प्रमास्थल में ही इन्द्रिय का सन्निकर्ष के साथ अन्वय-व्यतिरेक होने से वहीं
सन्निकर्ष अपेक्षित होता है, पर भ्रमस्थल में सन्निकर्ष अपेक्षित नहीं है, यह हम विशेष
रूपसे कह सकते हैं। अथवा जैसे आप प्रत्यभिज्ञा में संस्कार को सन्निकर्ष मानते हैं, वैसे
ही हम भी भ्रम-स्थल में दोष को ही सन्निकर्ष मान लेंगे, तो कोई हानि नहीं।
१५

११४ सानुवादखण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
किञ्च-संस्कारस्याऽपि प्रमाणान्तरासहकृतस्य नान्यत्र ज्ञानजनकत्वं
दृष्टमिति तदपि कथं कल्प्यते ।
प्रत्यभिज्ञान एव संस्कारस्य सदृशदर्शनादिसहकारित्वं कल्पितं न त्विन्द्रियेति
चेन्न । प्रत्यभिज्ञाने संस्कारेन्द्रिययोर्द्वयोरपि कारणत्वात् सदृशदर्शनादि-
सहकृतत्वदर्शनाविशेषात् ।
अत्र सदृशदर्शनसहकारित्वे संस्कारसहकारित्वस्यापि प्रसङ्गः प्रत्यभिज्ञान-
वदिति चेन्न । तथा सति तद्वदेव तचोल्लेखापत्तेः । सदृशदर्शनादिसहकृतत्वेन च
तत्तांशप्रसञ्जने संस्कारजन्यत्वस्योपाधित्वम् ।
किञ्च-संस्कार अन्यत्र कहीं भी अन्य प्रमाणों से रहित होकर ज्ञान का जनक
नहीं देखा गया। तब यहाँ केवल संस्कार रजत-स्मृति का जनक है, यह कल्पना ही
कैसे हो सकती है ?
समर्थन-प्रत्यभिज्ञा में ही संस्कार इन्द्रिय आदि ( प्रत्यक्षादि प्रमाणों ) से रहित
हो सादृश्यदर्शन के सहकार से ज्ञान का जनक देखा गया है। खंडन-प्रत्यभिज्ञा
में संस्कार और इन्द्रिय दोनों कारण हैं। सादृश्य-दर्शन दोनों का ही सहकारी
है। भेद यही है कि तत्तांश के ज्ञान में संस्कार और इदन्ता के ज्ञान में इन्द्रिय कारण
हैं। संस्कार तो अपने उद्बोधन और इन्द्रिय अभेदबोध में सादृश्य-दर्शन के सहकार
की अपेक्षा करता है।
समर्थन-यदि इन्द्रिय भी 'रजतम्' इस भ्रमज्ञान में सादृश्य-दर्शनरूप सहकारी की
अपेक्षा करता है, तो वह उससे उद्बुद्ध संस्कार की भी अवश्य अपेक्षा करेगा, जैसे कि
प्रत्यभिज्ञा में इन्द्रियाँ संस्कार की अपेक्षा करती हैं। खण्डन-यदि प्रत्यभिज्ञा के तुल्य
'रजतम्' इस भ्रम में भी संस्कार की अपेक्षा मानें, तो प्रत्यभिज्ञा के तुल्य 'रजतम्'
इस स्मृति में भी तत्ता का उल्लेख हो जायगा ।
शङ्का-सदृश-दर्शनरूप सहकारी के बल से 'रजतम्' इस भ्रम में तत्ता का
उल्लेख क्यों नहीं ? खंडन-सदृश-दर्शननिष्ठ तत्ता के उल्लेख में संस्कार निमित्त
कारण है। यहाँ संस्कार नहीं है, अतः तत्ता का उल्लेख नहीं होता ।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ११५
न च सदृशदर्शनसहकारितैव तत्ताप्रयोजिकाऽत्र त्यज्यतां न संस्कार इति
युक्तम् । सदृशदर्शनं परित्यज्य संस्कारे सत्यपि अतथाबोधात् ।
तथापि सदर्थे प्राप्यकारित्वमिन्द्रियस्य दृष्टं न हातुं शक्यमिति चेन्न । उक्तमत्र
यथेन्द्रियस्य प्राप्तिसहकृतस्य ज्ञापकत्वं दृष्टं तथैव संस्कारस्यापि प्रमाणान्तर-
सहकृतस्य ज्ञापकत्वमुपलब्धमिति तदपि हातुं न युक्तमिति, संस्कारस्यापि
चेन्द्रियप्रत्यासत्तित्वस्वीकारेण तद्विरहासिद्धेः ।
तत्तांशमोषकल्पनं च स्वतन्त्रसंस्कारजत्वपक्ष एव यावदधिकम् ।
कुतश्चायं तत्तांशमोष इति विचारमधिकरोति, पूर्वं वर्तमानादिकालविशेष-
शङ्का—सदृश-दर्शन ही तत्ता-भाग के भान का प्रयोजक है, अतः उसीके
सहकार को 'रजतम्' इस भान में छोड़ो, संस्कार के सहकार को क्यों छोड़ते हो ?
खंडन—संस्कार होने पर भी सदृश-दर्शन के अभाव में 'रजतम्' यह भ्रम
नहीं होता । अतः सदृश-दर्शन को ही चक्षुरादि का सहकारी मानते हैं, संस्कार को
नहीं । अन्यथा तत्ता का भान हो जायगा ।
समर्थन—तथापि सत्-अर्थ की प्रमा में सर्वत्र इन्द्रियाँ सम्बद्ध को ही ग्रहण
करती देखी गयी हैं, अतः उसको छोड़ना उचित नहीं है । खंडन—इस विषय में
हम कह चुके हैं कि जैसे इन्द्रिय सन्निकर्ष से विशिष्ट होकर ही ज्ञान के जनक देखे
गये हैं, वैसे ही संस्कार भी अन्य प्रमाणों से युक्त होकर ही ज्ञान का जनक देखा गया
है । अतः अन्य प्रमाण का सहकार भी संस्कार में त्यागने योग्य नहीं है ।
किञ्च—संस्कार ही प्रत्यासत्ति है, अतः रजत असन्निकृष्ट नहीं है । अर्थात् 'रजतम्'
यह ज्ञान मानस-भ्रम है और मन के साथ रजत का संस्कार ही सम्बन्ध है ।
सथ ही, जो 'रजतम्' इस ज्ञान को इन्द्रियजन्य मानते हैं, उनके मत में
तत्ता-अंश के भान का प्रसङ्ग ही नहीं है । किन्तु जो स्मृति मानते हैं, उनके मत में
तत्ता-अंश के त्याग की कल्पना में अधिक गौरव है ।
यह भी विचारणीय है कि तत्ता-अंश का त्याग कैसे होगा ? पूर्व-काल में वर्तमानता-
विशिष्ट रजतादि ही अनुभव का विषय हुआ है, अतः उससे जन्य संस्कार भी वर्तमानता-
विशिष्ट रजतादि को ही उपस्थित करेगा । अर्थात् अनुभव में विशेषणरूप से जो
वर्तमानकाल भासता है, वही स्मरण में तत्ता-रूप से भासता है । अतः जो अनुभव में

११६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
विशिष्टस्य रजतादेरेकस्मिन्ननुभवे प्रकाशिततया तज्जन्येन संस्कारेणापि तथैवोप-
नेतुमुचितत्वात्, प्रत्यभिज्ञायां तथैव फलदर्शनात् ।
दोषवशात् तत्तांशमोष इति चेन्न । विषयसम्बन्धस्य स्वभावत्वेन संस्कारे
तदलोपात् ।
दोषात् स्मृतौ तथेति चेत्, कः पुनरसौ दोषः ? यस्माद् भ्रान्त्युत्पत्तिः परेषाामिति
चेत्तर्हि तद्रजताविशिष्टमिदं रजतमित्यत्र, सैव रजतव्यक्तिरियमित्यत्र वा,
पुनस्तदेव रजतमुपस्थितमितीह वा, सामान्यत एव रजतस्य तदाऽपि परामृष्टस्य
भ्रान्तौ तत्तांशमोषः स्यात्, दोषस्य विद्यमानत्वात् । अन्यथा इदं रजतमित्यंशेऽपि
तस्मिन् ज्ञाने तत्तांशमोषो न स्यादित्यास्तामियं प्रसक्तानुप्रसक्तिः ।
विशेषण से विशिष्ट भासता हो, वह स्मरण में विशेषण-रहित कैसे भास सकता है ?
प्रत्यभिज्ञा के स्मरण-अंश में अनुभव के अनुकूल विशिष्ट का भान ही देखा भी गया है ।
समर्थन—दोषबल से 'रजतम्' इस स्मरण में तत्तांश का त्याग होगा ?
खंडन—तत्तारूप विषय के साथ संस्कार का स्वभाव ही सम्बन्ध है और दोष से
संस्कार का लोप हो नहीं सकता । अन्यथा 'रजतम्' यह स्मरण ही कैसे होगा ? अतः
दोष अकिञ्चित्कर है ।
समर्थन—दोष संस्कार का नाश नहीं करता, किन्तु तत्ता-अंश में स्मृतिरूप
कार्य का प्रतिबन्धक होता है । खंडन—दोष क्या वस्तु है । अर्थात् पूर्वोक्त युक्तियों से
खण्डित होने से दोष कोई वस्तु ही नहीं है ।
समर्थन—पर ( अन्यथाख्यातिवादी ) को जिस पित्त आदि के बल से भ्रम होता है,
वे पित्तादि ही दोष हैं। खंडन—यदि दोष से तत्तांश का त्याग होता है, तो जिस स्थल
में शुक्ति में उस रजत से अविशिष्ट ( सदृश ) 'यह रजत है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है,
उस भ्रम में तथा 'यह वही रजत व्यक्ति है' इस प्रत्यभिज्ञा-भ्रम में तथा 'वही रजत
फिर उपस्थित हुआ' इस प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम में भी—जहाँ सामान्यतः तद्-शब्द से रजत
का परामर्श है, वहाँ तत्तांश का त्याग होना चाहिए, क्योंकि दोष वहाँ भी है । अन्यथा
यदि यहाँ दोष न मानें, तो इसी प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम के 'इदं रजतम्' इस अंश
में तत्तांश का त्याग कैसे होगा—प्रमा-लक्षण के खण्डन में प्रसक्त इस प्रत्यभिज्ञा-
खण्डन में अनुप्रसक्त तत्तांश त्याग का खण्डन अनावश्यक है ।

परिच्छेद ] अनुभूति-जाति का खण्डन ११७
न च प्रत्यभिज्ञा नाम स्मरणानुभवाभ्यामन्य एव प्रकार इति वाच्यम् ;
अननुभवत्वेन अप्रमात्वापातात् । न चैवमस्त्वित्यपि वाच्यम् ; अक्षणिकत्ववादिना
स्थिरसिद्धौ प्रमाणत्वेनोपन्यस्तत्वात् । ईदृशप्रसिद्धलक्ष्यत्यागेन च लक्षणोपपादने-
ऽनियमः प्रसज्येतेति ।
तस्मात् जातिवाचिनोऽनुभवपदस्य स्मृतितो व्यवच्छेदार्थमुपादानमिति सर्वथा-
नुपपन्नमिति ।
• अथ स्मृत्यन्यत्वखण्डनम्
नापि स्मृत्यन्यत्वमनुभवार्थः, नापि स्मृतिलक्षणरहितत्वम्; उक्तक्रमेण
स्मृत्यनुभूतिसङ्करस्य दर्शितत्वेन व्यवच्छेदकत्वानुपपत्तेः ।
इतोऽपि न स्मृत्यन्यत्वमनुभवार्थः । तथा हि—स्मृत्यन्यत्वं यत्किञ्चित्स्मरणा-
न्यत्वं वा, सर्वस्मृतिव्यक्त्यन्यता वा, स्मृतित्वरहितत्वं वा अभिप्रेतम् ?
समर्थन—प्रत्यभिज्ञा स्मृति तथा अनुभव से विलक्षण प्रकार है। अतः वह प्रमा-
लक्षण में अनुभूति पद का व्यवच्छेद्य हो सकती । खण्डन---प्रत्यभिज्ञा को अनुभव
न मानें, तो वह अप्रमा हो जायगी ।
शंका—प्रत्यभिज्ञा, अप्रमा ही रहे, तो हानि क्या है ? खण्डन—यदि प्रत्यभिज्ञा को
प्रमाण न मानें, तो अक्षणिकवादी नैयायिकों ने स्थिर-सिद्धि में 'तदेवेदम्'
इस प्रत्यभिज्ञा को जो प्रमाण रूप से उपस्थित किया है, वह व्याहत हो जायगा ।
किञ्चित् प्रत्यभिज्ञा प्रमा-लक्षण का प्रसिद्ध लक्ष्य है, अतः आप द्वारा कल्पित 'तत्त्वानुभूतिः
प्रमा' इस लक्षण की अव्याप्ति के भय से यह कहना कि 'प्रत्यभिज्ञा प्रमा का लक्ष्य
नहीं है', अनुचित है; क्योंकि ऐसा करने से व्यवस्था ही न हो सकेगी ।
जब युक्ति से स्मृतिमात्र अनुभव सिद्ध हो चुका है, तब यह कहना कि
'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में स्मृति के व्यवच्छेदार्थ जातिवाची अनुभूति पद
का निवेश है, सर्वथा अनुपपन्न है ।
स्मृति-भिन्नत्वका खण्डन
स्मृति से अन्य ज्ञान अथवा स्मृति के लक्षण (संस्कारजत्व) से रहित ज्ञान भी
अनुभव-पद का अर्थ नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकार से स्मृति और अनुभव का साङ्कर्य होने
के कारण ज्ञानमात्र अनुभव रूप होने से वह अनुभव पद की व्यवच्छेद्य नहीं हो सकती ।
साथ ही, वक्ष्यमाण दोष अर्थात् स्मृत्यन्यत्व का निर्वचन न कर सकने के कारण भी
स्मृत्यन्यत्व अनुभव पद का अर्थ नहीं हो सकता । देखिये—'स्मृति से अन्य' इस वाक्य

प्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो
व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन
तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् ।
नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व-
-मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा
हि— न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती,
लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावाग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः ; सर्वत्र
तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति-
व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य ।
न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः
स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्यक्षतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय-
का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा
स्मृतित्व-रहितत्व ?
यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य
होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य
द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य-
अन्यत्व न हो ।
सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं,
क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों
के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो
हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण
अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा
में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान
आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान
से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं ।
ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान
के न होने से लक्षण ही असिद्ध है ।
समर्थन-- स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी
कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११८
प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो-
र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्यक्षतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या
विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि
जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति ।
नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व-
प्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ?
न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव।
तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा-
पातः । तदव्यवच्छेदाद्विशेषणवैयर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् ।
ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता
है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान
सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह
प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय
के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा ।
समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता हैं, ऐसा ही क्यों न मान
लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप
कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान
सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है ।
यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष
भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव
है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो
अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ?
इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है;
क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है और वह स्मृति में भी है।
फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद
न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा। यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि
में अतिव्याप्ति हो जायगी।

११८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

प्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो
व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन
तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् ।
नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व-
मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा
हि—न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मदादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती,
लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावार्ग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः; सर्वत्र
तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति-
व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य ।
न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः
स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्ययतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय-
का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा
स्मृतित्व-रहितत्व ?
यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य
होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य
द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य
-अन्यत्व न हो ।
सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं,
क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों
के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो
हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण
अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा
में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान
आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान
से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं ।
ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान
के न होने से लक्षण ही असिद्ध है ।
सम्भवेन— स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी
कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११६
प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो-
र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्ययतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या
विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि
जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति ।
नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व-
प्रतियोगिकंमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ?
न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव।
तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा-
पातः । तद्व्यवच्छेदाद्विशेषणवैय्यर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् ।
ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता
है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान
सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह
प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय
के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा ।
समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता है, ऐसा ही क्यों न मान
लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप
कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान
सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है ।
यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष
भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव
है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो
अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ?
इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है;
क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है, और वह स्मृति में भी है ।
फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद
न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा । यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि
में अतिव्याप्ति हो जायगी ।

१२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य
स्मृतित्वस्य संसर्गाभावस्तत्र विवक्षित इति चेन्न । तथा हि—स्मृतित्वस्य
संसर्गाभाव इति किमुच्यते, किं स्मृतित्वविशिष्टस्य संसर्गस्याभावः, उत संसर्ग-
विशिष्टस्य स्मृतित्वस्य, अथान्यदेव वा किञ्चिदनया वाचोयुक्त्या विवक्षितम् ?
आद्ये स्मृतित्वसंसर्गान्योन्‍याभावः स्मृतावस्तीति स एव प्रसङ्गः । न हि स्मृतित्व-
संसर्गः स्मृतिः ।
अतएव न द्वितीयोऽपि, न हि संसर्गविशिष्टं यत्स्मृतित्वं तदेव
स्मृतिव्यक्तिः । ततश्च संसर्गविशिष्टस्मृतित्वेन सह स्मृतिव्यक्तेरन्योन्‍याभाव-
मादाय उक्तदोषानिवृत्तिः । एवं तत्र तत्रापि संसर्गविशेषणप्रक्षेपे दोषानिवृत्तिरेव,
अनवस्थायां वा पर्यवसानं विशेषणप्रक्षेपपरम्परायाः ।
न च वाच्यं स्मृतित्वसंसर्गस्य न संसर्गान्तरेण सम्बन्धित्वं किन्तु स्वभावत
एव, तत् कुतः परम्परागवेषणं कार्यमिति । स्मृतित्वसंसर्गस्यान्योन्‍याभावमादाय
समर्थन—यहाँ स्मृतित्वाभाव से स्मृतित्व के संसर्गाभाव का ग्रहण है । खंडन—
यह तुम नहीं कह सकते; क्योंकि स्मृतित्व का संसर्गाभाव क्या स्मृतित्व-
विशिष्टसंसर्गाभाव है, संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वाभाव है या इस वाक्य-रचना से और
ही कुछ ? यदि स्मृतित्व का संसर्गाभाव अभिप्रेत हो, तो स्मृतित्व-संसर्ग का
अन्योन्याभाव भी स्मृति में है ही । अतः स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी,
क्योंकि स्मृतित्वसंसर्ग स्मृति नहीं है ।
इसीलिए द्वितीयपक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वव्यक्ति
भी स्मृति नहीं है । अतः संसर्गविशिष्ट स्मृतित्व के साथ स्मृति-व्यक्ति के अन्योन्याभाव
का ग्रहणकर स्मृति-व्यक्ति में पुनः अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव ही स्मृतित्वरहितत्व है । स्मृतित्व-संसर्ग
का संसर्गाभाव स्मृतिव्यक्ति में नहीं है, क्योंकि स्मृति में स्मृतित्व-संसर्ग ही है ।
अतः स्मृति में अनुभूतिलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—स्मृतित्व-संसर्ग का
संसर्गाभाव इस शब्द से भी यदि संसर्ग का अभाव ही अभिप्रेत है, तो फिर भी
स्मृतित्व-संसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति ही है । इस तरह
अपर-अपर संसर्ग का निवेश करें, तो अनवस्था या अन्तिम संसर्ग का अन्योन्याभाव
लेकर अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—स्मृतित्व का संसर्ग ( समवाय ) अन्य संसर्ग से नहीं, किन्तु स्वभाव-
स्वरूप सम्बन्ध से ही संबद्ध है । अतः संसर्ग-परम्परा का गवेषण न होने से अनवस्था

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२१
कृतस्य प्रसङ्गस्य परिहर्तुं तदानीं सुतरामशक्यत्वात् संसर्गान्तरविशेषकवचनस्य
अधिकार्थापर्यवसायित्वात् ।
किञ्च—तदुभयस्वरूपातिरेकं तत्संसर्गस्यानन्यमानेन स्मृतित्वसंसर्गः स्मृतित्व-
धर्मिस्वरूपं चेत्येतयोः संसर्गात्मकत्वे व्यवस्थाप्यमानेऽनुभूतौ कथं तादृशस्य संसर्गस्य
निषेधः । किमनुभूतेः स्वरूपं नास्ति, उत स्मृतित्वसंसर्गस्य, ततः कस्य निषेधः ?
अर्थान्तरभूतस्य च संसर्गस्य निषेधे स्मृतावपि प्रसङ्गस्तदवस्थः, स्मृतौ
तस्यार्थान्तरभूतस्य भवताऽनभ्युपगमात्, स्वरूपमेव तयोः सम्बन्ध इति तत्र
भवतोऽभ्युपगमः ।
अथोच्यते—अनुभूतिस्मृतित्वसंसर्गयोः स्वरूपसम्भवेऽपि न परस्परसम्बद्ध-
बुद्धिजनकत्वं तयोः, तादृक्त्वञ्च यत्र तयोस्तत्र सम्बन्धात्मकत्वं स्वरूपयोरुच्यत
नहीं है । खंडन--यदि स्मृतित्व-संसर्ग का स्वभाव ( स्वरूप ) ही सम्बन्ध है, तो स्मृतित्व-
संसर्ग के संसर्गाभाव शब्द का अर्थ संसर्ग का स्वरूपाभाव ही हुआ । अर्थात् संसर्गाभाव
से अधिक नहीं हुआ । अतः संसर्ग का अन्योन्याभाव लेकर जो अतिव्याप्ति दी
गयी, वह वैसी ही बनी हुई है ।
किंच—स्मृतित्व-संसर्ग (समवाय) तथा स्मृति के संसर्ग को उभयस्वरूप से
अतिरिक्त न माननेवाले आप स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों को ही संसर्गात्मक
मानेंगे, तो फिर अनुभूति में उस संसर्ग का निषेध कैसे होगा ? क्या अनुभूति का
स्वरूप नहीं है या स्मृतित्व-संसर्ग का स्वरूप नहीं है ? जब दोनों के स्वरूप हैं, तो
किसका निषेध होगा ?
समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूपसम्बन्ध का निषेध अनुभूति में नहीं है; किन्तु
स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का निषेध अनुभूति में है । खंडन—यदि स्वरूप से अन्य
सम्बन्ध का निषेध है, तो स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप से अन्य संसर्ग स्मृति में नहीं
है, क्योंकि आप स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप-रूप सम्बन्ध को ही स्मृति में मानते हैं,
स्वरूप से अन्य सम्बन्ध को नहीं मानते । अतः स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का अभाव
स्मृति में भी हो सकता है। फलतः अनुभूति-लक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन — शुद्ध स्वरूपमात्र सम्बन्ध नहीं है, किन्तु परस्परसंसृष्टत्व-बुद्धिजनकत्वरूप-
स्वरूप ही संसर्ग है। वह स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों के स्वरूपों में है, अतः इन
दोनों का स्वरूप संसर्ग है। अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग इन दोनों के स्वरूपों में
वह नहीं है ।