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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

परिच्छेद ] भेद-खण्डन ८१
सेयमद्वैतबुद्धिर्न तर्कशतमवतार्य प्राज्ञैरपनेया । यदाह श्रुतिः—‘नैषा तर्केण
मतिरापनेये’ति । तस्मात्—
'धीधनाः ! बाधनायास्यास्तदा प्रज्ञां प्रयच्छथ ।
क्षेप्तुं चिन्तामणिं पाणिलब्धमब्धौ यदिच्छथ ॥'
सेयमद्वैतदृष्टिर्दृष्टार्थाऽपि । यदाहुः—‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो
भयात्’ । तस्मात् —
'ईश्वरानुग्रहादेषा पुंसामद्वैतवासना ।
महाभयकृतत्राणा द्वित्राणां यदि जायते ॥'
तस्मात्—
‘आपाततो यदिदमद्वयवादिनीनामद्वैतमाकलितमर्थतया श्रुतीनाम् ।
तत् स्वप्रकाशपरमार्थचिदेव भूत्वा निष्पीडितादहह ! निर्वहते विचारात् ॥’
रजतत्व की निवृत्ति होने पर रजतत्वधर्म में आरोपकूप अपराध होने से, परमार्थ शुक्ति
भी निवृत्त नहीं होती ।
तस्मात् प्राज्ञवर्ग ! आप इस अद्वैत-बुद्धि का अनेक कुतर्कों का अवलम्बन कर
खण्डन न करें । क्योंकि कठ श्रुति ( २।३ ) में लिखा है कि श्रुति से जायमान
अद्वैत-बुद्धि तर्क से खण्डनीय नहीं है । इसलिए बुद्धिमानो ! इस अद्वैत-बुद्धि का
कुतर्क से बाधन करने की इच्छा तब कीजिये, जब कि हाथ लगे चिन्तामणि को समुद्रमें
फेंक देने की इच्छा रखते हों ।
धीधन ! तब अद्वैत के, बोध चहहु तूं बाध ।
जब चिन्तामणि रत्न को, गेरन वारिध साध ॥
इस अद्वैत-बुद्धि का मोक्षरूप अदृष्ट फल तो है ही, परन्तु जीवन्मुक्ति में
अनुभवनीय आनन्द, शोक-निवृत्ति, अभय, संतोषादि दृष्ट प्रयोजन भी हैं । भगवद्गीता
में भी ( २ । ४ ) कहा है कि स्वल्प भी ( आपाततः उत्पन्न ) अद्वैत-बोध महान्
भय, शोक आदि दुःखों से रक्षा करता है । यह अद्वैत-बुद्धि दुष्प्राप्य, बहु-
विघ्नों से युक्त तथा अतिसूक्ष्म है । अतः परमेश्वर की कृपा से महाभयों से त्राण
करनेवाली यह अद्वैत-वासना दो या तीन मनुष्यों के ही हृदय में प्रादुर्भूत होती है ।
ईश-कृपा से होत है, तीन दोय हिय मांहि ।
अद्वय की शुभ-वासना, जिसमें भय कुछ नाहिं ॥
हर्ष है कि अतिसूक्ष्म होने से अद्वैत-बोधक श्रुतियों द्वारा परोक्षरूप से ज्ञात
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