खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय
स्तवायमन्य एव सामयिकार्थः कश्चित्, प्रमाणेन तथाभूतस्य ग्रहणादेव
विरुद्धत्वाभ्युपगमशान्तेः । अथ प्रामाणिकं तन्नाभ्युपैषि, तदाऽप्रामाणिकं मिथो
व्याघातकत्वं क्व नाम नास्तीत्यतिव्याप्तिः ।
अथ मन्यसे—यथा परेणाभिधीयेते अर्थौ तथा मिथो व्याघातकाविति
ब्रूमः, तत्र च प्रमाणं प्रसरत्येवेति । न; कथमपि तत्र प्रमाणप्रसृतौ विरोधाभावात्परि-
भाषामात्रत्वापत्तेः ।
यथा परेणोक्तोऽर्थस्तथा मिथो व्याघातक इत्यपि क्वचिन्मिथोव्याघातक-
मर्थमप्रमाय न वक्तुं शक्यम् । प्रसज्यते मिथो व्याघातः, न प्रसाध्यत इति
चेन्न । क्वचिदप्यप्रमितस्य प्रसञ्जयितुमपि भवताऽशक्यत्वात् ।
देश में रहने से विरुद्ध ही नहीं हैं । उन्हें विरुद्ध कहना तुम्हारा सङ्केतमात्र है ।
यदि उन दोनों का एकदेश में अस्तित्व प्रामाणिक नहीं है, तो 'अमुक वाक्य
व्याहत है' इस कथन का यह अर्थ हुआ कि यहाँ अप्रामाणिक व्याघात दोष है ।
फिर इससे हानि क्या हुई, कारण प्रामाणिक दोष ही कार्य का प्रतिबन्धक होता है ।
ऐसा अप्रामाणिक व्याघात कहां नहीं है ? वह 'घटो नास्ति' इस वाक्य में भी है, अतः
पूर्वोक्त अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है ।
समर्थन—वादी ने जिस प्रकार अर्थात् सामानाधिकरण्यरूप से बन्ध्यात्व और मातृत्व
रूप दो अर्थों का प्रयोग किया है, उस (सामानाधिकरण्य) रूप से वह व्याघातक
है—यह हम कहते हैं । वहाँ वाद्युक्त 'बन्ध्या-माता' इस वाक्य के बाधितार्थक होने से
अप्रमाण होने पर भी उक्त वाक्यप्रतिपाद्यत्वरूप से बन्ध्यात्व-मातृत्व-सामानाधिकरण्य प्रमाण-
विषय हैं ही, अतः उक्त दोष नहीं है । खंडन—किसी प्रकार अर्थात् वाक्यप्रतिपाद्य-
त्वरूप से भी यदि वन्ध्यात्व और मातृत्व का सामानाधिकरण्य प्रमाण का विषय है, तो
रूप-रस के तुल्य वे दोनों विरुद्ध ही नहीं हैं, अतः विरोध का कथन परिभाषामात्र है ।
किञ्च—जबतक परस्पर व्याघातकत्व अन्यत्र प्रमित नहीं होता, तबतक 'जिस
प्रकार पर ने कहा, उस प्रकार मिथो व्याघात है' यह साधन नहीं किया जा सकता ।
समर्थन—पर द्वारा उक्त वन्ध्या में माता इस प्रसञ्जक (आरोपक) वाक्य से
परस्पर व्याघात का प्रसञ्जन (आरोप) मात्र होता है, साधन नहीं । खण्डन—जो कहीं
प्रमित नहीं है, उसका प्रसञ्जन भी नहीं हो सकता । तर्कस्थल में भी हृद में प्रमित ही
धूमाभाव का पर्वत में प्रसञ्जन होता है ।