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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 152 में से

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पृष्ठ 137

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

पद-भाष्य
परमात्मविषयामुपनिषदं श्रुत- | यहाँ परमात्मविषयिनी उपनिषद्-
वतः उपनिषदं भो ब्रूहीति | को सुन चुकनेवाले शिष्यका
पृच्छतः शिष्यस्य कोऽभिप्रायः ? | ‘उपनिषद् कहिये’ इस प्रकार प्रश्न
यदि तावच्छ्रुतसार्थस्य प्रश्नः | करनेमें क्या अभिप्राय है ? यदि
कृतः, ततः पिष्टपेषणवत्पुनरु- | उसने सुनी हुई बातके विषयमें ही
क्तोऽनर्थकः प्रश्नः स्यात् । अथ | पुनः प्रश्न किया है तो उसका पुनः
सावशेषोक्तोपनिषत्स्यात्, ततस्त- | कहना पिष्टपेषण (पिसे हुएको
स्याः फलवचनेनोपसंहारो न | पीसने) के समान निरर्थक ही है ।
युक्तः “प्रेत्यास्माल्लोकादमृता | और यदि पहले कही हुई उपनिषद्
भवन्ति” (के० उ० २ । ५) | असम्पूर्ण होती तो “इस लोकसे
इति। तस्मादुक्तोपनिषच्छेषविष- | प्रयाण करनेके अनन्तर वे अमर हो
योऽपि प्रश्नोऽनुपपन्न एव, अनव- | जाते हैं” इस प्रकार फल बतलाते हुए
शेषितत्वात् । कस्तर्ह्यभिप्रायः | उसका उपसंहार करना उचित न
प्रष्टुरित्युच्यते— | होता । अतः पूर्वोक्त उपनिषद्के
| अवशिष्ट (कहनेसे बचे हुए) अंशके
| सम्बन्धमें प्रश्न करना भी अयुक्त ही
| है, क्योंकि उसमें कोई बात कहनेसे
| छोड़ी नहीं गयी। तो फिर प्रश्नकर्ता-
| का क्या अभिप्राय हो सकता है ?
| इसपर कहा जाता है—
वाक्य-भाष्य
ते तुभ्यमुपनिषदामोपासनं च । | उपासना कह दी’ । अब हम
अधुना ब्राह्मीं वाव ते तुभ्यं | तुझे ब्राह्मी—ब्रह्मकी—ब्राह्मण-जातिकी
ब्रह्मणो ब्राह्मणजातेरुपनिषदमब्रूम | उपनिषद् सुनाते हैं । यह उपनिषद्
वक्ष्याम इत्यर्थः । वक्ष्यति हि । | आगे कही जायगी । अबतक ब्राह्मी
ब्राह्मी नोक्ता उक्ता त्वात्मोपनि- | उपनिषद् नहीं कही गयी, केवल
षत् । तस्माच्च भूताभिप्रायोऽब्रूमे- | आत्मोपनिषद् ही कही गयी है। अतः
त्ययं शब्दः ॥ ७ ॥ | ‘अब्रूम’ इस शब्दसे भूतकालका
| अभिप्राय नहीं है ॥ ७ ॥