सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५
पद-भाष्य
विद्युन्निमेषणवदधिदैवतं द्रुत- । विद्युत् और निमेषोन्मेषके
समान ब्रह्म शीघ्र प्रकाशित होनेवाला
प्रकाशनधर्मि, अध्यात्मं च मनः- है-यह अधिदैवत आदेश कहा
गया और वह मनकी प्रतीतिके
प्रत्ययसमकालाभिव्यक्तिधर्मि-
समकालमें अभिव्यक्त होनेवाला
इत्येष आदेशः। एवमादिश्यमानं है-यह उसका अध्यात्म आदेश
है। इस प्रकार उपदेश किया हुआ
हि ब्रह्म मन्दबुद्धिगम्यं भवतीति ब्रह्म मन्दबुद्धियोंकी भी समझमें आ
जाता है-इसलिये यह [सोपाधिक]
ब्रह्मण आदेशोपदेशः। न हि ब्रह्मका उपदेश किया गया, क्योंकि
निरुपाधिकमेव ब्रह्म मन्दबुद्धि- मन्द-बुद्धि पुरुषोंद्वारा निरुपाधिक
ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा
भिराकलयितुं शक्यम् ॥ ५ ॥ सकता ॥ ५ ॥
वाक्य-भाष्य
आत्मभूतत्वाच्च ब्रह्मणस्तत्स- । अर्थात् ब्रह्मका स्वरूपभूत होनेके
मीपे मनो वर्तत इति। उपस्मरत्य- कारण मन उसके समीप रहता है।
नेन मनसैच तद्ब्रह्म विद्वान्यस्मा- क्योंकि विद्वान् इस मनसे ही उस
त्तस्माद्ब्रह्म गच्छतीवेत्युच्यते। ब्रह्मका स्मरण करता है इसलिये [मन]
ब्रह्मके समीप मानो जाता है' ऐसा
अभीक्ष्णं पुनः पुनश्च सङ्कल्पो
कहा जाता है। ब्रह्मद्वारा प्रेरित मनका
ब्रह्मप्रेषितस्य मनसः । अत
ही बारम्बार सङ्कल्प होता है। अतः
उपस्मरणसङ्कल्पादिभिर्लिङ्गैर्ब्रह्म । तात्पर्य यह है कि स्मरण और सङ्कल्प
मनोऽध्यात्मभूतमुपास्यमित्यभि- आदि लिङ्गोंसे मनकी अध्यात्म ब्रह्म-
प्रायः ॥ ५ ॥ स्वरूपसे उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥