केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
पद-भाष्य
अनेन नाम्नोपासनस्य फल- | इस नामसे की हुई उपासनाका
माह स यः कश्चिद् एतद् यथोक्तं | फल बतलाते हैं—‘जो कोई इस
ब्रह्म एवं यथोक्तगुणं वेद उपास्ते | पूर्वोक्त ब्रह्मको उपर्युक्त गुणोंसे
अभि ह एनम् उपासकं सर्वाणि | युक्त जानता अर्थात् उपासना करता
भूतानि अभि संवाञ्छन्ति ह | है उस उपासकसे समस्त प्राणी
प्रार्थयन्त एव यथा ब्रह्म ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार अपने सम्पूर्ण अभीष्ट
| फलोंकी इच्छा यानी प्रार्थना करने
| लगते हैं, जैसे कि ब्रह्मसे ॥ ६ ॥
एवमनुशिष्टः शिष्य आचार्य- | इस प्रकार उपदेश पाकर
मुवाच— | शिष्यने आचार्यसे कहा—
वाक्य-भाष्य
णस्तस्मात्तद्वनं नाम । | है ऐसे वन् धातुसे तद्वन शब्द सिद्ध
ब्रह्मणो गौणं हीदं नाम । तस्मा- | होता है; अतः उसका ‘तद्वन’ नाम
दनेन गुणेन तद्वनमित्युपासित- | है। ब्रह्मका यह नाम गुणविशेषके
व्यम् । स यः कश्चिदेतद्यथोक्तमेवं | कारण है। अतः इस गुणके कारण
यथोक्तेन गुणेन वनमित्यनेन | वह ‘वन है’ इस प्रकार उपासना करने
नाम्नाभिधेयं ब्रह्म वेदोपास्ते | योग्य है। वह, जो कोई उपर्युक्त
तस्यैतत्फलमुच्यते । सर्वाणि | गुणके कारण पहले कहे हुए ‘वन’ इस
भूतान्येनमुपासकमभिसंवाञ्छ- | नामसे इसके अभिधेय ब्रह्मको जानता
न्तीहाभिसम्भजन्ते सेवन्ते स्मे- | अर्थात् उपासना करता है उसके लिये
त्यर्थः । यथागुणोपासनं हि | यह फल बतलाया जाता है। इस
फलम् ॥ ६ ॥ | उपासककी सभी भूत इच्छा करते हैं
| अर्थात् सभी उसका भजन यानी सेवा
| करते हैं। यह प्रसिद्ध ही है कि जैसे
| गुणवालेकी उपासना की जाती है वैसा
| ही फल होता है ॥ ६ ॥