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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 152 में से

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पृष्ठ 21

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३

पद-भाष्य
"नैषा तर्केण मतिरापनेया" | "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने
(क० उ० १।२।९) | योग्य नहीं है" इस श्रुतिसे भी यही
गुरुपसत्तिः इतिश्रुतेश्च। "आचार्य- | बात सिद्ध होती है। अतः "आचार्य-
वान्पुरुषो वेद" (छा० उ० ६। | वान् पुरुष [ब्रह्मको] जानता है"
१४।२) "आचार्याद्धैव विद्या | "आचार्यसे प्राप्त हुई विद्या ही
विदिता साधिष्ठं प्रापदिति" | उत्कृष्ट‌ताको प्राप्त होती है" "उसे
साष्टाङ्ग प्रणामके द्वारा जानो"
(छा०उ०४।९।३) "तद्विद्धि | इत्यादि श्रुति-स्मृतिके नियमानुसार
प्रणिपातेन" (गीता ४।३४) | किसी शिष्यने प्रत्यगात्मविषयक
ज्ञानके सिवा कोई और शरण
इत्यादिश्रुतिस्मृतिनियमाच्च कश्चि- | (आश्रय) न देखकर उस निर्भय,
द्गुरुं ब्रह्मनिष्ठं विधिवदुपety | नित्य, कल्याणमय अचल पदकी
प्रत्यगात्मविषयादन्यत्र शरणम् | इच्छा करते हुए किसी ब्रह्मनिष्ठ
गुरुके पास विधिपूर्वक जाकर
अपश्यन्नभयं नित्यं शिवमचलम् | पूछा—यही बात [आगेकी श्रुतिसे]
इच्छन्प्रपच्छेति कल्प्यते- | कल्पना की जाती है-
वाक्य-भाष्य
प्रवृत्तिलिङ्गाद्विशेषार्थः प्रश्न | [मन आदि अचेतन पदार्थोंकी]
उपपन्नः। रथादीनां हि चेतना- | प्रवृत्तिरूप लिङ्गसे [उनकी प्रेरणा
करनेवाले] किसी विशेष तत्त्वके
वदधिष्ठितानां प्रवृत्तिर्दृष्टा न | विषयमें प्रश्न करना ठीक ही है, क्योंकि
रथ आदि [अचेतन पदार्थों] की
अनधिष्ठितानाम्। मन आदीनां | प्रवृत्ति भी चेतन प्राणियोंसे अधिष्ठित
च अचेतनानां प्रवृत्तिर्दृश्यते। | होकर ही देखी है, उनसे अधिष्ठित
हुए बिना नहीं देखी। मन आदि
तद्धि लिङ्गं चेतनावतोऽधिष्ठातुः | अचेतन पदार्थोंकी भी प्रवृत्ति देखी
ही जाती है। यही उनके चेतन
अस्तित्वे। करणानि हि मन | अधिष्ठाताके अस्तित्वका अनुमापक
आदीनि नियमेन प्रवर्तन्ते। | लिङ्ग है। मन आदि इन्द्रियाँ नियमसे