खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तदिदमेताभिरात्ममतसिद्धसद्युक्तिकलक्षणोपपन्नाभिः युक्तिभिरुपनीयमानमद्वैत-
मविद्याविलासलालसोऽपि श्रद्दधातु तावद्भवान् । तदनु च अनयैवोपनिषदर्थ-
श्रद्धया अध्यात्मं जिज्ञासमानः परमार्थतत्त्वं क्रमात् वृत्तिव्यावृत्तचेताः स्वप्रकाश-
सात्त्विकं माक्षिकरसातिशायि स्वात्मनैव साक्षात्करिष्यति ।
यथा च परिहृतचापलमात्मतत्त्वामृतसरसि निमज्य रञ्जयति निरायासमेव
मानसम्, तथाऽहमकथयं नैषधचरितस्य परमपुरुषस्तुतौ सर्ग इत्येषा दिक् ।
अथ प्रयोजनप्रतिपादनम्
'अभीष्टसिद्धावपि खण्डनानामखण्डिराज्ञामिव नैवमाज्ञा ।
तत्तानि कस्मान्न यथाऽभिलाषं सैद्धान्तिकेऽप्यध्वनि योजयध्वम् ॥'
अद्वयरूप अर्थ शुद्धविचार से स्वप्रकाश आनन्दरूप होकर अपरोक्ष रूप से अपने आप
प्रादुर्भूत होता है ।
जो आपात से होत है; श्रुति से अद्वय-बोध ।
वह विचार से होत है, सच्चित आत्म बे-रोध ॥
युक्ति परार्थानुमानरूप है । अतः स्वबुद्धिसिद्ध युक्तियों के लक्षणों से युक्त
मेरी इन पूर्वोक्त युक्तियों से ज्ञानविषय इस अद्वैत में अविद्याविलास ( भेदवाद )
में लालसावाले भी आप प्रथम श्रद्धा करें । तत्पश्चात् इसी उपनिषदर्थ ( ब्रह्म )
की श्रद्धा तथा आत्मविषयक जिज्ञासा से युक्त एवं धीरे-धीरे विषयों से व्यावृत्तचित्त
आप मधु से भी मिष्ट और स्वप्रकाश अद्वैतरूप परमार्थ का स्वयं साक्षात्कार करेंगे ।
जिन साधनों से चपलता छोड़कर आपका चित्त बिना परिश्रम के आत्मतत्त्वरूप
अमृत-सरोवर में निमग्न हो परमानन्द प्राप्त करेगा, भक्ति, अभ्यास, वैराग्य आदि उन
साधनों को 'नैषधचरित' के परमपुरुष सर्ग में कहा गया है । यह तो अद्वैतसिद्धि का
संकेतमात्र है ।
प्रयोजन-प्रतिपादन
प्रश्न—इस प्रकार द्वैत-निवृत्ति द्वारा अद्वैत की सिद्धिमात्र में खण्डन-युक्तियों
की उपकारकता है । इसलिए यह मुमुक्षुमात्र के लिए ग्राह्य है, केवल विजिगीषुओं के
के लिए नहीं—यदि ऐसा ही मान लें, तो 'लोकेषु दिग्विजय-कौतुकमातनुध्वम्' इस
प्रतिज्ञा के साथ विरोध हो जायगा ।