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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 610 में से

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पृष्ठ 470

आश्रयासिद्ध्यादिभेदप्रसङ्गात् । सोऽपि स्वीकार्य इति चेन्न । असिद्ध्यादिविधा-
परिगणनस्य व्यवहारतोऽन्यथाभावप्रसङ्गात् । क्वचिदाश्रयस्य समवायित्वात्
क्वचिच्चाभावं समवायञ्च हेतुं प्रति तदसम्भवात् । एकस्य च तेषामुपसङ्ग्राहकस्य
वक्तुमशक्यत्वात् ।
बहव एवाऽऽश्रयशब्दार्थाः, आश्रयासिद्ध्यादयोऽपि पृथक् पृथगेव बहवः ।
असिद्धभेदपरिगणनग्रन्थोऽप्यन्यथाकारं बोद्धव्यो बाधदर्शनादिति चेन्न । तथापि
'इह कुण्डे बदरम्'त्यत्र क आधारार्थ इति वक्तव्यम् । न तावत्पतनप्रतिबन्धकत्वम् ,
सहैव कुण्डेन पतति बदरे तदसम्भवात् ।
नापि संयोगित्वम् ; वैपरीत्यस्यापि प्रसङ्गात् ।
शब्द की तरह उसे अनेकार्थ१ ही मानें तो क्या हानि है ? खण्डन—आश्रयासिद्धि,
व्यभिचार आदि के परिगणित भेदों का व्यवहारतः अन्यथाभाव हो जायगा । अर्थात्
उनके लक्षणों में आधार या अधिकरण शब्द प्रविष्ट होने से उसे नानार्थ मानने
पर आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि भी अनेक हो जायेंगे । यदि आश्रयासिद्धि
आदि के अनेक भेद मानलें, तो न्यायशास्त्र में असिद्ध्यादि के तीन प्रकार से
परिगणन का जो व्यवहार है, उससे विरोध हो जायगा । कारण 'इदं द्रव्यं कर्मणः'
यहाँ आश्रय समवायीरूप है । 'शब्दो नित्यः अकृतकत्वात्' तथा 'पृथिवी इतरभिन्ना
गुणसमवायात्' यहाँ आश्रय के ही अनेकरूप होने से एकरूप आश्रय न रहा—सब
आधारों का उपसंग्राहक एकरूप नहीं रहा ।
समर्थन—'आश्रय शब्द के बहुत-से अर्थ हैं । आश्रयासिद्धि भी पृथक्-पृथक्
अनेक ही हैं। असिद्धिभेदों की गणनापरक ग्रन्थ का भी रूपान्तर से व्याख्यान कर
कर लेना चाहिए । अर्थात् आधार की निरुक्ति में उक्त बाध होने से लक्षणा द्वारा
'स्वरूपासिद्धि और व्याप्यत्वासिद्धि से अन्य असिद्धि आश्रयासिद्धि है' यही कहना
चाहिए । खण्डन—तब भी 'इह कुण्डे बदरम्' यहाँ आधार शब्द का क्या अर्थ है,
यह कहना होगा । किञ्च—जहाँ कुण्ड के साथ ही बदर गिरते हैं, वहाँ कुण्ड बदर
का अधिकरण न कहलायेगा ।
संयोगित्व भी आधार नहीं है, कारण कुण्ड का संयोग बदर में भी है । अतः बदर
भी कुण्ड का आधार हो जायगा ।
१. अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति या ज्ञप्ति ( ज्ञान ) के लिए जिसके द्वारा जो अपेक्षित होता
है, वह आधार है, इस प्रकार नानार्थक ही 'आधार' शब्द मानेंगे ।