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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 610 में से

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पृष्ठ 409

परिच्छेद ] प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खण्डन ३८६
मा प्रमायि, अप्रमायैव तद्व्यवहार इति चेन्न । कचिदप्यप्रमितमाभास-
मात्रोपस्थितं क नाम नोपस्थापयितुं शक्यमित्युक्तैवातिव्याप्तिगर्वतते ।
अनेकत्र नियतयोरेकत्र प्रसञ्जनमिति चेन्न । प्रसञ्जकस्य तद्द्वयस्यैकत्र
स्थितिनियतताप्रमितावविरोधस्यानेवंभवे चाऽनापादकत्वस्याऽऽपत्तेः ।
एकैकव्याप्याभ्यां पृथक् पृथक् तद्द्वयापादनमिति चेन्न । एकैकमव्याघातात् ।
अर्थाद् द्वयं स्यादिति चेन्न । अर्थापत्त्यर्थत्वेनाव्याघातात् ।
अर्थादापादनम् , न साधनमिति चेन्न । मिथो विरोधित्वेन तर्काभा-
सत्वापत्तेः, इष्टापादनाच्च ।
समर्थन—प्रमित न हो, तो क्या हानि है, पर का जो अभ्युपगम है, उसीसे प्रसञ्जन
होगा, जैसा कि भ्रम के 'नेदं रजतम्' इस बाध में शुक्ति-रजततादात्म्य प्रतियोगीरूप
से भासता है । खण्डन—अप्रमित और केवल भ्रम से उपस्थित व्याघात का प्रसञ्जन
कहाँ नहीं होता, अर्थात् सर्वत्र हो सकता है । अतः 'घटो नास्ति' इस वाक्यस्थल
में भी उसका प्रसञ्जन होने से पूर्वोक्त अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है ।
समर्थन—वन्ध्या में वन्ध्यात्व और माता में मातृत्व प्रमित है, उन दोनों के
एक धर्मी में [ 'वन्ध्या-माता' इस वाक्य में ] प्रसञ्जक के बल से प्रसञ्जन करेंगे ।
खण्डन—दो विरुद्ध धर्मों का एक में प्रसञ्जन बिना किसी प्रसञ्जक के हो नहीं
सकता । उस प्रसञ्जक में यदि प्रसञ्ज्यद्वय की व्याप्ति प्रमित है, तो उन दोनों के
एकत्र प्रमित होने से वस्तुतः विरोध ही नहीं है, केवल विरोध की परिभाषामात्र है ।
यदि व्याप्ति प्रमित नहीं है, तो वह आपादक ही नहीं हो सकता ।
समर्थन—एक-एक के व्याप्य दो प्रसञ्जकों से मिलित दोनों का आपादन नहीं
होता, किन्तु पृथक्-पृथक् दोनों का आपादन होता है । खण्डन—ऐसा होने पर दोनों
एकत्र साधक तो हैं नहीं, अतः व्याघात ही नहीं होगा ।
समर्थन—दोनों के व्याप्यों से एक-एक का अवस्थान होने पर अनुपपत्ति से ही
दोनों की एकत्र अवस्थिति होने से व्याघात है । खण्डन—प्रत्येक दोनों के एकत्र
आपादन की अनुपपत्ति से आप उन दोनों की अवस्थिति का एकत्र साधन करते हैं या
आरोपमात्र ? प्रथम पक्ष में उक्त अनुपपत्ति अर्थापत्तिरूप प्रमाण होने से उससे प्रमित
विरुद्धद्वय का एकत्र अवस्थान रूप-रस के तुल्य व्यहत ही नहीं है ।
यदि कहें कि अनुपपत्ति से प्रसञ्जनमात्र करते हैं और प्रसञ्जन में प्रमा की
अपेक्षा नहीं, कारण प्रसञ्जन ज्ञानमात्र से ही होता है, अतः पूर्वोक्त दोष नहीं है,